
धनबाद (झारखंड), 9 जून (भाषा)
झारखंड के भौरा कोलियरी क्षेत्र में शुक्रवार को अवैध खनन के दौरान एक खदान के धंसने से कम से कम तीन लोगों की मौत हो गई और कई अन्य लोगों के उसमें फंसे होने की आशंका है। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी।.घटना यहां से करीब 21 किलोमीटर दूर भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) के भौरा कोलियरी क्षेत्र में सुबह साढ़े 10 बजे हुई।.धनबाद के सिंदरी इलाके के पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) अभिषेक कुमार ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि घटना में मारे गए लोगों और खदान में फंसे लोगों की वास्तविक संख्या का अनुमान तभी लग पाएगा, जब बचावकर्मी पीड़ितों का पता लगा लेंगे।.एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि कई स्थानीय ग्रामीण अवैध खनन में लगे हुए थे, जब खदान धंसने की घटना हुई। .प्रत्यक्षदर्शी ने बताया, ‘‘स्थानीय लोगों की मदद से मलबे से तीन लोगों को बाहर निकाला गया और अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।’’.भौरा थाने के निरीक्षक बिनोद ओरांव ने कहा कि बचाव अभियान जारी है
नयी दिल्ली, नौ जून (भाषा) कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने तमिलनाडु के एक मठ के प्रमुख के साक्षात्कार का हवाला देते हुए शुक्रवार को कहा कि भारतीय जनता पार्टी का यह ‘फर्जी’ दावा बेनकाब हो गया है कि ब्रिटिश शासन ने सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर राजदंड (सेंगोल) देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपा था।.रमेश ने एक अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित थिरुवावदुथुरै अधीनम मठ के प्रमुख के साक्षात्कार उल्लेख किया और कहा कि जब नेहरू को राजदंड भेंट किया गया था तो उस समय न तो लॉर्ड माउंटबेटन और न ही चक्रवर्ती राजगोपालचारी मौजूद थे। नेहरू को उनके आवास पर 14 अगस्त, 1947 को यह राजदंड सौंपा गया था।.
नयी दिल्ली, नौ जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा बनाए गए उन नियमों को वैध ठहराया, जिनके तहत अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराने वाले उम्मीदवारों को शीर्ष बार निकाय द्वारा मान्यता प्राप्त कॉलेज से कानून का कोर्स पूरा करने की आवश्यकता होती है।न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संजय कुमार की एक अवकाशकालीन पीठ ने उड़ीसा उच्च न्यायालय के एक आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें उसने कहा था कि बीसीआई अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 24 के तहत निर्धारित नियम के अलावा नामांकन के लिए कोई शर्त नहीं जोड़ सकता है। .उच्च न्यायालय ने रबी साहू को एक वकील के रूप में नामांकित करने का निर्देश दिया था, इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने कानून की डिग्री एक ऐसे कॉलेज से प्राप्त की थी जिसे बीसीआई द्वारा मान्यता प्राप्त या अनुमोदित नहीं किया गया था।

