सोन की सुनहरी रेत के लिए माफिया ने सोन टोला की बांध का पानी का गेट खोल दिया .. ?

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  शहडोल

  अगर उड़ती हुई खबरों को सच माना जाए तो शहडोल में रेत माफिया के लिए जिला खनिज विभाग स्वर्ग के समान है… वह इस विभाग के अधिकारियों से मिलीभगत से कुछ भी कर सकता है उसे मालूम है कि अधिकारी राजा हरिश्चंद्र हैं और वह माफिया के खिलाफ सोचने में भी अपना वक्त जाया नहीं करना चाहते हैं. ज्यादा से ज्यादा स्थानीय ट्रैक्टर वाले या छोटी कोई गाड़ी वालों को पकड़कर वह यह दिखाने का काम करते हैं कि हम अवैध रेत काम करने वालों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं. अब जो खबर आई है उसके अनुसार 36 गांव पानी सप्लाई करने वाला सोनटोला शहडोल से मुश्किल से 20 किलोमीटर दूर सोन नदी इस स्थित बांध के गेट को रेत माफिया जो मध्यप्रदेश में अपनी राजनीतिक पकड़ को मजबूत किए हुए हैं, उसके गुर्गे बांध का गेट खोल दिए ताकि बांध के कारण जमी सोन नदी की सुनहरी रेत को स्मगलिंग किया जा सके.. इस आशय को लेकर स्थानीय निवासियों ने अपनी अलग अलग सूचनाएं भी तथा फोटोग्राफ्स भी जारी किए हैं|

किंतु खनिज विभाग का राजा हरिश्चंद्र उस पर यकीन नहीं करना चाहता क्योंकि उसे लगता है कि ऐसा करके वह अपने अन्नदाता के खिलाफ कोई गलत कदम ना उठा दे या फिर उसे मालूम है कि किसके इशारे पर जो उसके दरबारी होते हैं कहने को तो वो ठेकेदार होते हैं किंतु ठेकेदार की आड़ में कई रेत माफिया खनिज विभाग के अधिकारी के संपर्क में रहकर तमाम रेत स्मगलिंग के काम को अंजाम देते हैं और यही कारण है कि सोन टोला में बने आम नागरिकों के पीने के लिए पानी में रोके गए सोन पानी को गेट खोल कर पानी बहा दिया गया…

और अब बारी रातों-रात रेत की स्मगलिंग करने की है क्योंकि इस घटना के बाद खनिज विभाग के राजा हरिश्चंद्र को यह आकलन लगाने की भी फुर्सत नहीं है कि वास्तव में इस बांध के कारण कुल कितने रेत का जमाव सोन नदी के ऊपरी तट पर हुआ है …? सामने लाता है तो उसके मित्रों याने रेत स्मगलरओं को रेत के अवैध कारोबार को रोकने में दबाव बन जाएगा …

बहरहाल देखना होगा कि प्रशासन और पुलिस कितना गंभीरता से इस बड़ी घटना पर क्या कार्यवाही करती है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपती मुर्मू द्वारा स्वयं शहडोल आकर पांचवी अनुसूची में अनुसूचित शहडोल जिले के तमाम गांव में पेसा एक्ट लागू कर प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए जो घोषणा करके गए हैं, उस पर ग्राम पंचायत की ग्राम सभाएं आखिर अपने अधिकारों को कितना जागरूक होकर प्राकृतिक संसाधन रेत की स्मगलिंग को रोकने में कैसे प्रस्ताव पारित करती है…? अथवा प्रस्ताव पारित ना करके अवैध रूप से सोन नदी की सुनहरी कीमती रेत को स्मगलर के भरोसे छोड़ देती हैं… क्योंकि रेत के तमाम माफिया का अंततः दवा यह होता है कि उनका बॉस बड़ा नेता है और उसका कुछ नहीं होना जाना.. इसलिए जो जिससे मिले हिस्सा बांट करो और चुपचाप रेत के अवैध कारोबार पर मूकबधिर बने रहो… फिलहाल सोन टोला में घटी घटना अगर सच है कि पानी का बांध का गेट खोल दिया गया है तो यह रेत माफिया की खुली अराजकता का एक बड़ा सबूत भी है ऐसा मानना चाहिए.


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