
यह कहां आ गए हम….?
शहडोल जिले का से टूटकर बने नरोजाबाद थाने के आदिवासी केवल सिंह के मामले पर प्रकाश डालना जरूरी होगा, जब यह प्रकरण मेरे ध्यान में लाया गया की, आदिवासी सेवानिवृत्त कॉलरी कर्मचारी का करीब 17,00,000 रुपए बिहार से आकर वहां रहने वाले किसी सूदखोर ने उसे ठग लिया है. सिर्फ ₹30000 मूलधन देकर. तब मैंने यह बात अलग-अलग स्तर पर अनुसूचित जनजाति आयोग एडीजीपी से लेकर तक समझाने का प्रयास किया. शहडोल जिले में 9 तारीख से 15 तारीख तक पेसा एक्ट को मजबूती से लागू करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है .जिला मुख्यालय और संभाग मुख्यालय से 1 किलोमीटर दूर से लगने वाले उमरिया जिले में भी पेसा एक्ट को लेकर गंभीरता होगी, ऐसा माना जाना चाहिए. ( त्रिलोकीनाथ )
तो चर्चा वह सूदखोरी
जो प्रमाणित तौर पर डंके की चोट में हुई है…, पूरी पारदर्शिता से हुई है, इसके बावजूद न सिर्फ उमरिया जिले का थाना पुलिस बल्कि जो क्षेत्र कि पुलिस और मध्य प्रदेश का अनुसूचित जनजाति आयोग भी अपनी देशभक्ति जनसेवा की योग्यता इस सूदखोरी के मामले में सिद्ध करने में असफल रहा है. यह कह सकते हैं कि यहां पर लोकतंत्र पूरी तरह से नपुंसक सिद्ध हुआ है. क्योंकि उसका पुरुषार्थ इस बात पर निहित था कि अगर कोई पारदर्शी तरीके से इस प्रकार की सूदखोरी हुई है और संविधान की पांचवी अनुसूची में आदिवासियों को ऐसी कोई सुरक्षा है तो कानून यहां पर आकर अपना दम क्यों तोड़ दिया है…, कौन-कौन लोग कानून की हत्या करने में एक गिरोह की तरह काम किए….. यह देखा जाना चाहिए.और शायद इसीलिए पेसा एक्ट का निर्माण 1996 में किया गया था.
तो सवाल यह है कि नरोजाबाद थाना क्षेत्र में पेसा एक्ट के तहत अनुसूचित जनजाति के आदिवासी केवल सिंह को उसके साथ हुई खुली पारदर्शी सूदखोरी के लिए किसे दंडित किया गया और यदि केवल सिंह ने झूठ बोला है तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही सुनिश्चित करने में महान कार्य पुलिस विभाग ने क्यों नहीं किया अब तक. आखिर उस क्षेत्र के माननीय सूदखोर उमेश सिंह को इस आदिवासी ने प्रताड़ित क्यों किया…? ऐसा समझा जाना चाहिए. किंतु हुआ कुछ नहीं और महामहिम राष्ट्रपति द्वारा शहडोल के लालपुर में आकर पेसा एक्ट में संरक्षण का दिया गया वादा पूरी तरह से निरर्थक साबित हो रहा है…?
इस परिवार को सूदखोरी से कैसे बचाया जाए क्योंकि लोकतंत्र में एक पत्रकार होने के नाते कार्यपालिका के सहारे ही इस पर काम कर सकते थे और लगभग मर चुकी पत्रकारिता के बावजूद इस केवल सिंह को न्याय दिलाने का प्रयास करते रहे. इस दौरान “कोरोनावायरस भाई साहब” भी आए और चले गए और निष्कर्ष यह निकला कि उन्होंने ही इस पर मुहर लगाया कि केवल सिंह स्वयं एक सूदखोर है और सूदखोर उनसे कर्जा लिया था. इस तरह यह प्रकरण नहीं बनता है और मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.
