
हमारी प्रकृति वास्तव में आदिवासी प्रकृति क्षेत्र के निवासी हैं इसलिए प्रधानमंत्री के आने से बहुत आशान्वित रहे. मध्य प्रदेश के शासन और प्रशासन का कम से कम 15 दिन का तो सर्कस रहा है “प्रधानमंत्री आ रहे हैं -प्रधानमंत्री आ रहे हैं…”. अरबों रुपए की फिजूलखर्ची हुई. फेसबुक में एक सज्जन ने टिप्पणी की आयी कि “कम से कम एक घिसलपट्टी की घोषणा ही कर जाते….” .अगर इलेक्शन कमीशन ने चुनाव की घोषणा की होती तो हम आचार संहिता मानकर मन को समझा लेते की मजबूरी है कोई घोषणा नहीं कर सकते…
___________________( त्रिलोकीनाथ )_______________________________
तो फिर प्रधानमंत्री आए तो उन्होंने जो किया “सिकल सेल एनीमिया” का बटन दबाकर कार्यक्रम को लांच किया वह दिल्ली में बैठकर भी हो सकता था, वीरांगना जनजाति समाज की रानी दुर्गावती के नाम पर जो चांदी का सिक्का जारी करना था या पोस्ट टिकट जारी करना था वह भी दिल्ली से हो सकता था.
हमें याद है महामहिम राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा जी को जब शहडोल के निवासी विंध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे पंडित शंभूनाथ शुक्ला के बारे में इस पुस्तक का विमोचन करना था तो राष्ट्रपति भवन में ही कर दिया था. तो यह सब दिल्ली से भी हो सकता था ऐसा अनुभव बताता है. फिर प्रधानमंत्री शहडोल और पकरिया क्यों आए थे…..? और उनके भाषण का निष्कर्ष क्या रहा..? जनजाति समाज से उनकी प्रेम और निष्ठा पर कोई प्रश्न नहीं उठाता और उठा भी लेगा तो क्या करलेगा…? वे प्रधानमंत्री जो है.
तो सवाल उठ
ता है प्रधानमंत्री जी को यहां आने की क्या जरूरत पड़ी थी.. पूरे भाषण का लव्वोलुआब सिर्फ इतना निकला कि उन्होंने कांग्रेस नेता दलवीर सिंह को महान
आदिवासी नेता के रूप में स्थापित कर दिया.वह चाहते तो लंबे समय तक
उन्हें दोबारा रिपीट किया जा सकता है. क्योंकि विकल्प में कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी दोनों ने ही वैकल्पिक नेतृत्व शहडोल में अभी तक नहीं दिया है. दलवीर सिंह की विरासत को सम्मानित बनाए रखने का घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुखारविंद से शायद पहली बार सुनी गई है. नरेंद्र मोदी जब भी कुछ बोलते हैं तो बहुत सोच समझकर बोलते हैं. वह कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री के लीडर है. जो कॉरपोरेट कल्चर उन्हें एलाऊ करता है उसी का वह अनुगमन करते हैं. और दलवीर सिंह का नाम महान नेताओं में बोलने के पीछे पूरी सोच स्पष्ट होती है… यानी अगली विधानसभा नहीं, लोकसभा की चुनाव की तैयारी में उन्होंने पूरा फोकस कर रखा है… प्रधानमंत्री को मालूम है लोकसभा की तैयारी में किस नेता को कहां कैसे-कैसे उपयोग किया जाना है. फिर चाहे वह कांग्रेस का ही क्यों ना हो, उसे अपना नेता कैसे बना लेना है.…
. यह तो उनके भाषण का सार हो गया. जब मुख्यमंत्री शिवराज ने उन्हें बताया की आदिवासी जनजाति समाज की रानी दुर्गावती के बलिदान को 500 वर्ष हो जाएंगे उन्होंने बिना सोचे समझे एक झटके में रानी दुर्गावती को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की तमाम प्रकार की घोषणा कर डाली. यह सोच तो प्रदेश के नेताओं को दूर-दूर तक नहीं था इसलिए वह अचंभित भी थे… यही नरेंद्र मोदी की कार्यशैली का विशिष्ट हिस्सा है. किंतु भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची में संरक्षित आदिवासी विशेष क्षेत्र में खुलेआम चल रही नीतिगत माफिया गिरी के तौर-तरीके पर उन्होंने कोई बात नहीं कही; ना ही इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधन पर आधारित रोजगार के अवसर पर कोई बात कही.
