
विंध्य-मैकल पर्वत श्रेणी ही वैभवशाली पुरातात्विक विरासत की अनदेखी इसलिए भी नहीं की जा सकती क्योंकि जगह जगह इसके पुरातत्वचीख-चीख कर बताते रहे हैं की हम भी कभी जिंदा थे |आज निम्नलिखित सभी संस्थाओं और जिम्मेदार लोगों का संगम अमरकंटक में है.. और इस पर लेख लिखने और विचार शक्ति का अपव्यय करने का फिलहाल कोई असर भी नहीं है.. किंतु जो प्रश्न उठ रहे हैं उन्हें यक्ष प्रश्न के रूप में हम इन सभी संस्थाओं और नेताओं तथा ब्यूरोक्रेट्स से तथा शिक्षाविदों से पूछना चाहते हैं, कि आखिर वे अमरकंटक के लिए क्या कोई सोच रखते भी हैं ….?अथवा सबके अपने-अपने तरीके ,अपने-अपने विकास हैं… अमरकंटक के विनाश की शर्त पर…? तो जो अनुत्तरित प्रश्न है वह महत्वपूर्ण और जिम्मेदार लोगों से हैं.. 4 संस्थाओं से हैं 4 प्रश्न है…. और अगर इसका उत्तर इनके पास है …तब तो विमर्श की संभावना है |अन्यथा राम की बगिया, राम का खेत…. चुग ले भर भर पेट…. यही कहा जा सकता है….
——————————————-( त्रिलोकीनाथ )——————————–
आखिर आध्यात्मिक पुत्रिलोकीनाथरुष विद्यासागर जी महाराज को “शिखर जी “की तरह “अमरकंटक शिखर “का सम्मान करना क्यों नहीं आया….?
जैन नीति शास्त्रों में वर्णन है कि 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों ने सम्मेद शिखर में मोक्ष प्राप्त किया।इसलिए विद्यासागर जी के नेतृत्व में शिखर जी की गरिमा उसकी आध्यात्मिक पवित्रता और सुचिता जैन धर्म के अनुरूप बनाए
रखने के दृष्टिकोण से शिखर जी को पर्यटन स्थल अथवा किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य के लिए लोकतंत्र में स्वतंत्र बनाए रखने का जैन समाज ने ऐतिहासिक अनुशासित आंदोलन किया और फिर उसके अनुरूप केंद्र शासन ने जैन समाज की आध्यात्मिक गरिमा का सम्मान करते हुए शिखर जी को क्षेत्र को पर्यटन स्थल बनाए जाने पर रोक लगा दी इसकी संपूर्णता और आध्यात्मिक ज्ञान के बावजूद आखिर अमरकंटक के मोक्षदायि सोन नद , महान चिर कुमारी नर्मदा तथा अन्य कई सहायक नदियों के हिंदू सनातन व्यवस्था और परंपरा तथा उसकी गरिमा के खिलाफ जाकर जिस जैन मंदिर का निर्माण कराया गया है जिसके अपशकुन, निर्माण के दौरान कई लोगों की मृत्यु के आधार पर निर्मित है।इसके लिए आखिर विद्यासागर जी महाराज का आध्यात्मिक ज्ञान क्यों करके प्रकट नहीं हुआ…? और इस आधार पर सिर्फ पैसे की बाहुबल के आधार पर निर्मित हिंसक मंदिर पर के लिए अपनी सहमति क्यों दी …? जो स्थानीय हिंदू सनातन व्यवस्था और धर्म आध्यात्मिक भावना के पूर्णतया विपरीत है क्या यह भी एक प्रकार की हिंसा नहीं है…?
यह एक जिज्ञासा मात्र है और कुछ नहीं..
कब तक नर्मदा में कल्याणिका से मल-मूत्र का प्रवाह,नर्मदा को अपवित्र करते रहेंगे..? कल्याण बाबा ..
