
आज अपने पारिवारिक कार्यक्रम में मोहन राम तालाब के चिरपरिचित मृत पड़े पीपल के पेड़ के पास दसगात्र कार्यक्रम में गया था। वहां पर दो बालक मिले एक की उम्र करीब 8 -9 साल रही होगी और दूसरे की 11-12 साल। 8-9 साल का लड़का हाथ में सॉल्यूशन
पंचर बनाने वाला एक केमिकल लेकर उसे पन्नी में डाल रहा था, मैंने देखा और उससे सहज रूप में चर्चा करने लगा, लेकिन वह लड़का कोई जवाब नहीं दे रहा था… वह लगातार मुझे घूर रहा था, जैसे मैं उसकी साधना में भंग कर रहा हूं, इसके बाद पूरे तपस्वी भाव में 8-9 साल का लड़का बिना मुझसे कोई शिकायत किए अपने साधना के लिए तालाब के अनियंत्रित स्थान पर चला गया।जो 11-12 साल का लड़का था वह भी अपने इस साधना को अंतिम रूप दे रहा था मैं उसे चर्चा करता रहा की क्या इस सॉल्यूशन को पानी के डालने के बाद अब पियोगे या सूंघोगे…? वह तो पहले तो चुप रहा बाद में जब देखा कि मुझे कोई शिकायत नहीं है…, उसने कहा हम इसे पी ही रहे हैं, मैं कहा, क्या नाक से पी रहे हो…? उसने कहा,नहीं बार-बार फुलाते हैं इस केमिकल को पन्नी में डालकर तो यह गले के जरिए हवा से हमारे अंदर जाती है, जिसमें अच्छा नशा चढ़ता है। मैं कहा, नशा के लिए तो नाक से सूंघना चाहिए…? उसने कहा, नहीं और हंसा क्या नाक से पियेंगे… इसको..?
—————– ( त्रिलोकीनाथ)————–
उसकी योग्यता पर कि हमारे सिस्टम ने इन छोटे-छोटे बालकों को कितना परिपक्व कर दिया है वह हमसे ज्यादा योग्य हैं… और हो भी क्यों ना; जब आवारा बच्चों को लिए भी आवासीय छात्रावास खोले गए तो उसे पर करोड़ों रुपए बरस रहे थे, अभी भी बरस रहे हैं… और भ्रष्टाचारी चाहे वह प्रशासन हो या शिक्षा का परियोजना अधिकारी हो, अपने बच्चों को पालने के लिए इन छात्रावासों से करोड़ों रुपए निकाल कर विदेश में बच्चों को पढ़ाते रहे हैं.. ऐसे में जो साधना परियोजना अधिकारी चाहे वह भविष्य के बनने वाले शिक्षा मंत्री मदन त्रिपाठी हों या फिर वर्तमान के मंत्री मिनिस्टर हों… सबको इन छात्रावासों से अपना हिस्सा चाहना होता है और इस हिस्से के चक्कर में छात्रावास और योजना की मंसा शहडोल के एक कारोबारी जगवानी जी के संरक्षण में शहडोल में करोड़ों रुपए का कारोबार पूरे पारदर्शी तरीके से करती है।
कहते हैं पंचर बनाने वालों को तो ओरिजिनल मूल्य में यह सॉल्यूशन मिल जाता है लेकिन इन बच्चों को ब्लैक में यानी दुगने और तीन गुने कीमत में सॉल्यूशन दिया जाता है.. और यह सब कुछ पारदर्शी है.. इसमें कुछ छुपा हुआ नहीं। क्योंकि इन बच्चों की नशा की साधना के लिए अगर संभागीय मुख्यालय शहडोल के मोहन राम मंदिर तालाब एक छात्रावास की तरह है जहां पर इनका जीवन पल्लवित होता है तो निश्चय ही संबंधित इस प्रशासन और पुलिस का अप्रत्यक्ष संरक्षण होता है। जैसे राजस्व की दुनिया में प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर होते हैं वैसे यह पारदर्शी अप्रत्यक्ष रूप से राज्य शासन को मदद करते हैं।
इसलिए इनका धंधा नशा माफिया के साथ पूरी ताकतवर तरीके से संचालित होता है।
