
6 इंजन की सरकार और लोकतंत्र के भयावह चेहरे
अगर देश की महिला मामलों कि अपरिपक्व मंत्री स्मृति ईरानी का नाम “स्मृति मणिपुरी” होता तो क्या वह उसी प्रकार से विस्फोट कर रही होती जिस प्रकार से गोवा के शराब मामलों में जब उनकी लड़कियों का नाम आया तब उन्होंने प्राइवेसी को लेकर हाय तौबा मचा दिया…? हम यह नहीं सोचना चाहते स्मृति ईरानी के परिवार के साथ मणिपुर जैसी दुर्दांत कारी मानवी असामाजिक घटनाएं सिर्फ इसलिए होना चाहिए था क्योंकि उनकी संवेदना महिलाओं के प्रति जिंदा हो सके; यह भी एक अमानवीय सोच होगी… क्योंकि स्मृति ईरानी की स्मृति, मणिपुर के मामले में खत्म हो गई थी!
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लेकिन इतना तय है कि अगर देश के गृहमंत्री अमित शाह देर से ही सही मणिपुर के दौरे पर गए थेतो उन्हें मालूम रहा होगा कि मणिपुर में क्या घटनाएं हुई…? उनकी चुप्पी और भी ज्यादा खतरनाक रही अगर उन्हें मालूम था इसका वीडियो बना हुआ है! और वह राजनीतिक उद्देश्य पूर्ति के लिए पूरी दुनिया के सामने रिलीज किया जा सकता है।
जैसे भारतीय जनता पार्टी के सांस्कृतिक विरासत में बाल, किशोर और युवा अवस्था में आने के बाद मध्य प्रदेश के सीधी
जिले के कुबरी गांव का कोई ब्राह्मण युवा प्रवेश शुक्ला किसी दलित वर्ग के दसमत के ऊपर सरेआम पेशाब करता है और इसके बाद उसका वीडियो निहित उद्देश्य जारी किया जाता है, यह जांच का विषय हो सकता है कि दोनों शराब पिए हुए थे और शराब-शराब खेल रहे थे, यह भी अलग बात है कि सदी की वीभत्स कारी बीमारी कोरोना के काल में शिवपुरी जिले में पानी पीने गए एक युवा विकास शर्मा को वहां का दबंग दलित समुदाय उसे अपनी शराब पीने पर मजबूर किया
और वह विकास शर्मा अंततः आत्मग्लानि से फांसी लगाकर मर गया, क्योंकि उसे न्याय की उम्मीद खत्म हो गई थी, उससे भी ज्यादा खतरनाक यह था कि उस गांव से विकास के परिवार को भाजपा की कानून व्यवस्था के संरक्षण में कोई सुरक्षा नहीं मिली और वह अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए दूसरी जगह आकर जीवन यापन करने लगा।
यह भी दीगर बात है कि दोषी पकड़े गए किंतु विकास के के परिवार को न्याय क्यों नहीं मिला और कुबरी के दलित परिवार को
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अपने राज महल में “सुदामा और कृष्ण” के संदर्भ में उसका स्वागत किया उसके पैर पखारने (धोने ) का काम किया और उसे उसका स्वाभिमान लौटाने के साथ पूरे दलित समाज को संदेश दिया ताकि उनका वोट बैंक खड़ा हो सके । और दूसरी तरफ कुबरी गांव में प्रवेश शुक्ला के निर्दोष माता-पिता, दादी ,पत्नी और 2 साल के बच्चे को थाने में बुलाकर मानसिक सामाजिक प्रताड़ना दी गई… बल्कि इनके रहने का मकान भी तोड़ा गया। जिसके वीडियो बनाए गए और समय के हिसाब से जारी किए गए।
यह 20 साल की सत्ता वाली स्वच्छ चाल चरित्र और चेहरा का दावा करने वाली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्देशों पर संचालित भारतीय जनता पार्टी के सामाजिक न्याय का उदाहरण था..?
