
शहडोल संभाग का पर्यावरण के दृष्टिकोण से इसलिए ज्यादा महत्व है क्योंकि उसके क्षेत्र में विंध्याचल पर्वत श्रेणी की बड़ी जिम्मेदारी है जिसके तहत भारत की कई नदियों का उद्गम क्षेत्र शहडोल संभाग में स्थापित है सोन नदी उत्तर पूर्व तथा दक्षिण पश्चिम की तरफ बहने वाली नर्मदा नदी के अलावा ढेर सारी नदी नाले विंध्या मैकल पर्वत श्रेणियों से उद्गम होकर भारत के तृप्त करती हैं किंतु नर्मदा नदी को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और उसके वोट बैंक की हैसियत से उसका महत्व ज्यादा बढ़ाया जाता रहा है .
———————त्रिलोकीनाथ————————————
नर्मदा को तो मध्य प्रदेश का ह्रदय रेखा भी कहा जाता है नर्मदा नदी गुजरात की सागर में जाकर मिलती है तो विपरीत दिशा में सोन नदी गंगा नदी में जाकर मिलते हुए बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाती है इस तरह हमारा रिश्ता पूरे भारतवर्ष से इन नदियों के सहारे रिश्ते हुए प्रवाहित होता रहता है किंतु पर्यावरण और पारिस्थितिकी के दृष्टिकोण से जो संवेदनशीलता, जो गंभीरता और जो प्रदूषण कारी समस्याओं से निपटने के उपाय अपनाए जाने चाहिए अपेक्षित तरीके से उन पर ना के बराबर ध्यान दिया गया है.
जैसा कि कहा नर्मदा वोट बैंक का बड़ा कारोबार है इसलिए वह राजनीति के केंद्र में रहता है किंतु भारत के पुरुष नदी याने सोन नदी के पुरुषार्थ को सत्यानाश करने के तमाम उपाय अवश्य होते रहे हैं. सोन नदी के आसपास कोयला खदानों अंडरग्राउंड माइन्स का लगातार खनन एक खतरनाक प्रक्रिया भी है हम धोखे से ही सही इस कल्पना को जीने का प्रयास करें की ओर इन पेपर मिल्स के पास स्थित कोयला खदान चाहे सोन नदी के उत्तर में हूं अथवा दक्षिण भाग में हो अथवा इसके आसपास जितनी भी अंडरग्राउंड माइन्स हो यदि सोन नदी इन कोयला खदानों में समाहित हो जाए तो उसका पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर किस प्रकार से प्रभाव पड़ेगा…?
पूछने के लिए हम संबंधित विषय विशेषज्ञ विभागों से संपर्क कर सकते हैं किंतु नमूना-टाइप के अधिकारी इन सब विषयों पर चर्चा करना तो दूर वह ऐसे कोई संवाद पर भी बचते दिखते हैं इन हालात में विषय विशेषज्ञ विभाग चाहे प्रदूषण नियंत्रण विभाग हो या खान सुरक्षा विभाग को अथवा जल संसाधन विभाग इन विभागों के अधिकारी इस विषय की संवेदना पर बिल्कुल नहीं सोचना चाहते… वह चर्चा करने से भी बचते हैं, आदिवासी जाति के जो अधिकारी और कर्मचारी हैं उनकी रूचि इस आदिवासी विशेष क्षेत्र को बचाने में अक्सर दिखाई दी जाती है किंतु उद्योगपति और कोल ब्लॉक्स को मनमानी तरीके से नीलाम कर इस क्षेत्र को खंडहर कर देने वाली सिस्टम की इन विषयों पर कोई रुचि नहीं है. प्रदूषण नियंत्रण विभाग औपचारिकता के नाते लोक सुनवाई के माध्यम से खानापूर्ति करऔर समस्याओं को लेकर कभी गंभीर नहीं रहा. संभाग बनने के बाद ही यह नकारा विभाग शहडोल में बस गया है. इसके पहले एक छोटा सा कमरा पेपर मिल इंडस्ट्री की गोद में सोन नदी को बर्बादी का साक्षी रहा है. कहते हैं ट्यूबवेल की 2:5 किलोमीटर का अंतर होना चाहिए किंतु यह अब कथित तौर पर गए जमाने की गुजरी बातें हो गई हैं क्योंकि अव्यवस्थित और अराजक तरीके से जिस प्रकार विकास हो रहा है उससे अगर ढाई मीटर में भी ट्यूबवेल हो रहा है तो आश्चर्य नहीं मानना चाहिए….
इन हालातों में पर्यावरण परिस्थितिकी कितनी बदतर होगी कुछ कहा नहीं जा सकता. हम शहडोल नगर के सैकड़ों बर्फ से संरक्षित विरासत के तालाबों को भी बचा पाने में नकारे साबित हुए हैं अब तो प्रधानमंत्री आवास इन तालाबों के अंदर सरकारी पैसा खर्च करके बनाए जा रहे हैं कई तालाब प्रधानमंत्री आवास से लबालब हो चुके हैं…
तालाबों को लेकर कहने को तो प्रधानमंत्री तक चिंतित हैं कि उन्होंने अमृत सरोवर तालाबों का निर्माण कर इतिहास रचा है किंतु इतिहास में पड़े तालाबों को नष्ट करने का काम उन्हीं के शासन प्रणाली में पूरी तन्मयता से हो रहा है. शहडोल नगर में इसकी पारदर्शी तरीके से पहचान की जा सकती है की कितनी ही तालाब प्रशासनिक लापरवाही से माफिया गिरी में बंदरबांट के शिकार हो गए. शेष बचे तालाबों के लिए शासन की कोई योजना समझ में आती नहीं.
आज विश्व पर्यावरण दिवस है 8 तारीख को नगर निवेश एक बैठक करने जा रहा है शहडोल कलेक्ट्रेट सभा कक्ष में जिसने शहडोल 2035 तक किस प्रकार का बनाया जाएगा उसकी रूपरेखा बनाई गई है उस पर चर्चा हो जो आपत्तियां आई हैं उसका निराकरण होगा. लेकिन इसी नगर निवेश ने जब 2011 में इसी प्रकार से आपत्तियां आहूत की थी उनका सही ढंग से निराकरण आज तक नहीं हुआ… उस समय जो तालाब उनके रिकॉर्ड में जिंदा थे उन्हें प्रशासन ने 2035 तक मिल बांटकर गायब करवा दिया है. शहडोल नगर के जेल बिल्डिंग के बगल का तालाब अब प्लाट का रूप लेता जा रहा है अब तालाब के अंदर अतिक्रमण तेजी से हो रहा है.. कहते हैं प्रधानमंत्री आवास के तीन मकान बना दिए गए हैं ऐसे में जब रोज नजर पड़ने वाली तालाबों को बचा पाने में हमारा लोकतंत्र सक्षम नहीं है तो भगवान ही मालिक है …शहडोल जैसे आदिवासी विशेष क्षेत्र का जहां पर्यावरण परिस्थितिकी का लगातार विनाश होता है. सब कुछ भगवान भरोसे है अगर लोकतंत्र का भ्रष्ट सिस्टम ठीक करने में कम से कम मूलभूत आवश्यकताओं तालाब ,जंगल, नदियों को बचा पाने में अगर नपुंसक साबित हो रहे हैं तो वह दिन दूर नहीं जब शहडोल में पीने के पानी लाले पड़ जाएंगे और यही पर्यावरण परिस्थितिकी विनाश का कारण बनेगी.. फिर “का वर्षा जब कृषि सुखाने…” अंदाज़ पर रोते रहने के अलावा और कोई प्रश्न खड़ा नहीं रहेगा.