जगवानी जी के भी बने इस सेड में, सॉल्यूशनकारोबारी जगवानी जी के ही करोड़ों रुपए के नशा के धंधे में यह कारोबार शहडोल नगर में सफलता के साथ संचालित हो रहा है। इसे बंद करने के भी कोई प्रयास इसलिए नहीं होते कि आखिर इन बच्चों को अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 किलो अनाज, गरीबों के नाम पर देते हैं या ढेर सारी योजनाएं चलते हैं तो जगबानी जी करोड़ों रुपए का राजस्व और राज्य शासन को चलाने में मदद करते हैं। नशा तो नशा है.. नशा का अपना एक साम्राज्य है इसे अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित पुलिस का भी संरक्षण है क्योंकि पुलिस भी जानती है कि
अगर भ्रष्टाचार के लिए अनाथ बच्चों के सरकारी आवासीय छात्रावास में यह बच्चे नहीं जा सकते हैं तो शहडोल नगर में नशा के कारोबारी से जो नेक्सस इन बच्चों को मोहनलाल तालाब में या ऐसे स्थानीय अथवा पुलिस जोन पर संरक्षित कर रहे हैं तो उसमें बुराई क्या है…? लोकतंत्र इसी का नाम है…
क्योंकि मोहन राम मंदिर को सुरक्षित और संरक्षित बनाने के लिए मध्य प्रदेश का उच्च न्यायालय भी आदेश 2012 मे पारित किया है किंतु प्रशासन और पुलिस मिलकर उसे आदेश को अनदेखा करती है। क्योंकि उसे धर्म के माफिया को संरक्षित करना है। जो वोट बैंक कारोबार हिंदुत्व की भारतीय जनता पार्टी के लिए और जब कांग्रेस आती है तो उसके लिये संरक्षित करती है।
रही बच्चों के भविष्य की बात यदि उन्हें जैसे आज मैंने समझाया यह चर्चा किया तो वह उनकी साधना में भंग करने जैसा था, ऐसे बच्चों को मेडिकल इलाज की जरूरत है। लेकिन अगर मेडिकल कॉलेज में ईमानदारी नहीं है या मेडिकल व्यवसाय में ईमानदारी नहीं है क्योंकि वह भी समाज का हिस्सा है तो बच्चों के लिए जगवानी जी का यही सेड इन है। नशा के आवासीय छात्रावास के रूप में संरक्षित करता रहता है ।
अन्यथा बहुत बड़ी बात नहीं है की मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार में अगर मोहन राम मंदिर तालाब स्वतंत्र कमेटी के प्रभार में सौंप दिया जाता और यहां कुछ चपरासी या चौकीदार इस सेड को संरक्षित करते। बच्चों को यहां आने से रोका जा सकता था। बड़ी बात नहीं कि यह बच्चे कहीं और चले जाते, लेकिन मोहन राम मंदिर इन बच्चों का नशा का आवासीय छात्रावास नहीं बनता और शहडोल के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक को बार-बार यह दावा नहीं करना पड़ता कि नशे की कारोबार में उन्होंने सफलता हासिल कर ली है।
और इस क्षेत्र में वह एक मील का पत्थर साबित हो रहे हैं। यही लोकतंत्र की व्यवस्था है कि जब नशा का कारोबार पारदर्शी तरीके से भ्रष्टाचार के पारदर्शी कारोबार की तरह स्पष्ट और सर्व स्वीकार हो चुका है तो मरने वाले बच्चे जनसंख्या बढ़ोतरी के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं…, उन्हें मरना ही चाहिए …क्योंकि अगर वह नहीं मरेंगे तो हमारे लोकतंत्र के इन विधायका या कार्यपालिका में बैठे हुए उच्च अधिकारियों का पेट उनकी तनख्वाह से तो नहीं भरता है…? इन्हीं प्रकार के बच्चों की मौत से भी उनके बच्चों को पढ़ने की सुविधा मिलती है…ऐसा भी क्यों नहीं सोचना चाहिए क्योंकि यही जंगल का नियम है और संयोग से शहडोल विशेष आदिवासी क्षेत्र भी है या ने जंगल का क्षेत्र..? और कोई बात नहीं…




