
नई दिल्ली,
18 अप्रैल। दैनिक जनसत्ता ने बिलकिस मामले पर अपने समाचार पत्र में कहा है सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो मामले की सुनवाई के दौरान मंगलवार को गुजरात सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति केएम जोसफ और न्यायमूर्ति बोबी नागरव की पीठ बिलकिस बानो की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने गुजरात सरकार पर अपने मामले के दोषियों को समय से पहले रिहा करने का आरोप लगाया था। पीठ ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है जहां एक गर्भवती महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उसके सात रिश्तेदारों की हत्या कर दी गई। हमने आपको (गुजरात सरकार) सभी साक्षय पेश करने के लिए कहा था। हम जानना चाहते हैं कि क्या आपने अपना विवेक लगाया है। अगर हो तो बताएं कि आपने किस सामग्री को रिहाई का आधार बनाया है। पीठ ने कहा कि हम केवल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि शक्ति का
का विशेषाधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो मामले की सुनवाई के दौरान कहा, हमने आपको (गुजरात सरकार) सभी साक्ष्य पेश करने के लिए कहा था। हम जानना चाहते हैं कि क्या आपने अपना विवेक लगाया है। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने भी रिहाई पर सवाल उठाए थे। क्या रिहाई देने के लिए गुजरात सरकार का अधिकार क्षेत्र था? किस अधिकार क्षेत्र
के तहत गुजरात ने रिहाई की? क्या अद्यलत ऐसे पीठ ने गुजरात से सरकार से पूछा कि दोषियों की निकाय को रिहाई पर विचार करने को कह सकती रिहाई करके आप क्या संदेश दे रहे है? आप सेब की तुलना सतरे से कैसे कर सकते हैं? इतना ही नहीं आप एक व्यक्ति की हत्या की तुलना सामूहिक हत्या से कैसे कर सकते हैं? है जिसका अधिकार क्षेत्र न हो ? हम इन सब पहलुओं पर विचार करेंगे। पीठ ने कहा कि दोषी करार दिए गए हर शख्स को एक हजार दिन से अधिक का पैरोल मिला है। हमारा मानना है कि जब आप शक्ति का प्रयोग करते हैं तो उसे जनता की भलाई के लिए किया जाना चाहिए। आप चाहे जो भी हों, आप कितने भी ऊंचे क्यों न हों, भले ही राज्य के पास विवेक हो? यह जनता की भलाई के लिए होना चाहिए।
ऐसा करना एक समुदाय और समाज के खिलाफ अपराध है। पीठ ने गुजरात से सरकार से पूछा कि दोषियों की रिहाई करके आप क्या संदेश दे रहे हैं? आप सेब की तुलना संतरे से कैसे कर सकते हैं? इतना ही नहीं आप एक व्यक्ति की हत्या की तुलना कई वास्तविक प्रयोग हो। सत्ता का कोई अवैध प्रयोग न हो। जिस तरह से अपराध किया गया था वह
भयानक है।
जजों ने सुनवाई के दौरान कहा कि बार बार कहने के बावजूद गुजरात सरकार उम्रकैद के दोषियों की समय पूर्व रिहाई के दस्तावेज साक्ष्य हमारे सामने नहीं ला रही है। यदि आप हमें फाइल नहीं दिखाते हैं तो हम अपना निष्कर्ष निकालेंगे। साथ ही यदि आप फाइल प्रस्तुत नहीं करते हैं तो आप अदालत की अवमानना कर रहे हैं ऐसे में हम स्वतः ही संज्ञान लेकर
अवमानना का मामला शुरू कर सकते हैं पीठ ने कहा कि जब समाज को बड़े पैमाने पर प्रभावित करने वाले ऐसे जघन्य अपराधों में छूट पर विचार किया जाता है तो सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि सिर्फ इसलिए कि केंद्र सरकार ने राज्य के फैसले से सहमति जताई है, इसका मतलब यह नहीं है कि राज्य को अपना दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है। आज यह महिला (बिलकिस) है। कल यह आप या मैं हो सकते हैं। वस्तुनिष्ट मानक होने चाहिए।
यदि आप हमें कारण नहीं देते हैं तो हम
अपने निष्कर्ष निकालेंगे।
पीठ ने उत्तरदाताओं को एक मई तक फाइल पेश करके अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा। पीठ ने अब मामले को दो मई के लिए सूचीबद्ध किया है। उसी दिन अदालत के 27 मार्च के आदेश के खिलाफ सरकार द्वारा दायर की जाने वाली प्रस्तावित पुनर्विचार याचिका पर भी पीठ फैसला करेगी। केंद्र और गुजरात
सरकार दोनों की ओर से पेश हुए एएसजी एसवी राजू ने पीट से कहा-हम इस बारे में सोमवार तक विचार करेंगे कि फाइल पेशकरनी है या नहीं।

