महिला आरक्षण, एक रुका हुआ अधूरा फैसला – (त्रिलोकी नाथ)

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Women Reservation Bill: दशकों से लंबित महिला आरक्षण विधेयक का जानें कौन है  विरोधी और क्यों,  women-reservation-bill-in-new-parliament-political-parties-against-bill-pending-for-decades-in-loksabha

 पुराने संसद भवन को हम अलविदा कर चुके हैं और उनके इंडिया से भारत में भी आ गए, सत्ता की नजर में जब नए संसद भवन “सेंट्रल विस्टा”  में जल्दबाजी करके आए तो उसकी तैयारी भी अधूरी थी… पहले बिल “महिला आरक्षण विधेयक” महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले नारी-शक्ति वंदन अधिनियम धड़ाम से गिर पड़ा फिर”एक रुका हुआ फैसला” की तरह पास हुआ ।  लोकसभा में 454 -2 मत विभाजन में। 

  पहली नजर में अंग्रेजों ने जब नई संसद भवन को विरासत में उपहार में भारतीय राजनीति को दिया था संसद भवन ने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए, सबका साथ- सबका विकास के तर्ज पर… लेकिन सबका साथ सबका विकास का नारा लेकर भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “तोता रटंत” की तरह सबका साथ-सबका विकास, सबका साथ-सबका विकास, बोलते बोलते जब नई संसद भवन में अपना पहला विधेयक लाये तो वह भी कांग्रेस सरकार से उधार लेकर आए। क्योंकि उनकी अपनी कोई तैयारी नहीं थी और पहले संकल्प ही सिर्फ देश की आधी आबादी के साथ जुमलेबाजी जैसा  साबित हुआ

__________________.(त्रिलोकी नाथ)._______________________

क्योंकि बहुमत की सरकार अगर चाहती तो सर्वसम्मत वाले इस विधेयक को आराम से पूरे उत्साह के साथ नई संसद भवन को उपहार में देते हुए पारित करवा देती किंतु उसे विधायक से ज्यादा चुनावी प्रोपेगेंडा बनाए रखने पर ज्यादा विश्वास है। जो 56 इंच की दावा करने वाली सरकार है जिसने कोविड महामारी के आपात हालात में लोगों से कभी ताली बजाया तो कभी घंटी बजवाया ताकि कोरोना बीमारी को भगाया जा सके और पूरा भारत आंख मूंद कर इनके पीछे-पीछे चल पड़ा। अब जब वास्तव में आधी आबादी महिलाओं को ऐसे ही तालिया की आवश्यकता थी तो उन्हें सपने का विधेयक का झुनझुना पकड़ा दिया….।

महिला आरक्षण विधेयक:27 साल पहले देवगौड़ा ने पहल की, अटल-मनमोहन ने भी किए  प्रयास, अब तक क्यों नहीं हो सका पास? - Women Reservation Bill: Its History  And Complete Timeline ...जिसे कांग्रेस पार्टी ने 2010 में तैयार किया और राज्यसभा में कब पारित भी कर दिया गया था किंतु लोकसभा में पिछड़े वर्ग को आरक्षण को लेकर यह पारित नहीं हो पाया।और जिस कारण महिला आरक्षण विधेयक एक रुका हुआ फैसला बनकर ठहर गया था।

उसे चाहते तो स-सम्मान पारित करवा लेते किंतु जिस तरह से आरक्षण की दुकानदारी भारतीय लोकतंत्र में धर्म की दुकानदारी की तरह बड़ा वोट-बैंक का मॉडल बन गई है इससे देश की गति जैसे ठहर गई है और पूरा तंत्र का ध्रुवीकरण इसी के इर्द-गिर्द इस जहरीले सड़ांध में पनप रहा है। जो एक रुका हुआ फैसला बन गया है। और विकास की रफ्तार सिर्फ एक नकाबपोश षड्यंत्र का हिस्सा बनकर रह गई है।

ऐसा हम यह संविधान की पांचवी अनुसूची में आरक्षित क्षेत्र आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल के अनुभव से प्रमाणित कर सकते हैं । जहां आरक्षण के कारण संपूर्ण विकास भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर बलिदान हो रहा है। वास्तविक विकास जो प्रकृति के साथ तालमेल करता है वह धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है। मध्य प्रदेश के शहडोल नगर के तालाब शहडोल क्षेत्र से निकलने वाली देश और दुनिया को प्रभावित करने वाली हमारी नदी प्रणाली यहां का पर्यावरण और पारिस्थितिकी का पूरा ताना-बाना भ्रष्टाचारियों, नेताओं और अफसर की भेंट चढ़ रहा है। किंतु इसका सांख्यिकीय विवरण स्टैटिकल डाटा तैयार करने में कोई रुचि नहीं दिखाई देती, जो पारदर्शी हो। कम से कम शहडोल के लोगों को इस बारे  में पता है कि विधायिका और कार्यपालिका बुरी तरह से असफल है । न्यायपालिका और पत्रकारिता तो सिर्फ दर्शक दीर्घा के पात्र बनकर रह गए हैं।

