
कुछ इस तर्ज पर भारतीय राजनीति में गोदी मीडिया का उपयोग हो रहा है.. लगभग 30 घंटे चले साबरमती से प्रयागराज तक की यात्रा में महान गैंगस्टर अतीक अहमद (पूर्व विधायक )के बारे में खबरें तैयार की गई है. इस महान गैंगस्टर के बारे में ठीक इसी प्रकार से यह नहीं कह सकते हैं कि यह ओबीसी (पिछड़ा वर्ग का )है या नहीं है..? जैसे हम राहुल गांधी के उन तमाम देश के भगोड़े मोदी बंधु के बारे में नहीं कह सकते कि वे ओबीसी हैं या नहीं है…? लेकिन देश की सत्ता पार्टी आर्थिक अपराधियों लगे हाथ मोदी बंधु को ओबीसी के रूप में महिमामंडित कर वोट बैंक का एक बड़ा नैरेटिव एक प्रकार का इंडस्ट्री खड़ा करना चाहती है. उन्हें इन आर्थिक अपराधियों और देश के भगोड़े मोदी-मोदी के खेल में अपने मोदी को यानी देश के तमाम मोदी को पिछड़ा वर्ग बताने में धरने में भ्रामक राजनीति करने में जरा भी गुरेज नहीं है… —————— त्रिलोकीनाथ ——————–
इससे एक भ्रम का धुंध खड़ा हो गया है… ऐसे में धरतीपुत्र के साथ महान गैंगस्टर अतीक अहमद ओबीसी का चेहरा बनकर उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए फायदा या नुकसान का संभव हो सकते हैं तो क्या बुरा है…? बहरहाल भारतीय राजनीति के लिए रोमांचकारी मौत का तमाशा बने ओबीसी मोदी और ओबीसी अतीक अहमद के दौर में हम महान गैंगस्टर के राजनीतिक पक्ष के दर्द को दैनिक भास्कर ने जिस प्रकार दिखाया है उसका जिक्र करना चाहेंगे भास्कर ने लिखा है”यह है शहर का चकिया इलाका, जहां माफिया डॉन का घर हुआ करता था। इसकी इलाके की पहचान माफिया डॉन अतीक अहमद से होती है।
यहीं पर अतीक का दरबार लगता था। सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह से लेकर तमाम बड़े बड़े नेता यहां अतीक के घर आया करते थे। घर के बाहर लग्जरी गाड़ियाें का काफिला होता था और अंदर नेता, अफसर और बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ हुआ करती थी। अतीक का नाम आते ही पूरा इलाका सहम जाया करता था लेकिन आज परिस्थितियां बदली और अतीक का वही दरबार खंडहर के रूप में तब्दील हो गया। पूरा घर जमींदोज कराया जा चुका है। यहां आज कोई एक दीया जलाने वाला नहीं बचा है। “दैनिक भास्कर” की पड़ताल में पता चला कि अतीक के घर के बाहर उसके तीन कुत्ते हैं, जिसकी देखभाल के लिए हीरा नाम का नौकर वहां मौजूद था। इलाके के लोग अतीक के खिलाफ हो रही कार्रवाई से खुश हैं।”
किंतु लाइव चले 30 घंटे के सघन राष्ट्रीय कार्यक्रम में गोदी मीडिया ने अदानी को कम करके दिखा दिया.जो कभी दुनिया का दूसरा बड़ा नंबर का आदमी था अभी वह कितना नीचे जाएगा कुछ कहा नहीं जा सकता है. जबकि कांग्रेस पार्टी की प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसी एकमात्र अदानी के कारण भारत के प्रधानमंत्री को कायर कहने में जरा भी झिझक नहीं की… जबकि सब जानते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री ऐसे नहीं है वह अभी तक जो भी करते आए हैं सब पारदर्शी रहा है… अदानी के कंपनी में राहुल गांधी के द्वारा बोले गए तथाकथित 20000 करोड रुपए की सेल कंपनियों का यह पैसा अडानी का नहीं है तो किसका है…? इसका जवाब अभी तक नहीं आया है.
राहुल गांधी साफ करते हैं कि उन्होंने मोदी के बारे में कुछ नहीं कहा है, वह तो अडानी

के बारे में बार-बार पूछ रहे हैं और आगे भी उन्होंने पारदर्शी किया की अदानी ही मोदी हैं…? इस तरह की कुछ भ्रामक राजनीति के बीच में देश एक अजीबोगरीब संक्रमण काल के दौर में गुजर रहा है. जिसे बहुत से लोग लोकतंत्र का खतरा भी बताते हैं ..इसलिए काला कपड़ा पहन कर के संसद में और संसद के बाहर अपनी बात को रख रहे थे. किंतु इतना तो तय है कि हंगामे के बीच में सिर्फ 1 वर्ष के लिए यानी 2024 तक सत्ता चलाने के लिए अगर 45 लाख करोड़ रूपया भारत की संचित निधि से विकास कार्यों के लिए आहरित करने का प्रस्ताव पारित होता है तो वह भी उसी धुंध में धुंधला हो जाता है जिस धुंध में मात्र कुछ सेकंड में भारत का वित्त विधेयक वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगभग पारित करा लेती हैं.
