विपक्षी दलों “इंडिया” ने बहिष्कार के लिए चिन्हित किया 14 एंकर….

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इंडिया ने बहिष्कार के लिए चिन्हित किया 14 एंकर….

मैं बार बार स्पष्ट करता हूं की पत्रकारिता का बुनियादी ढांचा देश की आजादी के बाद लोकतांत्रिक तरीके से स्थापित ही नहीं हो पाया, राजनेताओं ने और ब्यूरोक्रेट्स ने अंगने में नाचने वाली गणिकाओं की तरह पत्रकारिता को अपने हिसाब से नचाते रहे हैं। और बाद में यह एक ऐसे  पेसे की तरह हो गया है जैसे बनारस के कोठों में अमीर लोग जाकर विलासिता का भोग करते रहे हैं। वर्तमान में यही प्रकट स्वरूप में हो गया है। सरकारी “अधिमान्यता” पत्रकारिता की एक प्रमाण पत्र है कि आप राज्य सत्ता के कितने निकट की गणिकाओं  में गिने जा रहे हैं.. हालांकि निजी तौर पर ऐसे बहिष्कार को लोकतंत्र में अच्छा नहीं माना जाता लेकिन यह बात तब होती है जब कोई पत्रकारिता कर रहा हो.. वास्तव में पत्रकारिता का अस्तित्व ही खत्म करने का प्रयास हो गया था। यह एंकर भी थे और अपने मालिक के वे नौकर थे जो यह बहाना करते थे कि मलिक ने जो कहा है वह काम कर रहे हैं लेकिन दरअसल यह और किसी मलिक के लिए काम करते थे… इसलिए पत्रकारिता को बचाने के लिए आजादी के बाद यह एक बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग कहा जा सकता है… भारतीय शेष बची पत्रकारिता को इससे कुछ सीखना चाहिए….एबीपी न्यूज चैनल से प्राप्त

 

————–(त्रिलोकी नाथ)————

 1986 से मैंने पत्रकारिता का जीवन प्रारंभ किया बीसवीं सदी के अंत और 21वीं सदी के और शुरुआत में मैं जबलपुर से निकलने वाले दैनिक स्वतंत्र मत समाचार पत्र से करीब 5 साल जुड़ा रहा, बाद में शहडोल एडिशन  में स्थानीय संपादक के बतौर काम भी किया। कुछ कार्यकाल दैनिक जनसत्ता के साथ भी काम किया ।अनुभव में यह आया कि जब मैंने विशेष संवाददाता के रूप में था तब एक सज्जन को बतौर स्थानीय संपादक स्वतंत्र मत में  हो गए जो पद के अनुरूप नहीं थे,तब शहडोल की वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय भोलानाथ राव जी ने मुझसे कहा कि ऐसे भी कोई संपादक हो जाता है…?, यह तो बड़ी बुरी हालत है पत्रकारिता की…?

हां यह वह दौर था जब 21वीं सदी भारत के लोकतंत्र में कदम रखी थी और लोकतंत्र की पत्रकारिता पतन को प्रमाणित कर रही थी। अब तो करीब 22- 23 साल हो गए हैं… देश में जो तथाकथित प्रपंच वाली नई आजादी जो 2014 में प्रारंभ हुई उसको भी 9 साल बीत चुके हैं….

 स्वाभाविक है।पत्रकारिता के इस आजादी का पर्यायवाची ही गुलामी था और किसी के लिए हो या नहीं पत्रकारिता के लिए यह घोषित गुलामी थी। लोगों को बोलने तब तक दिया जाता था जब तक उसका प्रभाव सत्ता की गलियारों को प्रभावित न कर सके…. जैसे ही वह प्रभाव डालने लगती थी उसे पूरी ताकत लगाकर हत्या करने का प्रयास किया जाता रहा. काला बाजार और पूंजीवाद के सहारे उसे खरीद लिया जाता रहा है और यही सच है….

 ऐसे में पत्रकारिता की प्राकृतिक बुनियादी ढांचा जो लोकतंत्र के लिए हो, वह तो लगभग खत्म ही हो गया। ऐसी पत्रकारिता को राजा के पक्ष में भाट-गिरी करने से अगर हम तुलना करते हैं तो वह “भाट-समुदाय” को अपमान कर देना जैसा होगा. क्योंकि वह समुदाय राजा के हित में राजा की मंगल कामना के लिए एक ईमानदारी और पारदर्शी  का तत्कालीन सिस्टम था। क्योंकि तब पठन-पाठन और अध्ययन की स्वतंत्रता थी जिससे कई अच्छे लोग निकल कर स्वयं को प्रमाणित किये हैं । 

अब वह नहीं है… अब तो साधु संत भी रावण की तरह वेश बदलकर सीता का अपहरण करने और फिर उसकी अधिमान्यता कानूनी दृष्टिकोण से स्थापित करने का काम कर रहे हैं। शायद रावण को इसीलिए महत्वपूर्ण कारण से भी बध किया गया था क्योंकि उसने सीता का “साधु बनकर” अपहरण किया था रावण बनकर नहीं… यही हालत वर्तमान में भारतीय पत्रकारिता के हैं….