प्राकृतिक सौंदर्य और महान आध्यात्मिक धार्मिक भावना की लगातार हत्या करने वाली कल्याणीका नाम की संस्था जो नर्मदा के नदी के प्रारंभ में उसके अंदर ही शिक्षण संस्थान बनाया गया है जिसका मल मूत्र लगातार नर्मदा को अपवित्र करता है.. आखिर कल्याण बाबा ने स्वाभाविक अपनी आध्यात्मिक ज्ञान से इस स्कूल बिल्डिंग को तोड़कर, नर्मदा के विचरण को स्वतंत्र क्यों नहीं कर रहे हैं… बल्कि उसके अंदर हिंदू सनातन व्यवस्था की पवित्रता को प्रदूषित करने वाले मल मूत्र का प्रवाह लगातार जारी रखे हुए हैं आखिर यह किस प्रकार की संत-परंपरा का हिस्सा है….? अपनी संत ऋषि परंपरा के विरुद्ध सिर्फ अपनी पहुंच के कारण वे कब तक नर्मदा में मल-मूत्र का कुंड प्रवाह कर नर्मदा को अपवित्र करते रहेंगे और मोक्षदायिनी फिर कुंवारी को प्रदूषित करने का काम करेंगे….?क्या वे तत्काल कल्याण का को तोड़कर उसे वहां से हटाकर नर्मदा को अपने गंदगी से मुक्त करेंगे…?
अमरकंटक में “निर्माण की माफिया गिरी “के विरुद्ध क्या श्वेत पत्र जारी करेंगे, मुख्यमंत्री शिवराज….?
देर से ही सही अमरकंटक में विनाशकारी निर्माण पर रोक लगाने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ऐसे किसी भी निर्माण कार्यों में प्रतियोगिता को महिमामंडन करने के लिए आखिर अमरकंटक की उपस्थित होकर अवैध निर्माणों को और उससे कारण जंगल की कटाई तथा बढ़ती भीड़ को राजनीतिक संरक्षण क्यों दे रहे हैं…? क्या एक घर छोड़कर याने अमरकंटक की कोई 5-10 किलोमीटर जमीन को छोड़कर वोट बैंक के दूसरे स्थान पर राजनीति नहीं कर सकते…? धर्म की राजनीति के प्रदूषित वातावरण में आखिर अमरकंटक के विनाश को संरक्षण कब तक मिलता रहेगा….? क्या वे अमरकंटक विशेष क्षेत्र में चिन्हित करने का काम करेंगे…; अब कोई निर्माण 0 संख्या में भी ना हो सके….? या अभी वोट बैंक के धंधे में बड़े माफियाओं को संरक्षण मिलता रहेगा…? इसके लिए श्वेत पत्र अमरकंटक पर जारी होगा…?
विलासिता और भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चुकी शहडोल के प्रदूषण नियंत्रण का वृत्त कार्यालय आखिर कब अमरकंटक के पर्यावरण और पारिस्थितिकी विशेष तौर पर भौगोलिक वातावरण में उसकी संवेदनशीलता जो उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम में सोन नद तथा नर्मदा नदी में जलधारा की एक श्रृंखला बनाते है दोनों समुद्रों को जोड़ने के लिए एक संवेदनशीलता पैदा करती है, क्या उस पर कोई विचार शक्ति, रिसर्च पेपर.. अथवा इसकी पर्यावरण परिस्थितिकी, इस क्षेत्र में होने वाले हजारों की संख्या में अमूल्य जड़ी बूटियों, पुरातत्व व प्राचीनता की समग्रता पर अपनी रिपोर्ट चाहे अमरकंटक विश्वविद्यालय हो अथवा शहडोल का प्रदूषण नियंत्रण का वृत्त कार्यालय कुछ कार्य करके, स्वयं को जीवित दिखाने का प्रयास करेगा…..?
राष्ट्रीय हरित न्यायालय (एनजीटी )भी यहां दम तोड़ता नजर आता है.. यह बड़ा प्रश्न है…? क्योंकि इसके विपरीत लगातार संसाधनों और जंगल विनाश के योजनाओं पर ज्यादा काम होता दिख रहा है.. कॉल ब्लॉक, माइनिंग ब्लॉक बनाकर तमाम उद्योगपतियों को विनाशकारी निर्माण के लिए निमंत्रण दिए जा रहे हैं… आखिर इस पर कौन काम करेगा…? यह बड़ा यक्ष प्रश्न है…. फिलहाल तो चाहे अमरकंटक विश्वविद्यालय हो अथवा शहडोल का प्रदूषण नियंत्रित कार्यालय हो इनकी दक्ष कर्मचारी और शिक्षाविद जिंदा होते नहीं दिखाई देते….? क्या अमरकंटक क्षेत्र लोकतंत्र की बलिवेदी में विनाश का पहचान बन जाएगा…? यह बड़ा प्रश्न है…

