
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों मणिपुर के खूनी हिंसा ग्रस्त क्षेत्र की लालमी नहीं दिखाई दे रही है उन्हें राजस्थान की लाल डायरी दिखाई दे रही है उन्हें लगता है कि इस लाल डायरी में जो मंत्र लिखे हैं उससे उनको 24 के चुनाव में जनता जनार्दन मोक्ष दे देगी ,इस लाल डायरी में अपनी ललामी देख रहे हैं हालांकि उनके पास कई अस्त्र-शस्त्र हैं ईडी के प्रमुख शस्त्र संजय मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट से सितंबर तक के लिए अभय दान ले लिया है। ताकि मणिपुर के लाली को दरकिनार कर राजस्थान की लाल डायरी में से भ्रामक ललामी पैदा कर सकें अन्यथा वह तो सर्व संपन्न है प्रधानमंत्री हैं उन्हें भ्रम पैदा करने की क्या जरूरत है।अपनी ईडी सीबीआई और अन्य गुप्तचर एजेंसियों के जरिए उस लाल डायरी को वह जहन्नुम से भी खोज कर ले आते किंतु उन्हें खोजने में इंटरेस्ट नहीं है… क्योंकि उन्हें मालूम है कि तमाम संसद के अंदर अतिक्रमण करके घुसपैठ कर चुके उनके नजर में गद्दार, आतंकवादी और राष्ट्रद्रोही लोग उनकी सत्ता में बैठे प्रभु को उनसे “इंडिया” बन करके छीन लेना चाहते हैं।
इसलिए अब संविधान में शब्द को कैसे खत्म किया जाए यानी “इंडिया” को कैसे खत्म किया जाए इस पर गहन मंथन हो रहा है । कहते हैं किसी भाजपा सांसद के जरिए यह प्रस्ताव भी आ चुका है अगर मुमकिन हुआ तो पास होने में बहुत समय भी नहीं लगना है क्योंकि 302 से ज्यादा की संख्या उनके पास है।
मणिपुर में मैतेई और कुकी जनजाति समाज आदिवासी को इसके पूर्व ईसाई धर्म प्रचारकों ने अपनी धार्मिक भावना से कब्जा कर लिया है और उन्हें ईसाई धर्म से तथाकथित हिंदू धर्म मैं वापस लाना ऐसे ही जैसे कि कभी छत्तीसगढ़ के दिलीप सिंह जूदेव आदिवासियों को पैर धोकर वापस हिंदू धर्म में पवित्र करके लाते थे,
ऐसे ही जैसे कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रीशिवराज सिंह भाजपा कार्यकर्ता प्रवेश शुक्ला की आदिवासी दसमत के ऊपर पेशाब कर दिए जाने से उसे भोपाल में बुलाकर अपने राज महल में पैर धोकर पवित्र करने की वीडियो बनाकर वायरल करवा कर नये धर्म का विस्तार करते हैं।
किंतु मणिपुर में यह प्रक्रिया काम नहीं आ रही है शायद इसलिए वहां पर साम दाम दंड भेद की नीति से करीब तीन-चार माह से पवित्रीकरण का लाल खूनी रंग की हिंसा को अनदेखा किया जा रहा है। बात सिर्फ खूनी हिंसा की होती तो भारत का लोकतंत्र चुप रहता क्योंकि हिंसा का इतिहास वीरता का इतिहास से जोड़ा गया है।
लेकिन जिस प्रकार से तत्कालीन शासन धृतराष्ट्र के सभा में अग्निपुत्री द्रोपती को अपने अहंकारी सत्ता लोभी दुर्योधन के इच्छा के लिए दुशासन के जरिए निर्वस्त्र करने का काम द्वापर के युग में हुआ था कुछ उसी तरह है और उससे भी ज्यादा घृणित तरीके से आदिवासी जनजाति की 3 महिलाओं को निर्वस्त्र कर पूरी हैवानियत के साथ उनके शरीरों के साथ अभद्र व्यवहार करते हुए पुलिस प्रशासन के अप्रत्यक्ष संरक्षण में जो जुलूस निकाला गया, उसे लोकतंत्र में धृतराष्ट्र नहीं देखना चाहता इसलिए भी की इसमें कथित तौर पर निर्वस्त्र की गई एक महिला ऐसी भी थी जिसके पति सेना में भारत की रक्षा के लिए कारगिल की लड़ाई भी लड़ी थी ।और वह धृतराष्ट्र की सत्ता के मदमस्त धृतराष्ट्र बने सत्ता से अपनी पत्नी को नहीं बचा पाया। और उसकी लाज लुटती रही,
यह भी एक पैसाचिक लालमी है किंतु यह लालमी लोकतंत्र के जनता जनार्दन को जब देखने को मिली तब ढाई महीने गुजर चुके थे ऐसे में लोकतंत्र के “इंडिया” के लोगों ने जब प्रधानमंत्री से इस पर संसद के अंदर बयान देने को कहा तो वह कुछ इस अंदाज में इसे नजरअंदाज करने लगे की यही आपदा है यही अवसर है और इसी में 2024 का लोकसभा चुनाव में मोक्ष मिलना है…?
