
वैसे हम तो आदिवासी विशेष क्षेत्र के लोग हैं हमारे लिए भारतीय खेलों में दुनिया स्तर पर जाना ही एक बड़ी चुनौती है गोल्ड मेडल या ओलंपियाड के खेल तो सपने के समान हैं. इसलिए दुनिया स्तर की खेल प्रतिभा से मिलने वाले गौरव का अभिमान या गर्व हमें दूर-दूर तक नहीं छू पाता. लिखने को तो इन दिनों मीडिया या सोशल मीडिया तो शहडोल में मिनी ब्राजील का सपना देख रही है और लिख भी रही है क्योंकि उसे लिखना हैऔर आशा पर आकाश टिका है निश्चित रूप से फुटबॉल के बेहतरीन खिलाड़ी शहडोल से एक ऊंची उड़ान में ऊपर जा सकते हैं और जमकर खेले भी हैं किंतु शहडोल में वह गर्व का कारण नहीं बन पाया, कहना चाहिए प्रबंधन तो फेल रहा.. इसी प्रकार से छोटी-छोटी स्थानों से आम आदमियों की परिवार की बेटियां और बेटे अपनी पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ एक मुकाम पर पहुंचते हैं शहडोल की पूजा वस्त्रकार का नाम भी इसमें दिया जा सकता है जो महिला क्रिकेट स्टार के रूप में अपना नाम के साथ शहरों का नाम भी ऊंचा कर रहे हैं. और जब भी हम पर्दे पर देखते हैं हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है..किंतु इसी प्रकार की मेहनत और कड़ी मशक्कत के बाद जब कोई खिलाड़ी गोल्ड मेडल ,रजत मेडल . ताम्र पदक लेकर आते हैं और अगर वह ओलंपियाड, एशियाड में अपनी कीर्तिमान स्थापित करते हैं तो निश्चित तौर पर वह देश की विश्वास को जीत चुके होते हैं.. उनकी विश्वास पर प्रश्नचिन्ह उठाना भी एक पाप की तरह है लेकिन अगर हमारे बेटियां महिला पहलवान जब अपना कोई रोना या दुख एक मुकाम में पहुंचने के बाद उन्हें लगता है कि कोई सुन रहा है क्या सुन सकता है तो वह कहती हैं तो उन्हें अनदेखा करना बेहद अपमानजनक है….आखिर उनके पुरुषार्थ का परिणाम क्या है, धर्म-संस्थापनाइतनी अल्पजीवी क्यों होती है कि हर बार अधर्म करना अपना फन फैलाकर खड़ा हो जाता है
___________________(त्रिलोकीनाथ.)________________________
अगर वह झूठ भी बोल रही हैं तो भी उसकी जांच उतनी ही पारदर्शिता से होनी चाहिए. क्योंकि भारत में विश्वास जीत चुकी इन बेटियों के साथ वास्तव में किसी ने विश्वासघात तो नहीं किया है…? किंतु भारत में बेटियों के साथ छुआछूत अथवा भेदभाव पूर्ण नागरिक व्यवहार भारत की पुरुषार्थ पर कलंक लगाता है. तब जब जंतर-मंतर में बैठी हुई हमारी बेटियां अपने दुख को, सार्वजनिक जरिए प्रकट करके एक पारदर्शी कुश्ती महासंघ का रास्ता अपनाती हैं तो उन्हें अपमानित करने के 1000 तरीके भारत की पूंजीवादी व्यवस्था पर बैठे तमाम विधायिका के लोग उन्हें नजरअंदाज करने की पूरी ताकत लगा देते हैं. दुख तब होता है जब महिला होकर इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन की अध्यक्ष पी.टी उषा एक खिलाड़ी है वह अनुशासन सिखाने की बात करते हैं. यह अलग बात है उनका जमीर जिंदा हो जाता है और वह महिला बनकर व्यक्तिगत तौर पर इन महिलाओं के पास लड़कियों के पास उन्हें सांत्वना देने पहुंच जाती है.