ऐसे में अगर उनकी सोच के अनुसार सामाजिक न्याय की पवित्र-बर्बरता को पूर्वोत्तर के मणिपुर प्रांत में जनजाति समाज के अंदर वर्ग संघर्ष में न्याय करना होता और अगर न्याय का दृष्टांत 3 महिलाओं को निर्वस्त्र करके कथित तौर पर उनके साथ बलात्कार करके और निर्वस्त्रता स्थिति में रैली निकालकर महिला अंगों के साथ सार्वजनिक मर्यादा हीन अमानवीय प्रदर्शन करते हुए यदि कोई वीडियो बन रहा था और वह देश की उनकी भाषा में डबल-इंजन सरकार एक मणिपुर में भाजपा सरकार और दूसरी केंद्र की भाजपा सरकार की जानकारी में था, ऐसे में यह चुप्पी एक खतरनाक प्रयोगशाला की तरह आखिर किस के निर्देश पर संचालित हो रही थी ?
और जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाषा में समझे जैसा कि उन्होंने अमेरिका में कहा था कि “सोशल मीडिया पांचवा स्तंभ” है तो पांचवा स्तंभ ने जब वायरल किया तब
बिना अचंभा के R.SS. को समर्पित भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नींद जैसे टूटी हो और बहुत ही सधे हुए राजनीतिक शब्दावली में उन्होंने इस विश्वव्यापी अमानवीय घटनाक्रम को राजनीतिक परिदृश्य में बदलने का प्रयास किया…तथा निर्वस्त्र महिला के मामलों की रैली बनाने की घटना और वायरल वीडियो पर निंदा करते हुए कहा कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ मणिपुर में भी अगर महिलाओं के साथ अन्याय होता है तो उस पर सख्त कार्यवाही की जाएगी।पीएम मोदी ने अपनी पहली टिप्पणी में कहा, “यह किसी भी समाज के लिए शर्मनाक घटना है..यह किसने किया और कौन जिम्मेदार है, यह एक अलग मुद्दा है, लेकिन इसने हमारे देश को शर्मसार कर दिया है। मैं सभी मुख्यमंत्रियों से कानून व्यवस्था सख्त करने की अपील करता हूं। चाहे वह राजस्थान हो, छत्तीसगढ़ हो या मणिपुर हो…महिला के सम्मान का मुद्दा सभी राजनीति से ऊपर है।”
तो सवाल उठेगा ही कि पूर्वोत्तर भारत के सबसे छोटे गणराज्य में एक मणिपुर को अपने पांचवें स्तंभ से इस देश ने इंटरनेट बंद करके अलग क्यों कर दिया था…? क्या गृहमंत्री को और लगे हाथ प्रधानमंत्री को भी एक कदम और जोड़े, महामहिम महिला आदिवासी राष्ट्रपति को भी यह सब संज्ञान में रहा…. और अगर नहीं रहा तो इन पदाधिकारियों के मिट्टी के शेरों को लोकतंत्र में बैठने का क्या हक है..? या फिर सब कुछ जानते हुए इसे सहज राजनैतिक अस्त्र के रूप में देखा गया यह बहुत बड़ा सवाल है।
इस घटना को मध्य प्रदेश की 20 साल वाली RSS. विचारधारा वाली भारतीय जनता पार्टी की विभिन्न समुदायों में नीतिगत तरीके से फूट डालने वाले संदेश तथा दमनकारी संदेशों की क्या परिणीति मणिपुर में विध्वंसक रूप बनकर सामने आई …?
क्योंकि यह प्रश्न इसलिए उठाना चाहिए अभी तक राजनीतिक रूप से विरक्त होकर संयुक्त होने वाली साध्वी पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती जैसी महिलाओं ने अपना सिर नहीं मुड़ाया है… ! या फिर ऐसी कोई घोषणा भी नहीं की है ? तो क्या समझा जाए कि दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का दावा करने वालीRSS और भारतीय जनता पार्टी में महिला साध्वी, संत प्रदर्शित होने वाली उमा भारती जैसी महिलाओं को मणिपुर की घटना से कोई फर्क नहीं पड़ा…?
हो सकता है इस प्रकार की सामाजिक अन्याय करने वाली घटना के दूरगामी परिणामों में सत्ता परिवर्तन हो जाए…? किंतु यह सिर्फ जनता जनार्दन को तुष्टीकरण करने वाली परिणीति होगी..