यह देश की दशा और दिशा मोदी और अतीक अहमद जैसे महान अपराधियों की वजह से बन चली है.. और गोदी मीडिया देश के भगोड़े मोदी और महान गैंगस्टर अतीक अहमद जैसे लोगों को या तो शहीद बताने में रोमांचकारी सीरियल चलाता है या इन्हें ओबीसी बताने में एक लंबी बहस चलाता है.. इतनी ही बहस अगर इस बात पर होती कि 45लाख करोड़ रूपया आखिर किस बात के लिए प्रस्ताव पारित हुआ है तो देश के लोगों को शायद लोकतंत्र होने का कुछ पारदर्शिता समझ में आती हो सकता है…? कि 80 करोड़ों लाभार्थियों को लाभ देने के लिए या फिर 2024 की राजनीति मैं चुनाव के धंधे में इसका उपयोग करने के लिए उपयोग किया जाएगा…? इस पर भी कोई चर्चा नहीं होती. जबकि इस दौर में वित्त विधेयक और 45 लाख करोड़ रूपया के साथ मोदी-मोदी का खेल चल रहा था तभी इसरो ने एक यादगार सफर अंतरिक्ष के लिए तय किया, तभी कोई चार गोल्ड मेडल हमारी खिलाड़ियों ने भारत में लाकर फेंक दिया, किंतु यह समाचार हमारी पत्रकारिता के लिए कोई मायने नहीं रखता.. तो हम किस प्रकार के दौर में हैं यह भी एक बड़ा चिंता का सबब है.
बहरहाल जब तक यह सुनिश्चित नहीं हो जाएगा कि मोदी और अतीक अहमद ओबीसी हैं अथवा नहीं…? या फिर अतीक अहमद शहीद हो गया है या फिर नहीं …? तब तक यह थकान भरी गुजरात के साबरमती जैसे पवित्र शब्द से जुड़कर महान गैंगस्टर अतीक अहमद कि प्रयागराज तक की यात्रा और उस के समापन पर टीवी के न्यूज़ सीरियल चलते रहेंगे…. क्योंकि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भी अब अपनी अपमानजनक लोकतंत्र की हत्या वाली प्रयास पर लगातार विरोध करते रहेंगे… फिलहाल राहुल गांधी को अप्रैल की 24 तारीख तक अपना बंगला खाली कर देने का नोटिस मिल गया है, तो सूरत की कोर्ट ने उन्हें 30 दिन की अपील का समय और लोकसभा ने उन्हें करीब इतने ही दिनों का बंगला खाली करने का समय दीया है.. देखते हैं ओबीसी की बोट बैंक में इन 30 दिनों में कौन कितना खेल खेलता है… फिलहाल कांग्रेस अपनी आजादी की एक नई लड़ाई का जंग लड़ रही है.. जिसमें आजादी के पहले के किरदार वीर सावरकर भी जमकर जगह पा रहे हैं ….अतीक अहमद और देश के भगोड़े मोदी मोदी से कम नहीं…? क्योंकि वह भी बाल ठाकरे के पुत्र के साथ शिवसेना शिंदे के भी आदर्श हैं…तो देखते हैं की भारतीय राजनीति अभी पतन की कितनी डुबकियां से पवित्र होती है अथवा अपवित्र साबित होती है…? फिलहाल आजादी के बाद के गांधी और आजादी के पहले के सावरकर भी गोदी मीडिया में कब्जा करने का प्रयास कर रहे हैं… अतीक अहमद से कम जगह उन्हें नहीं मिल रही है.. ऐसा मान कर चलिए. यही देश की दुर्दशा भी है…. हमारी रुचि उस 45 लाख करोड़ रू
पया को लेकर है जिसे सरकार लोक हित में खर्च करने के लिए हंगामे के बीच में आहरण करने का अधिकार अधिकृत कर ली है… हम आदिवासी क्षेत्र के निवासियों को इसमें कितना मिलेगा हमारी रुचि फिलहाल इसी स्वार्थ में है.. क्योंकि सत्ता भी उतनी ही स्वार्थी है जितने हम…. अपने संकीर्ण दायरे में स्वार्थी बनने का प्रयास कर रहे हैं…तो यही गुलाबी मखमली कालीन पर फकीर की चाल पर चलती राजनीति भी है जो अपने लक्ष्य में निशफिकर होकर, निश्चिंत होकर अपने कदम पर कदम चलती चली जाती है…