लेकिन इसी दिल्ली में बैठी हमारे महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपती मुर्मू के कान तक यह बात अगर नहीं पहुंच पा रही है तो इसका मतलब है कि हमारा सिस्टम 75 साल में तथाकथित अमृत काल तक पहुंचते-पहुंचते बहुत खोखला हो चुका है उन्हें अपनी बेटियों की आवाज सुनाई नहीं दे रही है. अगर वह झूठ भी बोल रही है तो झूठी आवाज भी क्यों नहीं सुनना चाहिए….?
आज मैं धरना स्थल पर जंतर-मंतर पहुंचा, पुलिस के चारों तरफ से मुझे ऐसा लगा कि जैसे खुला जेल अघोषित तौर पर बना दिया गया है. मात्र एक गलियारा हमें धरना स्थल पर पहुंचने का रास्ता दिया. लोक समर्थन देने पहुंच रहे हैं लेकिन उन्हें प्रशासनिक खौफ का सामना करना पड़ता है. मैंने धरना प्रदर्शन पर पहलवान बजरंग पूनिया से वास्तविक हालात जानने चाहे. उनका दर्द इस बात में चाहता था, क्यों उनका अपना लोकतंत्र, उनकी अपने नेता उन्हें झूठा साबित करने में क्यों लगे हैं.. उन्हें किस बात पर आश्चर्य लगता था कि इस मामले में पीड़िता दीवार की बात सुनने की बजाय आरोपी बृज शरण सिंह की बात मीडिया लोगों को सुना रहा है…?
और भी कई बातें उन से चर्चा के दौरान सामने आई इन बातों से यह बात स्पष्ट हुई की अगर बात झूठी f.i.r. की भी है तो भी क्या वह नहीं सुनी जानी चाहिए या पुलिस अंतर्यामी है और उसे मालूम हो चुका है कि बृजभूषण सिंह पूर्ण पवित्र चरित्र का धनी व्यक्ति है.. और ऐसे धनवान व्यक्ति पर पुलिस पूछने की भी हिमाकत नहीं कर सकती.. कभी यही हालात लाखों-करोड़ों पावर रखने वाला संत आसाराम के भी थे..यहां तक कि आज भी उसके गुलाम उसे भगवान मानते हैं किंतु छोटी सी लड़की ने उसके पूरे चरित्र को दागदार घोषित कर दिया.
इतना तो राजनीति में रहने के बाद बृजभूषण सिंह संत आसाराम जैसे धार्मिक व्यक्ति से कमतर चरित्रवान होंगे.. क्योंकि उनका काम ही अक्सर यह बताता है की वह संत नहीं है राजनेता है और राजनेताओं को कई कूटनीतिक गतिविधियों में शामिल रहना पड़ता है चाहे वह कितनी भी दूषित क्यों ना हो…?
और इन सबसे ज्यादा दुखद यह है कि भारतीय जनता पार्टी जैसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पार्टी में एक भी महिला ऐसी निकलकर नहीं आ रही है जो इन आरोपों की जांच करने का भरोसा इन बेटियों को दे सकें…? इसलिए भारत के नागरिकों को सिर्फ 50 पैसे का पोस्टकार्ड खर्च करके भारत के महामहिम राष्ट्रपति के सामने गुहार क्यों नहीं लगाना चाहिए..? की गोल्ड मेडलिस्ट बेटियों कि झूठ ही सही बातों को निर्भयता के साथ पुलिस को काम करने देने के लिए पारदर्शिता पूर्ण कार्यवाही हेतु कोई एक ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए ताकि भारत के तमाम नागरिकों को इस शर्म से न गुजरना पड़े की बेटियां चिल्लाती रही और राजसत्ता अट्टहास करती रही….. उम्मीद करना चाहिए कि महामहिम राष्ट्रपति महिला होने का सुरक्षित अधिकार एक गोल्ड मेडलिस्ट बेटी खिलाड़ी को अवश्य देंगी अन्यथा महामहिम तो पहले ही कह चुकी हैं कि भारत के जेलों में कैसे लोग बंद रहते हैं …और कैसे-कैसे लोग बाहर घूमते हैं…

