आखिर आदिवासी विशेष क्षेत्र की आध्यात्मिक शक्ति केन्द्र प्रकाशित क्यों नहीं..?( त्रिलोकीनाथ गर्ग )

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शक्ति साधना का केंद्र आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल आखिर क्यों आध्यात्मिक दुनिया में कभी शिखर पर रहा होगा यह बात पारदर्शी तरीके से उजागर करने में हमारा लोकतंत्र अब तक तो कामयाब नहीं हुआ है इसमें कोई शक नहीं है बल्कि पुरातत्व में आध्यात्मिक वैभवशाली विरासत, प्राकृतिक संसाधन कोयला, पत्थर, गैस, रेत और जंगल  आदि संसाधन आदि के कारण सिर्फ एक शोषणकारी केंद्र बनकर रह गया है ।इसकी विरासत की शक्ति साधना को बता पाने में इसलिए भी  क्षेत्र का प्रशासन लगभग फैल रहा है क्योंकि एकमात्र पुरातत्व संग्रहालय शहडोल मुख्यालय में महात्मा गांधी स्टेडियम के बगल में स्थित तो जरूर है किंतु वहां का रखरखाव एक चपरासी नुमा आदमी के भरोसे छोड़ रखा गया है जिससे सार्थक जानकारी मिलना लगभग असंभव है फिर भी शहडोल जैसे क्षेत्र जहां की कभी हिमालय से ही बड़ा  र्विध्य का पर्वत रहा ऐसा कथानको में है।और महान पवित्र नद और नदी सोन और नर्मदा जैसी विपरीत दिशाओं में बहकर दो समुद्री बंगाल की खाड़ी और अरब सागर सेतु बांध तैयार करती हैं इन नदियों की विरासत भी शहडोल के संदर्भ में कभी प्रकाशित नहीं किया गया ।क्योंकि इन्हीं नदियों के इर्द-गिर्द शक्ति साधना के बड़े केंद्र बने हुए हैं ।जो ज्यादातरग्रामीण क्षेत्रों में है और कई जंगलों में भी हैं।जो स्तरीय रूप से प्रकाशित नहीं है। जिन्हें प्रकाशित किया जाना लोकतंत्र के हित में है । क्योंकि बदहवास और नफरत पूर्ण होती जा रही आसान आम जीवन शैली में आम आदमी को यह मालूम होना चाहिए कि जो आज आदिवासी विशेष क्षेत्र के नाम से चिन्हित है इस लोकतंत्र में वह शहडोल क्षेत्र कभी अध्यात्म और शक्ति साधना की बड़ा केंद्र हुआ करता था।

———–_( त्रिलोकीनाथ गर्ग )——————

यही कारण है की अमरकंटक जहां मां नर्मदा का जन्म हुआ है वहां कीमूर्तियां हो चाहे शहडोल क्षेत्र में अलग-अलग जगह फैली तमाम हजारों साल पुरानी मूर्तियां जिसमें शहडोल के कंकाली मंदिर,अंतरा विचारपुर की नागों की अधिष्ठात्री देवी का भुवनेश्वरी माता मंदिर बूढ़ी माता मंदिर,पाली की बिरासनी माता मंदिर सिंहपुर की काली माता मंदिर, गणेश मंदिर ,   स्वाभाविक प्रकाशित सत्य साधना के बड़े केंद्र रहे हैं। क्योंकि इन विरासत में प्राप्त पुरातात्विक मूर्तियों को स्मगलर या चोर यहां से हटा नहीं पाए।

इसके बावजूद भी हम प्राथमिक मुझसे इन्हीं मंदिरों पर चर्चा करेंगे और जैसे हमें स्थानीय नागरिक अपने महत्व की क्षेत्र की महत्वपूर्ण अध्यात्मिक साधना को केंद्रों को हमसे शेयर करेंगे हम प्रकाशित करते रहेंगे। यह बताने के लिए कि आखिर इन पुरातात्विक वैभवशाली शक्ति साधना केंद्र की आध्यात्मिक शक्ति को और बढ़ाने की वजाय शहडोल क्षेत्र की खनिज संपदा मात्र को ज्यादा से ज्यादा लूटने के संसाधन आखिर लोकतंत्र में क्यों विकसित किए जा रहे हैं …? और अगर खनिज संपदा निकालने की स्वस्थ परंपरा विकसित है तो क्या कारण है कि इसके प्राकृतिक संसाधन के अनुपात में स्थानीय नागरिकों को चाहे वह आदिवासी विशिष्ट जनजाति के हों अथवा जाति समूह के पिछड़ा वर्ग सामान्य जाति को रोजगार का लाभ क्यों नहीं मिल पाया है अब तो ऐसी टेक्नोलॉजी धीरे-धीरे आ रही है कि मसीने ही काम करेंगे तो क्या शक्ति साधना केंद्र की शक्ति को नष्ट करके तथाकथित राष्ट्रहित के नाम पर आदिवासी विशेष क्षेत्रों को प्राकृतिक संसाधन की लूट की प्रतियोगिता नहीं चल रही है….? यह भी हम देखने का प्रयास करेंगे.. ताकि आम जनमानस समझ सके यह लोकतंत्र आखिर हमारे लिए किस प्रकार से लाभदायक रहा है…