नरोजाबाद थाना के तमाम योग्यतम पदस्थ लोगों ने उमरिया जिले के आईपीएस ने और शहडोल जोन के आईपीएस ने मिलकर इस पर मुहर भी लगा दिया क्योंकि तब तक घेराबंदी करके आदिवासी केवल सिंह से यह लिखा लिया गया की वह अब इस पर कोई कार्यवाही नहीं चाहता है क्योंकि आदिवासी केवल सिंह इतना पढ़ा लिखा नहीं है उसने भी मुझसे कहा की भैया अब मैं थक गया हूं और मेरी बीवी भी लकवा की शिकार हो गई है. परिवार भी बर्बाद होने वाला है मैं खेती बची कुची खेती करके अपना शेष जीवन व्यतीत कर लूंगा…, मेरा पैसा अब मुझे वापस नहीं मिलेगा; आप भी परेशान ना हो और बेहद निराश मन से वह जैसा थाने वाले कह रहे हैं उस प्रकार से करने के लिए बाध्य हो रहा है.इस तरह आदिवासी केवल सिंह महामहिम राष्ट्रपति के शहडोल क्षेत्र में आने और पेशा एक्ट लागू करने की घोषणा करने के बाद अपने स्वाभिमान की हत्या या आत्महत्या करने को मजबूर हो गया.
तो यह पत्रकारिता की असफलता नहीं है कम से कम ऐसा मुझे मानना चाहिए बल्कि कार्यपालिका की हत्या है जो सूदखोर के पक्ष में बड़े गर्व के साथ खड़ा होता प्रमाणित हुआ.क्योंकि विशेष आदिवासी क्षेत्र में 3 टुकड़े होने के बाद कई आईएएस और आईपीएस इन आदिवासियों को सूदखोरों से बचाने के लिए इसी राम-राज्य की सरकार के मुखिया शिवराज सिंह ने इन अफसरों को यहां तैनात किया था.
तो इस प्रकार आदिवासी केवल सिंह माफिया की सफलता मैं अपनी गुलामी को प्रमाणित किया किंतु यह गुलामी वास्तव में केवल आदिवासी केवल सिंह की गुलामी नहीं थी बल्कि यह उसकी भी असफलता थी जो जिसमें कार्यपालिका के तमाम आईएएस-आईपीएस अधिकारी यहां पर एकत्र होकर काम कर रहे थे .
यह कहना गलत होगा कि पूरी कार्यपालिका को सूदखोर ने खरीद लिया है किंतु यह कहना ज्यादा सही होगा कि विकेंद्रीकरण होने के कारण जिले बन जाने से उसकी प्रशासनिक ताकत कमजोर हो गई और कार्यपालिका में बैठे हुए कुछ गलत लोगों के कारण केवल आदिवासी को कार्यपालिका ने खुलेआम लूट वादिया.
यह 21वीं सदी का भारत है तो सोचने को मजबूर हैं कि यह कहां आ गए हम… क्या हम देश की आजादी के सिलसिले को इसी दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं क्या हम एक बड़े माफिया के रूप में लोकतंत्र के इस हिस्से को नष्ट करने में अपनी तमाम शैक्षणिक योग्यता का उपयोग कर रहे हैं….? जाने या अनजाने. क्योंकि कार्यपालिका के लोगों को मात्र कुछ साल काम करने होते हैं किसी एक स्थान पर, तो क्या कार्यपालिका के तमाम अधिकारी बेहतरीन बुनियादी ढांचागत सुधारों के बावजूद भी उसी तरह फेल हो गए हैं….?
जिस तरह बिना बुनियाद के भारत की पत्रकारिता लगभग मरने की कगार पर पहुंच गई है…; तो क्या फर्क पड़ता है कि कार्यपालिका मर रही है या पत्रकारिता मर गई है… केवल आदिवासी के मामले में.और क्या फर्क पड़ता है कि भारत के आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू स्वयं शहडोल मैं आकर के संविधान की पांचवी अनुसूची के पेसा एक्ट को लागू करने की घोषणा करें और पेशा एक्ट दम तोड़ दे…?
अन्यथा बीसवीं सदी के अंत में मेरे जैसा पिछड़ा हुआ पत्रकार यदि भौतिक रूप में शहडोल जेल भवन के बगल वाला तालाब को जिंदा रख पाया.. जो आज भी जिंदा है बिना किसी मजबूत बुनियादी ढांचा के… तो क्या कार्यपालिका के अधिकारी बेहतरीन बुनियादी सुधारों के बाद भी बुरी तरह से असफल साबित हो रहे हैं.. और वह किसी बड़े माफिया के गुलाम हो गए हैं…? यह प्रश्न खड़ा होता है अगर हम केवल आदिवासी को न्याय दिलाने में किसी सूदखोर के पक्ष में खड़े हुए दिखते हैं तो.
तब सवाल उठता है कि आखिर वह कौन सा बड़ा माफिया है जो प्रेस और कार्यपालिका को खत्म कर अपनी माफिया गिरी चला रहा है…?

