क्या सब कुछ सही है उमरिया जिले में…? ( त्रिलोकीनाथ)

Share

शहडोल| संभागके उमरिया जिले  की फिजा खराब कर देने वाले घटनाक्रम में दो घटनाएं हाल में घटी हैं। एक पुलिस के साथ झड़प में क़ई पुलिस व नागरिक हिंसकघटना क्रम में प्रभावित हुए हैं, बताया जाता है उनमें से 40लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। पुलिस-प्रशासन पर हमला अति निंदनीय कृत्य है।गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जो की मुख्य रूप से आदिवासी जनजाति का संगठन है एक प्रदर्शन के दौरान हिंसा के रूप में परिवर्तित हो गया और उसमें कई पुलिसकर्मी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के कार्यकर्ता प्रभावित हो गए ।दूसरे, घटनाक्रम में उमरिया जिले के उमरिया और शहडोल जिले की सीमा में एक वाहन के टक्कर में पांच युवाओं के मौत हो गई जिसमें तीन शासकीय कर्मचारी रहे। दोनों ही घटनाक्रम विचारणीय है…और इस पर फोकस स्थानीय पत्रकारिता ज्यादा अच्छे तरीके से प्रकाशित कर सकती है अगर वह साहसी और ईमानदार है तो…?

————–( त्रिलोकी नाथ)—————-

 पुलिस ने कार्यवाही कर दिया हैं और कुछ लोग गिरफ्तार हो गए तो विषय खत्म नहीं हो गया बल्कि उसे दबाने का काम हुआ है । और इस दमन पर यह सोचना जरूरी है की पुलिस-नागरिक का व्यवहार  हिंसक  क्यों हो गया। ऐसा कौन सा गुस्सा था जो प्रदर्शन के बाद हिंसा में बदल गया…? समान रूप से आदिवासी जनजाति हिंसक प्रवृत्ति की नहीं है उसे हिंसक बनाने में शोषण का और दमन का कुछ चक्र काम करता है वह चाहे राजनीतिक हो प्रशासनिक हो अथवा सामाजिक को यह शोध का विषय है किंतु इतना तय है कि प्रशासन की शोषणकारी नीतियों का दमन चक्र हिंसा का ही परिणाम देता है। सिर्फ गोंडवाना गणतंत्र पार्टी पर हिंसा के लिए दोष का आरोप लगा देना किसी भी हालत में उचित नहीं है। अगर प्रदर्शनकारी इतने सहज रूप में भारी संख्या में इकट्ठा होकर पुलिस पर हमला करने की साहस जुटा लेते हैं तो उमरिया पुलिस और कुत्ते चल विभाग क्या लगभग खत्म हो गया था या फिर वह प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जी की सेवा में भोपाल चला गया था…? उसके कारण खोजने के लिए बकायदे “मजिस्ट्रियल इंक्वारी” होनी चाहिए ताकि इस तीन ब्लाक के छोटे जिले में यह पता चल सके की कौन से शोषणकारी दमनकारी कारण प्रयास शांतिप्रिय आदिवासी जनजाति में हिंसा के बीच बोये हैं…?

 एक कारण तो मैं भी जानता हूं नौरोजाबाद थाना में मंत्री और विधायक के रिश्तेदार कॉलरी का सेवानिवृत्ति केवल सिंह आदिवासी को सूदखोर ने पूरे जीवन की तनख्वाह लूट ली। पहले तो वह समझ नहीं पाया कि इसे कैसे वापस लिया जाए… जब रास्ते बनाए गए तब पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों ने अनुसूचित जनजाति आयोग तक को भ्रमित करने का काम किया की असल में सूदखोर वही केवल सिंह है जो की सूदखोरी का शिकार हुआ है। सेवानिवृत्ति वृद्ध आदिवासी केवल सिंह अंततः राजनीतिक पुलिस और प्रशासन की व्यवस्था से थक कर हारकर अपनी जीवन भर की कमाई से किनारा काट लेने में ही अपनी भलाई समझता है। यह दूरंतकारी शोषण और दमनकारी पुलिस और प्रशासन की व्यवस्था का उदाहरण है‌ अगर केवल सिंह, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के प्रदर्शन में शामिल होकर पुलिस पर हमला नहीं करता है अपने गुस्से का इजहार नहीं करता है तो उसके लिए दूसरा रास्ता नहीं है क्योंकि न्यायालय का रास्ता महंगा और बहुत लंबा है आदिवासी समाज इतनी धैर्यता नहीं होती। क्योंकि केवल सिंह के पास सेवानिवृत्ति की बात इतनी उम्र भी शायद नहीं बची। क्या इसी प्रकार के कई कारण हिंसा के लिए जिम्मेदार थे….? यह देखा जाना चाहिए। केवल सिंह एक बड़ा और प्रमाणित उदाहरण है, कि मंत्री से लेकर सांसद विधायक तक उसके रिश्तेदार हैं.. और वह कालरी में जीवन भर सेवा करने के बाद अपनी पूरी कमाई सिस्टम के कारण गंवा बैठा। इसे चिन्हित करने का काम उमरिया की पुलिस प्रशासन का ही है कि कितने केवल सिंह कहां-कहां पर किस-किस प्रकार से शोषण और दमन के पारदर्शी सिस्टम के शिकार हुए

