
शहडोल
शिकारी आता है, जाल फैलाता है, दाना डालता है हमें लालच में नहीं आना चाहिए, शिकारी के बिछाये जाल में फसना नहीं चाहिए .और यह रटते हुए भी तोते शिकारी के बिछाये जाल में फस जाते हैं. इस कहानी को बचपन में पड़कर नि:संदेह हम सभी उन तोतों की बेवकूफी पर हँसे होंगे . किन्तु सोचे क्या हम खुद वर्षों से इस कहानी को दोहरा तो नहीं रहें हैं.
कुछ इस तर्ज पर शहडोल क्षेत्र में प्रचारित पेसा एक्ट; अनुसूचित जनजाति वर्ग के हितों के लिए संविधान की पांचवी अनुसूची में सुनिश्चित किए गए प्रावधानों को लागू करने का काम हो रहा है| यह बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि 26 जनवरी की ग्रामसभा में भी पेसा एक्ट से जुड़ी शिकायतें और समाधान संबंधी किसी भी प्रकार की जानकारी जिला पंचायत अधिकारी शहडोल द्वारा नहीं दी गई है , नतीजतन जिस किसी ग्रामसभा में अगर पेशा एक्ट से जुड़ी शिकायतें आई हुई है तो संबंधित ग्रामसभा के सचिव द्वारा उन्हें संबंधित व्यक्ति के पास मात्र भेज दिया गया है अब उस पर कार्रवाई होती है या वह दस्तावेज बंद पड़े फाइलों का हिस्सा बन जाती है, यह एक अलग बात हो गई है |
शहडोल नगर के आसपास, शहडोल में भी जिन जमीनों में बहुतायत गैर आदिवासी समाज के व्यक्तियों ने अपने कॉलोनी रेरा के तहत मंजूर कराकर कॉलोनी बनाकर बेचने का काम किया है उन पर तो कार्रवाई करने के लिए अभी कोई नियम निर्देश ही नहीं बने हैं.. जो पेसा एक्ट के अधीन काम कर सकें| किंतु जिन ग्रामसभाओं में यह बातें सार्वजनिक तौर पर भी स्पष्ट हो चुकी हैं की आदिवासियों की जमीन पर नेता, अधिकारी, दलाल और कॉलोनाइजर्स यह सब मिलकर के अपने अपने तरीके से जमीनों को खरीद बिक्री कर रहे हैं उन चर्चित प्रकरणों पर भी कोई कार्रवाई होती दिख नहीं रही है….विशेषकर आदिवासियों की जमीन पर गैर आवासीय वर्ग के द्वारा जो जमीन क्रय कर के विक्रय की जा रही हैं उसके लिए मात्र 1959 की भूमि को आधार बनाकर ही जिला प्रशासन फैसला करता दिख रहा है जो यह साबित करता है कि जमीन है आदिवासियों की रही हैं इसके बावजूद भी अन्य घटनाएं भी सामने नजर आई हैं…
जिसमें यह बात स्पष्ट हुई है कि न सिर्फ आदिवासियों की जमीनों को गैर आदिवासियों को गैरकानूनी तरीके से विक्रय किया गया है बल्कि आदिवासियों का नाम परिवर्तन जैसे कोई आदिवासी राम सिंह बैगा है उसका नाम राम अहीर अथवा राम हरिजन के नाम से परिवर्तित करके उस जमीन को गैर आदिवासी वर्ग के व्यक्तियों को बेच दिया गया है ताकि संबंधित जमीन आदिवासी की थी, यह भी साबित न होने पावे….