 जो पत्रकारिता का नकाब पहनकर लोकतंत्र के हित के विरुद्ध में एक भ्रष्ट सिस्टम का चरण-चुंबन कर रहे हैं और इसे वह अपना जमीर मारकर कॉर्पोरेट जगत की सफलता का कारण बताते हैं, इससे उस पत्रकारिता को बेहद धक्का लगा है जिसने देश को गुलामी से निकलने के लिए आजादी के दौर में एक हथियार की तरह महात्मा गांधी के कलमकार साधन बना था। अब हम जोर-जोर से यह कहकर कि यह भारत “मदर ऑफ डेमोक्रेसी” है और इसकी आजादी को कुचलने में उनके चरण चुंबन कर रहे हैं।

 भारतीय पत्रकारिता के लिए यह कड़े संघर्ष का दौर है कि वह अपनी विरासत की पूंजी को भी कॉर्पोरेट-व्यवसायिक-पत्रकारिता के लिए मात्र एक बनारस के कोठे की गणिका बनकर रह गई है। जो लोग इसके विरुद्ध काम कर रहे हैं उन्हें पत्रकारिता की सर्वाधिक पीड़ादायक संघर्ष को अनुभव करना पड़ रहा है ।

देश की आजादी के बाद 1947 वाली के बाद यह पहला अवसर है जब प्रमुख विपक्षी दलों के गठबंधन ने 14 ऐसे टीवी एंकर्स को सार्वजनिक करने का काम किया है जो पत्रकारिता के नाम पर अपना टीवी शो चलाते थे। जिसका असर देश के नैतिक धरातल का ताना-बाना टूट रहा था। ऐसा उनका कहना है। इसमें जिन पत्रकारों को चिन्हित किया गया है , इसका विरोध सिर्फ भारतीय जनता पार्टी और सत्ता में बैठे लोग तथा उसके लिए काम कर रहे लोग ज्यादा कर रहे हैं। क्योंकि यह 14 लोग इन्हीं के लिए संपूर्ण समर्पण भाव से दास की तरह टीवी एंकरिंग कर रहे थे, इन्हें देश से मतलब नहीं था …ऐसा प्रमुख विपक्षी दल के लोगों का मानना है वर्तमान में इन विपक्षी दलों ने अपनी पहचान इंडिया के रूप में कर रखी है।

 तो कहा जा सकता है कि “इंडिया” ने 14 लोगों को देश की आजादी के बाद पत्रकारिता का नकाब पहनकर देश के ताना-बाना को खत्म करने का प्रयास कर रहे थे। ऐसा नहीं है कि यह पत्रकार नुमा एंकर अब सुधर जाएंगे जो दासता स्वीकार कर लेते हैं उनमें संभावना खत्म हो जाती है। बल्कि यह और विस्फोटक तरीके से अपना परिचय क्षेत्र बढ़ाने का काम करेंगे इसका असर आदिवासी क्षेत्रों में दूर अंचल के पत्रकारों में इसी प्रकार का है जैसे दिल्ली में इन दासों का है। किंतु कांग्रेस पार्टी ही ऐसे दास प्रथा की परिस्थितियों लाने के लिए जिम्मेदार है क्योंकि उसने पत्रकारिता जो लोकतंत्र का अनिवार्य अघोषित स्तंभ है उसका बुनियादी ढांचा खड़ा करने में कोई भूमिका अदा नहीं की है…  यह संयोग है की नई तथाकथित आजादी के लोग पारदर्शी गुलाम को पत्रकारिता का ड्रेस पहन कर उन्हें स्थापित करने का काम कर रहे थे ।अच्छा है “इंडिया” के लोगों को समझ में आ गया है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए सबसे पहले पत्रकारिता को बचाना पड़ेगा…. क्योंकि पत्रकारिता ही देश की आजादी को लाने में अहम भूमिका अदा की थी… अब तो पत्रकारिता के नाम पर गणिकाओं  की श्रृंखला खड़ी हो रही है क्योंकि यह न तो किसी बछावत वेतन आयोग से ताल्लुक रखती हैं ना इनका पत्रकारिता के मूल धर्म से बहुत नाता है। और चाह कर भी जो पत्रकारिता के पेसे को स्वीकार करके आए थे वह भी बनारस की गणिका का सम्मान पाने में स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। क्योंकि नई अर्थव्यवस्था में जहां धन है वही भविष्य है… ऐसा स्थापित कर दिया गया है। और पत्रकारिता में घोषित पारदर्शी धन ना के बराबर है सिर्फ पेट पाल वही संभावना है या फिर कालाबाजारी या फिर पूंजीपतियों के दलाल या गुलाम बन जाएं। इसलिए यह भारतीय पत्रकारिता के लिए बहुत संघर्ष पूर्ण कार्यकाल है इसमें जो बच गया सो बच गया अन्यथा गणिकाओं का बाजार सजा हुआ है जहां सत्ता का सम्मान जमीर बेचने की कीमत पर मिलता ही मिलता है। अर्थप्रधान व्यवस्था में कौन सत्ता के करीब अपनी पहचान नहीं बनना चाहता। अब सत्ता जन सेवा का मंच कम स्वयं सेवा का मंच ज्यादा हो गया है। इसलिए पत्रकारिता भी बदल रही है आने वाले समय में यह संघर्ष और कड़ा होता चला जाएगा जब तक पत्रकारिता का बुनियादी ढांचा न्यायपालिका की तरह अथवा कार्यपालिका की तरह या फिर विधायिका की तरह घोषित लोकतांत्रिक स्तंभ का स्वरूप नहीं ले लेता।


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