
विंध्य आंदोलन के बवाल में बनेगा व्योहारी जिला…?
किसी भी कीमत पर आगामी विधानसभा चुनाव और फिर लोकसभा चुनाव को जीतने की राजनीति के चलते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ब्योहारी के अपने दौरे में 5 अप्रैल को व्यवहारी को जिला बनाए जाने पर कोई घोषणा करते हैं तो इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए. हाल में मऊगंज को जिला बना कर अपनी राजनैतिक इच्छाशक्ति का परिचय पिछले माह में देखा जा चुका है. शहडोल में ब्योहारी दौरे पर इसकी चर्चा गाहे-बगाहे होने लगी है तो यह मानकर चलें विंध्य प्रदेश जो पूर्व में बना हुआ था उसके पुनर्निर्माण पर कोई भी चर्चा भलाई ना हो अथवा विंध्य प्रदेश का पृथक अस्तित्व यदि पैदा होता है तो उसे धूमिल करने के लिए मऊगंज के बाद शहडोल और सीधी को कुछ हिस्से को मिलाकर व्यवहारी जिला की घोषणा करने पर यदि जल्दबाजी भी की जाती है तो वह है सुनियोजित रणनीति का और राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रतीक होगा. यह अलग बात है कि व्यवहारी जिला बनने के बाद भाजपा को इसमें कितना फायदा मिलता है..?
—————————————————————————त्रिलोकीनाथ-——
इस तरह तत्कालीन पर किन परिस्थितियों में विंध्यप्रदेश का निर्माण हुआ था और मध्यप्रदेश के विलय के बाद विंध्य प्रदेश के निवासियों को उनका हक उन्हें रोजगार प्राकृतिक संसाधनों में हिस्सा अथवा विकास में सर्वांगीण विकास पूरी तरह से कामयाब नहीं हो रहा है.. बल्कि विंध्य प्रदेश में अलग-अलग प्रकार के माफिया गिरी का दबदबा विंध्य के बाहर के लोगों का लगातार बढ़ता चला जा रहा है…. शहडोल जिले में रेत खनन अथवा अन्य खनिज मामलों में ब्योहारी क्षेत्र में सोन नदी की रेत की माफिया गिरी करोड़ों अरबों रुपए का कालाबाजार ,कालाबाजारीयों के लिए वरदान बनी रहे.. इसी तरह बाणसागर में मछली उद्योग भी एक कालाबाजारी ओ का हिस्सा रहा है… पिछले दिनों भाजपा के विधायक और विंध्य प्रदेश के पुनर्निर्माण की आवाज उठाने वाले नारायण त्रिपाठी ने इस बात पर जबरदस्त दुख व्यक्त किया कि सिर्फ रेत की कालाबाजारी के लिए और उसकी कीमत को बढ़ाने के लिए किस प्रकार से चल रहे आवागमन के रास्ते को बंद कर दिया गया था |
आज ही पत्रकार जयराम शुक्ल की रिपोर्ट में विंध्यप्रदेश को याद किया गया है
हर साल 4 अप्रैल की तारीख मेरे जैसे लाखों विंध्यवासियों को हूक देकर जाती है। 1948 को आज के दिन विंध्यप्रदेश अस्तित्व में आया था। भौगोलिक तौर पर भले ही वह विलीन हो चुका है लेकिन वैचारिक तौर पर वह हमारे दिल-ओ-दिमाग को लगातार मथ रहा है। रीवा से लेकर भोपाल, इंदौर, जबलपुर में विंध्यप्रदेश के पुनरोदय की ललक रखने वाले कई संगठन सक्रिय है। महत्व की बात यह कि यहां के युवाओं और छात्रों के ह्रदय में विंध्यप्रदेश को लेकर आग धधकने लगी है।
जो इतिहास से सबक नहीं लेता वह बेहतर भविष्य को लेकर सतर्क नहीं रह सकता इसलिए विंध्यप्रदेश का आदि और अंत जानना जरूरी है।विंध्यप्रदेश की हत्याकथा में जब भी पं.नेहरू की भूमिका का कोई भी जिक्र होता है तो उन्हें भारतीय लोकतंत्र का आदि देवता मानने वाले लोग बिना जाने समझे टूट पड़ते हैं। कुछ महीने पहले ऐसे ही किसी संदर्भ में यह लिख दिया कि शैशव काल में ही एक प्रदेश की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि उसके सबसे पिछड़े क्षेत्र ने पंडित नेहरू और उनकी काँग्रेस पार्टी को पूरी तरह खारिज कर दिया था।यह मसला अत्यंत पिछड़े सीधी(सिंगरौली सम्मिलित) जिले का था, जहाँ की जनता ने देश के पहले आम चुनाव यानी 1952 में पंडित नेहरू के तिलस्म को खारिज करते हुए उनकी महान कांग्रेस पार्टी को डस्टबिन में डाल दिया। सीधी की सभी विधानसभा सीटों और लोकसभा सीट में काँग्रेस सोशलिस्टों से पिट गई थी।
