
इन दिनों मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक वीडियो सदन के अंदर का वायरल हो रहा है जिस में भी साफ कह रहे हैं की नरेंद्र मोदी और और उनके मित्र गौतम अदानी संबंध, मालिक और मैनेजर के हैं और अडानी, नरेंद्र मोदी के मैनेजर हैं वास्तव में जो भी पैसा है वह नरेंद्र मोदी का है, इसी कारण अदानी के खिलाफ नरेंद्र मोदी सोचते भी नहीं है… कुछ इस प्रकार की भाषा का उपयोग करते हुए सदन के अंदर गंभीर से गंभीर आरोप भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर खुला करते चले गए.
तो नरेंद्र मोदी बीजेपी हेड क्वार्टर में अपने भाषण में सभी भ्रष्टाचारियों पर हो रही कार्यवाही में उनके एकजुट हो जाने पर अपना राष्ट्रीय संबोधन दीया और उनके इस संबोधन को पूरे मीडिया ने लगभग लाइव टेलीकास्ट दिखाएं, जैसे वे दिल्ली के लाल किला से बात कर रहे हैं… अब बारी आई कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे कि

उन्होंने पलटवार कर फिर पूछ है 20000 करोड़ रूपया अदानी की इंडस्ट्री में लगा हैं किसका है…? जिसके लिए केजरीवाल दिल्ली के सदन में साफ कर रहे थे कि वह किसका है.
कुल मिलाकर पूरी राजनीति पारदर्शी है और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर. पूरी ईमानदारी से पारदर्शी तू भ्रष्टाचार-तू भ्रष्टाचारी का खेल हो रहा है यह बात अब नहीं कही जा सकती है कि कुछ छुपाया जा रहा है…. भ्रष्टाचार को इतना आम कर दिया गया है कि नागरिक भ्रष्टाचार-अप्रूव नागरिक बन जाए .उसकी सोचने और समझने की क्षमता सिर्फ इस बात पर रहे भ्रष्टाचार राजनीतिक दलों का जन्मसिद्ध अधिकार है.. उसे कौन कितना छुपा सकता है कितनी जोर से दूसरे पर आरोप लगा सकता है यह सुनिश्चित करने के लिए नागरिक अपना चिंतन करें… और जो इसे जोर-जोर से बोलकर अपने दामन का भ्रष्टाचार दूसरे के ऊपर लगा दे, वही सफल नेता है…. इस तरह की राजनीति से भारत का लोकतंत्र एक अलग अंदाज में चल पड़ा है…
जहां नैतिकता की लड़ाई के लिए सोचने का वक्त कम कर दिया गया है क्योंकि टीवी चैनल और पत्रकारिता के वर्तमान परिवेश ने इन तमाम भ्रष्टाचार ओं को छुपाने के लिए कलम का काम किया है. बजाय इनको पारदर्शी तरीके से लोकतंत्र में नागरिकों के प्रति अपनी जवाबदेही दिखाई जा सके.
तो समझ ले न्यायपालिका का दर्द क्या है.. पिछले दिनों रामनाथ गोयनका पुरस्कार समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीशश्री चंद्रचूर्ण ने स्पष्ट कहा है की पत्रकारिता के बिना लोकतंत्र जिंदा नहीं है ,अब सवाल यह है कि अगर पत्रकारिता ही आवश्यक विटामिन है लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए.. तो पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए इस लोकतंत्र ने क्या किया… उसने पत्रकारिता को एक संस्था की बजाए उसे दुकान की तरह क्यों फैलने दिया.. आज तक पूरे भारत में पत्रकारिता का अपना कोई स्वतंत्र निष्पक्ष सामूहिक संस्था नहीं है….? जहां पर पत्रकारिता को प्रदूषित होने से बचाया जा सके…यह 75 साल के लोकतंत्र की सबसे बड़ी असफलता है. परिणाम स्वरूप पत्रकारिता में तमाम प्रकार के प्रदूषण भर दिए गए हैं, गोदी मीडिया से लेकर, ब्लैक मेलिंग, भ्रष्टाचार और गुलामों की लंबी फेहरिस्त पत्रकारिता के और मीडिया के अंदर स्थापित कर दी गई है…. बची-कुची पत्रकारिता स्वाभाविक तरीके से लीक हो जा रही है… अन्यथा उसकी पैकिंग और घेराबंदी भ्रष्टाचारी समाज में बुरी तरह से कर रखा है…
आखिर इसकी जवाबदेही संस्थाओं की क्यों नहीं होनी..? विशेषकर न्यायपालिका की… कि आपने आखिर इसे स्वतंत्र इकाई के रूप में जीवित रखने के आवश्यक गाइडलाइन आज तक क्यों नहीं देखे हैं… आज भी पत्रकारिता में काम करने वाला शुरुआती पत्रकार या तो गुलामी के साथ पत्रकारिता के रूप को देखता है अथवा उसे कड़े संघर्ष में गुलाम भारत की भूमिका में स्वयं को खड़ा होना पाता है…और यही कारण है कि भारत की विधायिका और कार्यपालिका के तमाम गंभीर पदों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार के प्रदूषण को आम नागरिकों की मन-मस्तिष्क पर इसे सहज बनाने में लगे हुए हैं.