 यह भी कहना सही नहीं है की महिला आरक्षण विधेयक से कोई क्रांतिकारी परिवर्तन होने वाला है । नए तरीके के अपवित्र मंशा से  आये इस विधेयक में सिर्फ षड्यंत्रकारी को लाभ मिलता दिखता है ।क्योंकि आरक्षण जिस पवित्रता के साथ लागू होने की सोच हमारे संविधान निर्माता ने बना रखी थी उसका इन आरक्षण व्यवस्था से कोई विषेश फायदा नहीं हुआ। पर्यावरण और परिस्थिति की संरक्षण के साथ सर्वांगीण विकास जिसमें सभी जनजातियों को एक साथ उत्थान होना था उसकी जगह कुछ नए सामंतवादी अपने संपूर्ण शोषण के साथ राजनीति के शिकार हो गए हैं।

 सांसद रहे दलपत सिंह परस्ते हों या दलबीर सिंह और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती राजेश नंदिनी सिंह, ज्ञान सिंह हो या फिर धनसाह प्रधान अब तो यह देखा गया है की इतनी बड़ी विरासत लेकर सांसद श्रीमती हिमाद्री सिंह पूरे 5 साल में एक तथा-कथित सुविधा जो सिर्फ स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं के लिए विशेष रूप से होनी चाहिए थी,”शहडोल से नागपुर रेल” को चला पाने में भी असफल रही हैं। जबकि यह मात्र तात्कालिक सुविधा है ।

यह कहना भी गलत है कि वह आदिवासी महिला हैं इसलिए उनका शोषण हुआ, शहडोल के जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती प्रभा मिश्रा आदिवासी नहीं है इसके बावजूद उनका अस्तित्व राजनीतिक फैसले के दृष्टिकोण में आदिवासियों की तरह ही बुरी तरह से असफल रहा है। एक तरह से देखा जाए तो शहडोल में दो संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व है श्रीमती प्रभा मिश्रा संपन्न घराने की सीधी संसदीय क्षेत्र के व्योहारी विधानसभा क्षेत्र की निवासी हैं। यह भी रोचक है की सीधी की सांसद श्रीमती रीति पाठक भी महिला हैं और शहडोल के सांसद श्रीमतीहिमाद्री सिंह सिंह भी महिला है बावजूद इसके विंध्याचल का यह बड़ा भाग बुनियादी सुविधाओं के लिए इस प्रकार से तरसता रहा अथवा विकास का मॉडल ऐसा खड़ा किया गया की आधुनिक तकरीर की तकनीकी से निर्मित बी ओ टी रीवा-अमरकंटक मार्ग में 56 लोग सिर्फ घटिया सड़क के कारण पानी में डूब कर मर गए। यह दुर्घटना नहीं हत्या थी और एक व्यक्ति भी इस हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है। यह समाज और आदिवासी संपन्न विरासत की महिला प्रतिनिधियों कीअसफल होने का प्रमाण पत्र है। तो विशेष कर महिला आरक्षण हो जाने से कुछ बड़ा होने वाला है इसकी जगह षडयंत्रों को सिर्फ सफलता मिलता दिखता, शहडोल एक प्रमाण पत्र है।

 भारतीय संसद में महिलाओं के आरक्षण की पतन की कहानी शहडोल से ही या विंध्य अंचल के इस क्षेत्र से ही शुरू होनी चाहिए थी लेकिन वास्तविक विकास की बजाय वोट बैंक आरक्षण का बड़ा मुद्दा बन गया है। इसलिए महिलाओं को जो भारत की आधी आबादी है । कौन राजनीति पार्टी कितना मूर्ख बना सकती है इस “रुके हुए फैसले” से बार-बार प्रमाणित होता दिखता है… इसलिए यह “रुका हुआ फैसला” अगर पारित भी गया है तो उसका भविष्य आरक्षण के जरिए वोट बैंक लूटने के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। हाथ दुर्घटना बस कुछ दिख जाए वह एक अलग बात है अब तक अनुभव में यही आया है।कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है इस दृष्टिकोण से महिला आरक्षण विधेयक नई संसद भवन के लिए सिर्फ एक राजनीतिक मनोरंजन हो सकता था क्योंकि इसमें एक व्यवसाय की तरह कई शर्तें लगा दी गई है जिससे इसका प्रभाव लगभग मर गया है  किंतु वह सिर्फ “एक रुका हुआ फैसला” बनकर रह गया है यह हमारी सड़ी हुई राजनीति और उससे पैदा विधायिका की सबसे बड़ी असफलता का प्रमाण है जो नए संसद भवन में एक उपहार के रूप में प्रस्तुत है और कुछ नहीं…


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