
नई दिल्ली,
भारतीय लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभों में खुलेआम चल रहे वैचारिक शीत युद्ध में अब पूर्व न्यायमूर्ति लोकुर ने अपने विचार रखते हुए साफ किया है कि भारत के लोकतंत्र में ना तो संसद सर्वोच्च है और ना ही न्यायपालिका, सर्वोच्चता सिर्फ भारत के संविधान की है |इन दिनों संवैधानिक संस्था न्यायपालिका में पूरी ताकत से भारत की विधायिका के प्रतिनिधि मंत्री और उपराष्ट्रपति ने स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्न चिन्ह उठाने और कटघरे में खड़े करने का काम किया है
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की टिप्पणियों के विरोध में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर ने कहा है कि भारत का संविधान सर्वोच्च है। न्यायमूर्ति लोकुर ने एक वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में कहा कि भारत का संविधान सर्वोच्च है। न्यायपालिका कार्यपालिका और संसद सर्वोच्च नहीं है। दरअसल, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ कहा था कि संसद ‘सर्वोपरि’ है।
न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा कि संविधान ने न्यायपालिका को यह जांचने का काम सौंपा है कि क्या कहीं विधाविका द्वारा बनाया कानून संविधान के न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा कि संविधान ने न्यायपालिका को काम सौपा है कि क्या विधायिका द्वारा बनाया कानून संविधान के विपरीत तो नहीं है या वह किसी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं करता है।अनुच्छेद 13 में स्पष्ट कहा गया है कि जो कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, ये शून्य हैं। और न्यायपालिका उसकी जांच कर सकती है। विपरीत तो नहीं हैं या वह किसी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं करता है। संविधान के उपराष्ट्रपति धनखड़ 2015 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ तीखी आलोचना कर रहे हैं। जिसने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक करार दिया था। धनखड़ के अनुसार,99वें संविधान संशोधन के बाद से, जिसने एनजेएसी का मार्ग प्रशस्त किया और जिसे संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया था। साथ ही राज्य विधानमंडलों के बहुमत द्वारा अनुमोदित किया गया था उसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द नहीं किया जा सकता था। धनखड़ ने ‘मूल संरचना सिद्धांत पर भी सवाल उठाया जिसे एनजेएसी को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने लागू किया था न्यायमूर्ति लोकुर एनजेएसी का फैसला सुनाने वाली संविधान पीठ का भी हिस्सा थे। उन्होंने धनखड़ की टिप्पणियों का जवाब देते हुए कहा-मैं एनजेएसी के फैसले के बारे में बहुत ज्यादा नहीं बोलना चाहता क्योंकि मैं भी फैसला सुनाने वालों में से एक था। फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने तर्क दिया था कि संविधान में संशोधन ने संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि किसी को भी एनजेएसी के फैसले की आलोचना करने का अधिकार है। लेकिन इस आधार पर फैसले पर सवाल उठाना कि संसद द्वारा सर्वसम्मति से कानून पारित किया गया था, सही दृष्टिकोण नहीं है। विधायिका ने इसे सर्वसम्मति से भारी बहुमत से पारित किया है या कम बहुमत से यह अप्रासंगिक है। अगर यह असंवैधानिक है तो यह असंवैधानिक है। बस इतना ही। कौन तय करता है कि यह असंवैधानिक है या नहीं ? यह न्यायपालिका द्वारा तय किया जाना है और न्यायपालिका ने ऐसा किया।( साभार जनसत्ता)