कुछ ऐसा ही एक बहुचर्चित मामला जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुभाष गुप्ता से जुड़ता नजर आ जा रहा है जबकि और यह मामला तूल पकड़ लिया क्योंकि जिन समाचार पत्रों ने अथवा मीडिया पोर्टल ने इसे प्रकाशित किया उनके खिलाफ जिला कांग्रेस अध्यक्ष ने शिकायत कर दी थी कि जानबूझकर इस मामले में उन्हें बदनाम किया जा रहा है जबकि सुभाष गुप्ता अपनी पत्नी के नाम से जो जमीन क्रय की थी वह उन्हें आदिवासी ने नहीं बेची थी बल्कि किसी अन्य व्यक्ति ने बेची थी जो सामान्य वर्ग के रहे .ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिसमें क्रेता को यही नहीं मालूम कि वास्तव में 1959 के स्तर पर वह जमीन आदिवासी की थी या गैर आदिवासी की थी…? और उसे नजरअंदाज करके जमीन को क्रय लिया गया जिसका फर्क पड़ा की आज गैर आदिवासी समाज के कई व्यक्ति मूल धोखाधड़ी के शिकार हो रहे हैं…
ग्राम सौखी में खसरा नंबर 50, 51, 52, 53 में भी यह जानकारी गैर आदिवासी वर्ग के लिए घातक सिद्ध हो रही है.. क्योंकि इस भूमि पर के अंश भाग पर मूलत आदिवासी वर्ग के लोगों का अधिपत्र रहा है जिसे तथाकथित तरीके से बैंक में गिरवी रख दिया गया और फिर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने इस जमीन को अपने पैसा वसूल करने के चक्कर में कुछ गैर आवासीय वर्ग को जमीन विक्रय कर दी…, उसका असर यह पड़ा की आसपास तो आदिवासियों की जमीन है और बीच में तथाकथित सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की गिरवी रखी जमीन को नीलाम किया गया उससे भी ज्यादा हालात इसलिए इसमें गड़बड़ हो गए क्योंकि जो जमीन टुकड़ों टुकड़ों में अलग-अलग रूप में थी उस जमीन को सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने एक जगह एकत्रित करके नीलाम करके गैरआदिवासी वर्ग के कुलजीत सिंह दुआ, संजय जैन, ज्ञानी गुप्ता और शिव कुमार चंदेल को सामूहिक रूप से नीलाम कर दी थी और इसका विद्वत सीमांकन भी हुआ था किंतु अनुविभागीय अधिकारी द्वारा इस सीमांकन को निरस्त कर दिया गया, क्योंकि इस भूमि को कानूनी प्रक्रिया पूरी कराकर नीलाम नहीं कराया गया था.. ऐसा आवेदक पक्ष की शिकायत थी| किंतु ग्राम सौखी की इस बहुचर्चित बहुत सारे भूखंड विक्रय कर दिए गए हैं जो वास्तव में आदिवासियों के मूल रूप से थे और इसी भूखंड पर तथाकथित एक तालाब भी हुआ करता था इस तरह आदिवासी क्षेत्र की भूमि में तालाबों का और आदिवासियों की जमीन को नष्ट भ्रष्ट करके अलग-अलग तरीके से लोग गैर आदिवासी वर्ग के लोगों को विक्रय करके उनके साथ एक प्रकार की धोखाधड़ी कर रहे हैं जोसंविधान की पांचवी अनुसूची में विशेष आदिवासी प्रक्षेत्र अधिनियम 1996 में प्रदर्शित आदिवासी हितों की मंशा के खिलाफ है और अगर यहां पर पेसा एक्ट लागू होता है तो गैर आदिवासी वर्ग जो की भूमियों को खरीद कर जैसे कि जिला कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष गुप्ता की पत्नी के नाम से जो जमीन क्रय की गई है उनका कोई दोष नहीं है इसके बावजूद भी वह जमीन अब आदिवासी की हो जाएगी ऐसा माना जाता है. इस तरह पेसा एक्ट के प्रावधान शहरी क्षेत्र में या इसके आसपास लागू होते हैं तो उसके घातक परिणाम गैर आदिवासी समाज के लोगों को भोगना पड़ सकता है और वह एक लंबे कानूनी पचड़े में उसी तरह फस जाएंगे जैसे कि सौखी के खसरा नंबर 51,52,53 और 50 में आदिवासी वर्ग के लोगों ने करीब 25 लोगों ने भूमि क्रय की थी उन्हें अपनी लाखों रुपए लगाने के बाद भूमि से हाथ धोना पड़ा है.. और एक कानूनी लंबी लड़ाई में फंसना पड़ा है| इस तरह जब तक पेसा एक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो जाता है गैर आदिवासी समाज के लोगों को शहडोल क्षेत्र में विशेषकर आदिवासी विशेष क्षेत्रों में दखल रखने वाले हिस्सों में जमीन खरीदने की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है…