 चलिए दूसरे सिस्टमैटिक कमजोरी को समझने का काम करें,शहडोल जिले के कुछ युवा अधिकारी अन्य युवाओं के साथ कथित रूप से पार्टी करने बहुचर्चित एक होटल ढाबा में गए थे। वैसे तो पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के राजनीतिक पाखंड के कारण मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अंततः शराब की दुकान तो बंद नहीं किया लेकिन पीने के अड्डे बंद कर दिये। ऐसे में जहां शराब बिकती थी वहीं पर लोग बैठकर पी लेते थे और घर पहुंच जाते थे पीने वाले।

 लेकिन अब ऐसा नहीं है यह बात दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी में पांच युवकों की मौत जांच का विषय है की अमिलिया के पास जो दुर्घटना हुई उसके मूल कारण में गाड़ी की कथित तौर पर 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार क्यों थी…? क्या ढाबा में बिकने और अवैध रूप से बैठकर वहां पर पिलाई जाने वाली शराब थी..? और अगर यह शराब पीने की व्यवस्था राष्ट्रीय राजमार्ग में खुलेआम चल रही है तो पुलिस और आबकारी प्रशासन क्या कर रहा है क्या वह अपना हिस्सा ऐसे जितने भी ढाबे हैं उनसे लेने जाता है..? और अगर कोई जिला आबकारी अधिकारी उमरिया महिला ज्यादा हिस्सा मांगती है तो उसे  माफिया लोकायुक्त के जरिए पकड़ा देता है क्या यह एक सिस्टम है…?  इस बात पर भी एक मजिस्ट्रेट इंक्वारी होनी चाहिए की राष्ट्रीय राजमार्ग में शराब कहां से परोसी जाती है की गाड़ी की रफ्तार 140 किलोमीटर प्रति घंटा तक बढ़ा दी गई और दुर्घटना में कोई नहीं बचा। अन्यथा उमा भारती के साथ भारतीय जनता पार्टी ने झूठा पाखंड क्यों किया और शराब पीने वालों को शराब बिकने वाले स्थान पर शराब पीने से मना क्यों किया..? अगर राष्ट्रीय राजमार्ग में अवैध शराब पारदर्शी तरीके से  मिलती तो क्या वहां में शराब पीकर दुर्घटना करने वालों पर रोक नहीं लगाई जा सकती थी…?

 यह कहना भी गलत है कि इन सब के लिए सिर्फ प्रशासन दोषी है, जिन्हें चिन्हित किया जाना चाहिए..? यह सिस्टम ही दोषपूर्ण तौर-तरीके से काम कर रहा है कानून का नकाब पहनकर ऐसा सामंतवादी शोषणकारी व्यवस्था के रूप में सिस्टम परिवर्तित हो गया है जिसमें सिस्टमैटिक तरीके से कानून का नकाब पहनकर आदिवासी जनजाति विशेष क्षेत्र शहडोल संभाग में हिंसा के बीच चाहे दुर्घटना के कारण हो अथवा प्रदर्शन के रूप में हो आवेशित होकर प्रकट हो जाते हैं इन्हें समझने की जरूरत है.. ? अन्यथा प्रधानमंत्री की डिक्शनरी में एक और शब्द “ग्रामीण नक्सली” के रूप में शहडोल को परोस दिया जा सकता है….


Share

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

राशिफल

- Advertisement -spot_img

Latest Articles