इस बार उन्होंने सब कुछ अचानक कहा… अचानक उन्हें याद आया कि आयुष्मान कार्ड में 5 लाख रुपए की मुफ्त सेवा की गारंटी विपक्ष की तमाम गारंटी का बड़ा जवाब हो सकता है उन्होंने तत्काल देवेंद्र कुमार कोल का आयुष्मान कार्ड अपने कंधे के बगल में रखा और अपनी उंगली मुफ्त पर रखते हुएको दिखाकर कहा यह गारंटी मोदी की गारंटी है…. की वह ₹500000 का एटीएम कार्ड स्वास्थ्य के लिए हर लाभार्थी को देता है.. साथ ही उन्होंने याद दिलाया कि 80 करोड़ लाभार्थियों को फ्री राशन भी देते है (यह अलग बात है कि सब कुछ जनता के टैक्स से जो पैसा एकत्र होता है उसी से दिया जाता है पार्टी फंड से ₹1 भी नहीं दिया जाता है अथवा खुद की जेब से…) बाकी जो भी विपक्ष कांग्रेश व अन्य पार्टियां गारंटी दे रही हैं वह सब बड़े साजिश का हिस्सा है इस तरह प्रधानमंत्री की यात्रा शहडोल के लिए कुछ बड़ा प्रतिफल नहीं दे पाया….
जबकि अवसर था कि वह यानी प्रधानमंत्री चाहते तो मुफ्त की आदिवासी विशेष क्षेत्र में स्थापित उन्ही महान आदिवासी नेता दलवीर सिंह के द्वारा स्थापित किए गए
शहडोल आकाशवाणी केंद्र को पुनः संचालित किए जाने की घोषणा कर सकते थे या तो कोई भारतीय जनता पार्टी और उनकी कॉरपोरेट पॉलीटिकल इंडस्ट्री प्रधानमंत्री के शहडोल यात्रा में इसे बता पाने में चूक कर गई. क्योंकि आकाशवाणी के मामले में केंद्र सरकार ही निर्णय ले सकती है… उसी के निर्णय से शहडोल आकाशवाणी प्रतिबंधित हो गया है.. जो पूर्व केंद्रीय मंत्री कांग्रेस नेता दलबीर सिंह की एक महान उपहार शहडोल के लिए दिया गया था…
इसी तरह इस आदिवासी विशेष क्षेत्र को. या फिर जो कथानको में कभी हिमालय से भी बड़ा दुनिया का
सर्वाधिक बड़ा पर्वत था विंध्य पर्वत श्रेणी के लिए आदिवासी जनजाति समाज से जुड़े आयुर्वेदिक संस्थान जड़ी बूटियों कि राष्ट्रीय स्तर पर रोजगार परक किसी बड़ी संस्था की स्थापना की घोषणा की जा सकती थी. शायद जिसमें चूक हो गई…? अथवा भाजपा की झोली में इस आदिवासी विशेष क्षेत्र के लिए विकास परक कोई सोच ही उनके कॉर्पोरेट यूनिट ने तय नहीं किया है…?
कुछ नहीं तो सांप्रदायिक पृष्ठभूमि में आदिवासी विशेष क्षेत्र के दूरस्थ अंचलों पर तेजी से बढ़ रहे गैर आदिवासी समाज मुसलमान और ईसाई गांवों के विकास के बारे में तथा आदिवासियों की सुरक्षा के बारे में कुछ संदेश दे जाते…? उसमें भी कोई संदेश देने में प्रधानमंत्री की यात्रा लगभग विफल रही. ऐसे में यदि फेसबुक में कोई व्यक्ति यह लिखता है “..कम से कम घिसलपट्टी तो दे ही जाते….” सचमुच में निराशा की एक अंतिम आस्था है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा से शहडोल को सिर्फ निराशा हाथ लगी है ऐसा कहना गलत नहीं होगा…? क्योंकि उनके द्वारा प्रचारित दुनिया का इतना बड़ा नेता भारत के प्रभावशाली प्रधानमंत्री अपने पीछे आखिर क्या छोड़कर गए हैं.. चुनाव तो वह फिर भी जीतना होगा तो कांग्रेस के नेताओं के भरोसे ही जीत जाएंगे उनकी असफलता कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री की एक बड़ी सफलता होती है… अब तक तो यही समझ में आया है. देखना होगा जब दोबारा प्रधानमंत्री चुनाव के वक्त आएंगे तो क्या झुनझुना लेकर आते हैं….?