विंध्यप्रदेश के पुनरोदय को लेकर विंध्य से भोपाल-दिल्ली तक कई छोटे-छोटे समूह सक्रिय हैं। वे सभी यह सपना सजोये बैठे हैं कि उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड, तेलंगाना जैसे छोटे राज्यों के उदय के बाद विंध्यप्रदेश के पुनरोदय का रास्ता स्वाभाविक रूप से खुल जाता है। विंध्यप्रदेश का जब विलोपन हुआ था तब कहा गया था कि छोटे राज्य सर्वाइव नहीं कर सकते। यह त्थोरी अब उलट गई है।उदित हुए नए राज्य कभी अस्तित्व में भी नहीं थे जबकि विंध्यप्रदेश एक भरापूरा प्रदेश रहा है पूरे आठ साल। विंध्य की अलख जगाने वाले ये बेचारे वीरव्रती इस क्षेत्र के सभी अलंबरदार नेताओं से गुहार-जुहार लगा-लगाके थक चुके हैं, नेताओं को फिलहाल यह मुद्दा वोट मटेरियल नहीं लगता।
अपन लिख सकते हैं सो हर साल इस दिन अपने उस अबोध प्रदेश की हत्याकथा को याद कर शोक मना लेते हैं। हर साल इस दिन अपनी माटी के स्वाभिमान से जुड़ी टीसने वाली बात अवचेतन से मावाद की तरह फूटकर रिसने लगती है। हर साल ही आक्रोश शब्दों में जाहिर होता हुआ व्यक्त हो ही जाता है।
यह आक्रोश हर उस आहत विंध्यवासी का है विंध्यप्रदेश अपने संसाधनों के बल पर देश के श्रेष्ठ राज्यों में से एक होता…लेकिन उसे आठ साल के शैशवकाल में सजा-ए-मौत दे दी गई। यह एक बार नहीं हजार बार कहूंगा, कहता रहूँगा। क्योंकि नई पीढ़ी को इस त्रासदी का सच जानना जरूरी है।सन् 48 से 52 तक विंध्यप्रदेश को बचाए रखने की लड़ाई भी जान लें। लाठी-गोली खाएंगे धारा सभा बनाएंगे.. के नारे के साथ आंदोलन हुआ और अजीज, गंगा, चिंताली शहीद हुए। ये मरने वाले कोई भी पालटीशियन नहीं सरल-सहज-विंध्यवासी थे।
सन् 52 से लेकर 57 के बीच यहां समाजवादी आंदोलन पूरे उफान पर था। जन-जन की जुबान पर समाजवाद चढ़ा हुआ था। विधानसभा में सोपा के मेधावी विधायकों के आगे सत्तापक्ष की बोलती बंद थी। इसी विधानसभा में श्रीनिवास तिवारी का जमींदारी उन्मूलन के खिलाफ ऐतिहासिक सात घंटे का भाषण हुआ था जिसने लोकसभा में कृष्ण मेनन के भाषण के रेकार्ड की बराबरी की थी। भारतीय संसदीय इतिहास में यहीं पहली बार ..आफिस आफ प्राफिट.. के सवाल पर बहस हुई। समाजवादी युवा तुर्कों ने सत्ता की धुर्रियां बिखेर दी।57 नजदीक आने के साथ ही योजना बनी कि विंध्यप्रदेश का विलय कर दिया जाए। यह रणनीति नेहरूजी की प्रतिष्ठा को ध्यान पर रखकर बनी कि न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।
56 में state reorganization commission गठित हुआ। दावे आपत्ति मगाए गए। विंध्यप्रदेश के योजना अधिकारी गोपाल प्रसाद खरे ने प्रदेश की आर्थिक क्षमता के आँकड़े तैयार किए। साक्षरता, प्राकृतिक संसाधनों पर भी एक रिपोर्ट तैयार कर आयोग के सामने यह साबित करने की कोशिश की गई कि विंध्यप्रदेश की क्षमता शेष मध्यप्रदेश से बेहतर है। यह रिपोर्ट विद्यानिवास मिश्र संपादित पत्रिका विंध्यभूमि में भी छपी। विद्यानिवास जी तब विंध्यप्रदेश के सूचनाधिकारी थे।