क्योंकि सत्ता का चरित्र अगर इस प्रतियोगिता पर आ टिका है की मध्यप्रदेश में जातिगत समुदाय में फूट डालने और राज करने के लिए अगर शिवपुरी तथा कुबरी गांव में पेशाब से नहलाने अथवा पिलाने की घटनाएं वोट बैंक पैदा कर रही हैं ….. या इनके इस्तेमाल हो रहा है.? ,मणिपुर में महिलाओं को निर्वस्त्र कर भारत का पुरुष समाज जिसका नेतृत्व का स्वयंभू ठेका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ले रखा है राजनीति इस दिशा पर प्रतियोगिता पर उतर आई है या इस प्रकार की विचारधारा पैदा होने में सफल हो गई है तो यह देश का आजाद होना निरर्थक साबित हो रहा है। क्योंकि देश की आजादी विभिन्न समुदायों में वर्ग भेद पैदा कर वोट बैंक बनाने तथा सत्ता में काबिज रहने के लिए निम्नतम स्तरों हथ कंडो को उपयोग कर रही है।
या फिर अगर सरकारों को नहीं मालूम तो हालात बद से बदतर हो चले हैं क्योंकि मणिपुर में उनकी डबल इंजन की सरकार नहीं है… बल्कि 6 इंजन की सरकार चल रही है दो सरकारें मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई और इन्हें यहां पर एक स्मृति ईरानी की सरकार जो महिला मामलों के मंत्रालय की मंत्री हैं, केंद्र में संविधान के शीर्ष पदों पर स्थापित 2 जनजाति समाज की महिलाएं जिसमें मणिपुर की राज्यपाल अनुसुइया उइके जी हैं और देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर प्रतिष्ठित जनजाति समाज के महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू भी हैं …जो सभी सरकारों की बड़ी सरकार भी है;
और इन सबसे ऊपर एक स्वयंभू सरकार है जो पुरुष समाज की है जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहा जाता है। तो इन 6 इंजन वाली सरकार के बावजूद अगर घटनाएं घट रही हैं चाहे वह मणिपुर के जनजाति समाज के ऊपर हो या फिर मध्य प्रदेश की सामान्य और दलित समुदाय में वर्ग भेद कराने वाली संदेशआत्मक घटनाएं हो जिसमें सामाजिक अन्याय को प्रोत्साहित किया जाता हो… तब समझना चाहिए कि यह सब कुछ प्रायोजित घटनाक्रम का हिस्सा है ।
यह उस भाषा को सहमति देता है जिसमें यह कहा जाता है कि अगर झूठ बोलने वाला और झूठ सुनने वाला दोनों उस झूठ को स्वीकार कर लें तो वह सच हो जाता है। तो क्या यही अमृत काल की कड़वी सच्चाई है और अगर यही सच्चाई है तब 6 इंजन की सरकार और इन सरकारों के प्रायोजित घटनाक्रम का समकक्ष प्रतियोगिता करने वाली तमाम विपक्षी सरकारें लोकतंत्र के भयावह चेहरे हैं।
इसमें आशा की एकमात्र किरण हमारी सर्वोच्च न्यायालय है जिसने अपने जिंदा होने का प्रमाण दिया है… वह लोकतंत्र का न्यायपालिका; जिसके चिंता-मात्र प्रकट करने पर उन्होंने (भीष्म पितामह) अपनी चुप्पी तोड़कर ना बोलने की अपनी कसम तोड़ दी थी,और उन्हें बोलना पड़ा था। किंतु जब उन्होंने बोला तो हमें सुनाई दिया हुआ-हुआ…. और इसके साथ पूरा का पूरा राजनीतिक समुदाय और उसकी पालतू मीडिया खतरनाक अंधेरी रात में “हुआ-हुआ…. हुआ-हुआ “चिल्लाता दिखाई देने लगा…. यही मणिपुर की निर्वस्त्रता से निर्वस्त्र हुए भारतीय राजनीति का चेहरा है । क्योंकि 6 इंजन में एक भी इंजन में अभी अपनी जिम्मेदारी को प्रकट रूप से घोषित नहीं किया है यानी इस्तीफा नहीं दिया है यानी कुर्सी के फेविकोल में कीड़े-मकोड़े की तरह चिपका हुआ है…..? यह स्वतंत्र भारत का अमृतकाल का अमृत है या जहर…?
यही वर्तमान भारतीय राजनीति का “प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्…”? ( jari-2)