 

हम शुरुआत करते हैं लगभग आदम-कद वैभवशाली विचारपुर चुनिया के बीच में स्थित शहडोल के बगल में माता भुवनेश्वरीकीशक्ति साधना केंद्र की स्थल की।जो एक टीले पर स्थित हैऔर इसके सामने ही अबअल्ट्राटेककाविचारपुर कोल माइंस अंडरग्राउंड खुल गया है। इस मंदिर के सामने तरफ एक बांध का भी निर्माण किया गयाजो पानी रोक कर इसे वैभवशाली बना देता है। किंतु पुरातात्विक  परंपरा में यहां बहुत कुछ लुट गया । इस वैभवशाली मूर्ति को ले जाने पर स्मगलर लगभग फेल रहे ।कहा जाता है की ले जाने का प्रयासऔर काला बाजार में बेचने का भी प्रयास काफी हुआ जिस कारण मूर्तियां क्षतिग्रस्त हो गई .. और दूसरी पक्ष का परिवार लगभग नष्ट भ्रष्ट हो गया। किंतु माता भुवनेश्वरी जो की हजारों साल से यहां पर स्थित हैंऔर सांपों की देवी हैं।यह कुछ दशक में अनुभव की बात है,  कि जब यह बांध बन रहा था तब यहां इतनी ज्यादा सर्प थे निकले थे कि उन्हें देखकर मजदूर काम करने में दहशत करते थे।

 

वर्तमान में एक दौर तो ऐसा भी था कि जब पुजारी बताते हैं कि अक्सर देवी के इर्द-गिर्द  सांप देखे जाते थे। उनसे कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचा है।अभी भी यदा-कदा अपवाद के रूप में देखे जा रहे हैं। इस क्षेत्र के तथाकथित अंधाधुंध विकास से यहां की आध्यात्मिक विरासत क्षतिग्रस्त हुई है।

तो आखिर कौन सी ऐसी शक्ति साधना यहां होती थी इसे प्रकाशित करने का काम प्रमाणिक तौर पर बता पानी में जिले का पुरातत्व संग्रहालय लगभग नकारा रहा है।ऐसी महान विरासत को आखिर सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करने और इसे लोकहित में कैसे आकर्षण का केंद्र बनाया जाए इस पर प्रशासन या पुरातत्व विभाग कभी भी गंभीर नहीं दिखा…? हां इतना जरूर हुआ कि वृक्षारोपण की योजना में इस टीले को सौंदर्य साली बना दिया और इसकी देखरेख करने वाले पुजारी परिवार ने इसे आज एक वैभवशाली विरासत के रूप में अपनी शक्ति सामर्थ्य के हिसाब से संजो कर रखा है।

सामान्य तौर पर विकिपीडिया ने सांपों की अधिष्ठात्री देवी को इस प्रकार से प्रदर्शित किया है। लेकिन जिस प्रकार से अपने मुकुट पर नाग को विचारपुर स्थित यह देवीधारण करती हैं उसे यह बात स्पष्ट होती है कि वे सांपों की अधिष्ठात्री देवी ही हैं। तो क्या यह विकिपीडिया में प्रदर्शित मनसा देवी का शक्ति केंद्र हजारों साल पहले रहा ।यह भी एक विचारणीय तथ्य है। जिसेपुरातत्व विभाग को या शहडोल क्षेत्र में काम कर रहे अमरकंटक विश्वविद्यालय शंभू नाथ विश्वविद्यालय और अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय के विद्वान इस पर काम करने वाले विद्वानों को प्रदर्शित करना चाहिए।

फिलहाल जान ले की विकिपीडियासांपों की देवी के बारे में क्या लिखता हैऔर  तुलनात्मक तौर पर विचारपुर चुनिया मार्ग में स्थित इस वैभवशाली पुरातात्विक मूर्ति से कितना मेल खाता है यह समझने का विषय है।