इसलिए लोकसभा को छोड़कर वह कांग्रेस शासित राजस्थान में जाकर लाल डायरी में अपनी ललामी में ढूंढ रहे हैं। और यह सब एक अनुभव से पैदा होता है, किसानों की 1 साल ऊपर चली धरना आंदोलन में करीब 700 किसान मर गए इसके पहले कोरोना के कार्यकाल में करीब 50,00,000 लोगों के मर जाने का दर्द यदि अनुभव में हो तो मणिपुर में अगर कुछ कीड़े-मकोड़े टाइप के जनजाति समाज के लोग मरते हैं… बेघर होते हैं, उससे उनकी समाधि भावना प्रभावित नहीं होती ।
उन्हें तो अपनी सत्ता की लाली, लाल डायरी में दिखती है और वह उसी का गुणगान नाम जप करते रहते हैं। देखते हैं कि जो विपक्ष के सांसद हैं लोकतंत्र की जनता जनार्दन को भारतीय संसद में स्थापित करने में लगे हैं वह कितनी मानवता से कितने त्याग से और कितने समर्पण से मणिपुर की जनता के साथ लोकतंत्र की विश्वव्यापी इतिहास में शायद पहली बार घटित होने वाली मणिपुर की निर्वस्त्र महिला कांड को किस प्रकार से भारतीय कलंक कथा का उदाहरण बनने से रोकते हैं .. अन्यथा ऐसी निर्वस्त्रता हर उस जगह है देखने को मिल सकती है जहां पुरुष प्रधान समाज वाले संगठन और भाजपा का शासन होगा…?
शायद जिस प्रकार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनदेखी की है और लगातार कर रहे हैं यह भी एक प्रयोगशाला ही है अगर सफलता मिल गई तो देश के लोकतंत्र में ऐसी निर्भयता अगर भारतीय संसद के अंदर भी देखने को मिलेगी तो उसे हमें शर्म करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए…
ऐसा अभ्यास बनाने की यह भी एक प्रक्रिया है क्यों ना इसे धृतराष्ट्र की सभा में इस प्रकार से संदेश देने का तरीका माना जाए, इसलिए भी भारतीय महिलाओं को कम से कम वे जिनकी अस्मिता महिला होने की जिंदा है जो विपक्ष में हैं उन्हें इस कथित पुरुष प्रधान समाज से अपनी लज्जा और मर्यादा को बचाए रखने का काम देवी बनकर करना चाहिए अन्यथा जिसे वह “2014 को भारत की आजादी का दिन मानते हैं यही स्वतंत्रता” के पर्यायवाची गुलाम भारत की पहचान बन जाएगा और इसे सिद्ध करने में भारतीय पत्रकारिता में घुसपैठ कर चुके सत्ता के प्रवक्ता तमाम टीवी चैनल सत्ता के अघोषित गुलाम की तरह पार्टी प्रवक्ता बनकर प्रचारित कर ही रहे हैं इसलिए भी की उन्हें अर्ध सत्य दिखाकर जनता जनार्दन में भ्रम फैलाने का पूरा अवसर मिल रहा है…. जो उनकी प्रायोजित राष्ट्रपति का हिस्सा है ऐसे में जब के सांसद मणिपुर दौरा पर लौटेंगे तो क्या कोई निष्कर्ष निकलेगा यह भी देखना होगा और जब अविश्वास प्रस्ताव के बहाने ही सही अगर भारतीय संसद का सम्मान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बचाने के लिए जवाब देने पहुंचते हैं तब क्या निष्कर्ष निकलेगे इस पर भी खास नजर रहेगी फिर हाल भाजपा सांसद बृजभूषण सिंह संसद के अंदर है पूरी आरोप-प्रत्यारोप को हाशिए में खड़ा करने के साथ और यही क्या मणिपुर का सच भी होगा यह भी देखना होगा

