
इस बार हत्यारों ने कहा, जय श्री राम… पिछली बार जब हत्यारे ने गोली मारी थी तब गांधी ने कहा था “हे राम..”;ऐसा गांधी स्मारक में लिखा बताया जाता है… तो क्या हम 21वीं सदी की अघोषित टेरर रहे देख हैं…?
_____________________________________________( त्रिलोकीनाथ )______
अजीब संयोग है कि आज ही जनसत्ता ने पुलवामा प्रकरण पर वहां के तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक की बात को प्रकाशित किया है जिसमें उन्होंने कहा की प्रधानमंत्री उन्हें पुलवामा मुद्दे पर सैनिकों की हत्या कांड के मुद्दे पर चुप रहने को कहा था… हालांकि पुलवामा में सैनिकों के शहीद हो जाने के हत्या का प्रकरण का संपूर्ण खुलासा आज तक नहीं हो पाया. कांग्रेस पार्टी ने भी इस पर पुनः प्रश्न किया है कि उन्हें सत्यपाल मलिक की बातों का जवाब देना चाहिए ..
बरहालउच्चतम न्यायालय में गैंगस्टर पूर्वसांसद अतीक अहमद की पत्नी ने इस प्रकार से हत्या कर दिए जाने की आशंका जताई थी.. बावजूद इसके उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी ने विधानसभा के अंदर अपने साथी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह की बातों का जवाब देते हुए साफ-साफ कह दिया था कि वे इस प्रकार के माफिया को मिट्टी में मिला देंगे …और पूर्व सांसद अतीक अहमद के अपराधी युवा लड़के की एनकाउंटर में मरने के बाद उसे दफन कराए जाने की प्रक्रिया में गैंगस्टर अतीक अहमद को शामिल नहीं किए जाने के साथ ही दफनाए गए यानी मिट्टी में मिलाए गए दिन में ही अतीक अहमद और उसके भाई को पुलिस कस्टडी में गोली मारकर हत्या कर दिए जाने से विधानसभा में कहीं भी बातें कहीं ना कहीं मिलता है… इस तरह पूर्व सांसद और गैंगस्टर अतीक अहमद की माफिया गिरी की मिट्टी में मिल जाने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में होने के बाद भी कानून व्यवस्था का मिट्टी में मिल जाना भी प्रमाणित हो गया.
यह 21वीं सदी की राजनीति में मील का पत्थर साबित होगा… क्योंकि अगर सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में भी रहते हुए हत्याएं होती हैं, चाहे वह हत्या अपराधी की ही क्यों ना हो.. तो फिर न्याय प्रक्रिया अथवा न्यायपालिका के स्तंभ की आखिर क्या जरूरत रह गई, इस लोकतंत्र. में…? क्योंकि अतीक अहमद जिसे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन आईएसआई से जोड़कर कहानी गढ़ी जा रही थी और उसकी जांच भी चल रही थी वह भी अतीक अहमद के साथ दफन हो गई कि आखिर कितने राजनीतिक इस माफिया गिरी में गैंगस्टर पूर्व सांसद अतीक अहमद के साथ भारतीय राजनीति के आतंक के साए में अपनी राजनीति की दुकान चला रहे थे…? .. तो यह एक चुनौती भारत के चुनाव आयोग के लिए भी खड़ी हो गई है कि वह क्या निष्पक्ष चुनाव पर कर्नाटक करा पाएगी…? क्योंकि वोट बैंक का ध्रुवीकरण हत्यारों के जश्न और पुलिस के संरक्षण में पूरी दुनिया में प्रयागराज से गुंजायमान कर दिया है.. अक्सर चुनाव के किसी भी गरमा-गरम उत्तेजना पूर्ण और भावनात्मक पक्षों के ध्रुवीकरण के लिए हत्या का उपयोग भारतीय राजनीति की पहचान बनती जा रही है और इसी बात की पुष्टि कहीं ना कहीं जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक में अपने अखबारी बयानों के जरिए की है.

