
नई दिल्ली
भारत में कूटनीति किस खतरनाक हालात में जा सकती है| इसका मॉडल नगर निगम दिल्ली के चुनाव में देखने को मिल रहा है| एन केन प्रकारेण सत्ता में अपना कब्जा हो और उसके लिए किसी भी ताकत को कहीं भी इस्तेमाल करना अब दिल्ली से उदाहरण बनता चला जा रहा है कि भारत में किसी भी कोने में कहीं पर भी इस्तेमाल हो सकता है| यह चुनावी लोकतंत्र के लिए एक खतरा भी है क्योंकि दिल्ली में सबकी नजर रहती है इसलिए इसे प्रोपेगेंडा इंडस्ट्री की तरह इस्तेमाल कर भारतीय राजनीति का माइंडसेट भी किया जा रहा है, ऐसा प्रतीत होता है| जनसत्ता में प्रकाशित एक समाचार में अमलेश राजू लिखते हैं
निगम चुनाव परिणाम के डेढ़ महीने के बाद भी महापौर, उपमहापौर और स्थायी समिति के सदस्यों का चुनाव नहीं होना निगमएक्ट के खिलाफ है। भाजपा और आप को दिल्ली की जनता ने स्पष्ट बहुमत देकर यह कर दिया है कि किसे सत्ता में रहना है और किसे विपक्ष में बैठना है। निगम की 25 सदस्यीय पार्षदों की चार दिसंबर को चुनाव और सात दिसंबर को परिणाम आने के बाद छह जनवरी को शपथ ग्रहण में पहले एल्डरमैन को शपथ दिलाने के नाम पर दोनों दलों में जमकर लड़ाई हुई और सदन स्थगित होने के बाद अगली तिथि 24 जनवरी उपराज्यपाल के निर्देश पर सीटें आम आदमी पार्टी को व 134 भाजपा को 104 सीटें मिली है। तय की गई। लेकिन 24 जनवरी को जब पार्षदों के शपथ के बाद महापौर, उपमहापौर और स्थाई समिति के सदस्यों का चुनाव टल गया तब जानकारों को इसमें किसी दूसरे प्रकार के संशय की बू दिखाई दी है।
निगम जानकार जगदीश ममगाई कहते हैं कि निगम एक्ट के मुताबिक सदन की पहली
बैठक में ही शपथ ग्रहण और पदाधिकारियों का चुनाव हो जाना चाहिए लेकिन चार जनवरी
को यह संभव नहीं हो पाया तो 24 जनवरी को किसी भी सूरत में गठन हो जाना चाहिए। संसद और विधानसभा में भी ऐसी नौबत आने पर भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती कर देर होना रात सही लेकिन गठन की प्रक्रिया नहीं रोकी जाती। इस प्रकार से गठन को रोकने से ऐसा कयास है कि पार्टी चाहती है कि जब तक केंद्र सरकार के अधीन निगम है तब तक
आप को दूर रखा जाए और यह दूरी कुछ महीने रखने के बाद गठन कर दिया जाए और सात जोन और स्थाई समिति में कब्जा कर निगम की सत्ता एक प्रकार से अपने हाथ में ले लिया जाए। कारण नगर निगम के अधिनियम 1957 के तहत स्थाई समिति और वार्ड समिति व आयुक्त महत्वपूर्ण प्राधिकारी के रूप में सामने आता है और अगर स्थाई समिति और वार्ड समिति में भाजपा का कब्जा हो जाता है तो स्वाभाविक रूप से निगम में सत्तारूढ़ होने के बाद भी आप केपास ज्यादा ताकत नहीं हो पाएगा।