विडम्बना देखिए, समूचे विंध्यप्रदेश का प्रशासन, उसके अधिकारी यह चाहते थे कि इस प्रदेश की अकाल मौत न हो। इस बात की तस्दीक म.प्र. के मुख्य सचिव व बाद में भोपाल सांसद रहे सुशील चंद्र वर्मा ने हिंदुस्तान टाइम्स में छपे एक लेख के जरिये की। श्री वर्मा विंध्यप्रदेश में प्रोबेशनरी अधिकारी रह चुके थे।जब छत्तीसगढ़ बना तो उनकी तीखी प्रतिक्रिया थी- यदि कोई नया राज्य बनता है तो पहला हक विंध्यप्रदेश का है। जबकि तब श्री वर्मा भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक थे, और छग अटलजी की सरपरस्ती में बना।चूंकि नेहरूजी की प्रतिष्ठा कायम करने के लिए बाँसुरी के सर्वनाश हेतु बाँस को ही जड़ से उखाड़ने का फैसला लिया जा चुका था इसलिए न तो सरकार की आर्थिक क्षमता का सर्वेक्षण देखा गया और न ही विंध्यवासियों की आवाज़ सुनी गई। तत्कालीन काँग्रेसियों के सामने तो खैर नेहरू के आगे नतमस्तक रहने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था।
विधानसभा में सोपा के विधायकों ने मोर्चा खोला। सभी नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट थे फिर भी ये सभी छुपते छुपाते विधानसभा पहुंचे मर्जर के खिलाफ श्रीनिवास तिवारी जी ने फिर छह घंटे का भाषण दिया। बाहर पुलिस हथकड़ी लिए खड़ी थी।विधानसभा सभा को छात्रों ने चारों ओर से घेर लिया। रामदयाल शुक्ल(जो बाद में हाईकोर्ट के जस्टिस बने) और ऋषभदेव सिंह(जो संयुक्त कलेक्टर पद से रिटायर हुए) के नेतृत्व में छात्रों ने विधानसभा के फाटक तोड़ दिए व सदन में घुसकर विंध्यप्रदेश के विलय का समर्थन करने वाले सभी मंत्री- विधायकों की जमकर धुनाई की। मुख्यमंत्री व स्पीकर ही बमुश्किल बच पाए।सभी छात्रों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। यह आंदोलन भी कुचल दिया गया। गैर कांग्रेस सरकारों पर पंडित नेहरू का नजला गिरना शुरू हो चुका था। इसी क्रम में बाद में केरल की निर्वाचित साम्यवादी सरकार को बर्खास्त किया गया। लाठी और संगीनों के साए में विंध्यप्रदेश को सजा-ए-मौत सुनाई जा चुकी थी। एक दिन यह अँधेरा छँटेगा, सुबह होगी और प्राची से विंध्यप्रदेश का पुनरोदय होकर रहेगा।
तो इससे यह स्पष्ट है कि शहडोल क्षेत्र की विशेषकर रेत की कालाबाजारी को ध्यान में रखा जाए तो व्यवहारी में पृथक प्रशासक बनाया जाना प्रशासन के लिए आवश्यक जिम्मेदारी भी बन गई है और अगर यह राजनीति का वोट बैंक पैदा करने की ताकत रखती है तो अगर 5 अप्रैल को विंध्य प्रदेश की घोषणा हो जाती है तो बहुत आश्चर्य की बात नहीं होगी देखना होगा शिवराज सिंह चौहान अपने वोट बैंक और स्थानीय लोकहित की मांग का मिश्रण करके अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति से क्या 5 अप्रैल को व्यवहारी जिला बनाते हैं ताकि लोग विंध्य प्रदेश की मांग पर भ्रमित ना होकर भाजपा के पक्ष में उन्हें बहुमत का साथ दें …किंतु हकीकत यह है कि चाहे बिंद प्रदेश में कितने भी जिले बन जाए विंध्य प्रदेश की अपनी एक संयुक्त प्राकृतिक संसाधन की ताकत है जिस का अधिकार स्थानीय निवासियों को ना के बराबर मिल रहा है इसलिए बिंद प्रदेश का प्रश्न तब भी और प्रबल हो जाएगा जब कई और जिले बना दिए जाएंगे… ऐसा सोचना भी गलत नहीं होगा .. 5 अप्रैल को शिवराज की जादू से ब्योहारी जिला बनता है अथवा नहीं यह जादूगर के ऊपर निर्भर होगा…