विकिपीडिया में प्रदर्शित आशिक विवेचना कुछ इस प्रकार से है भट्टाचार्य और सेन का सुझाव है कि मनसा की उत्पत्ति दक्षिण भारत में एक गैर-वैदिक और गैर-आर्यन देवी के रूप में हुई और यह कन्नड़ लोक नाग-देवी मंचम्मा से संबंधित है।  मनसा मूलतः एक आदिवासी देवी थी। उन्हें हिंदू पिछड़ी जाति समूहों द्वारा पूजे जाने वाले पंथ में स्वीकार किया गया । बाद में, डिमॉक ने सुझाव दिया कि यद्यपि साँप की पूजा वेदों (प्रारंभिक हिंदू ग्रंथों) में पाई जाती है, मनसा – साँपों की एक मानव देवी – का प्रारंभिक हिंदू धर्म में “थोड़ा आधार” है भट्टाचार्य मनसा पर एक और प्रभाव का सुझाव देते हैं जो ज़हर-उपचार की महायान बौद्ध देवी जांगुली है। जांगुली अपने हंस वाहन और विष-विनाशक विशेषण को मनसा के साथ साझा करती है। मनासा को जांगुली के नाम से भी जाना जाता है। एक सिद्धांत से पता चलता है कि जांगुली अथर्ववेद के किरात-गिरी (“सभी जहरों का विजेता”) से प्रभावित हो सकता है । मैकडैनियल के अनुसार, उन्हें उच्च जाति के हिंदू देवताओं में शामिल किया गया था, जहां अब उन्हें एक आदिवासी के बजाय एक हिंदू देवी के रूप में माना जाता है।

टेट के अनुसार, जरत्कारु के रूप में मनसा को शुरू में ऋषि कश्यप और कद्रू की बेटी के रूप में मान्यता दी गई थी , जो हिंदू महाकाव्य महाभारत में सभी नागों की मां थीं ।  भट्टाचार्य के अनुसार, महाभारत का जरत्कारु बंगाल में प्रचलित मनसा नहीं है।

14वीं शताब्दी तक, मनसा की पहचान प्रजनन और विवाह संस्कार की देवी के रूप में की गई और उसे भगवान शिव से संबंधित शैव पंथ में शामिल कर लिया गया। मिथकों में यह वर्णन करके उनका महिमामंडन किया गया कि उन्होंने जहर पीने के बाद शिव को बचाया, और उन्हें “जहर हटाने वाली” के रूप में सम्मानित किया। उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और दक्षिणी भारत में फैल गई, और उनके अनुयायियों ने प्रारंभिक शैववाद (शिव का पंथ) के प्रतिद्वंद्वी बनना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप, मनसा के जन्म का श्रेय शिव को देने वाली कहानियाँ सामने आईं और अंततः शैव धर्म ने इस स्वदेशी देवी को मुख्यधारा हिंदू धर्म की ब्राह्मणवादी परंपरा में अपना लिया।  वैकल्पिक रूप से, वासुदेव का सुझाव है कि मनसा की बंगाली कहानी शैववाद और देवी-केंद्रित शक्तिवाद के बीच प्रतिद्वंद्विता को दर्शाती है । 

प्रतिमा विज्ञान 

मनसा अपने पति जरत्कारु और पुत्र आस्तिक के साथ नागाओं से घिरी हुई , बंगाल से प्राप्त 11वीं सदी की पाल काल की मूर्ति

मनसा को सुनहरे रंग (इसीलिए जगत गौरी कहा जाता है) और मुस्कुराते चेहरे वाली एक खूबसूरत महिला के रूप में चित्रित किया गया है। वह लाल वस्त्र और सुनहरे आभूषण पहनती हैं। वह चार हाथों वाली हैं, उनके ऊपरी दाएं हाथ में शंख है और बाएं हाथ में उनका पसंदीदा फूल कमल है। उनके निचले बाएं हाथ में सांप है और दाहिने हाथ में वरद मुद्रा है। वह सांपों से ढकी हुई है, कमल के मंच पर बैठी है या सांप पर खड़ी है। वह सात नागों के फनों की छत्रछाया में सुरक्षित है । कभी-कभी उन्हें गोद में एक बच्चे के साथ चित्रित किया जाता है। माना जाता है कि यह बच्चा उनका बेटा आस्तिक है । [2] [14] बंगाल में वह अपने पति ऋषि जरत कारू के साथ कम ही देखी जाती हैं। उनकी कुछ मूर्तियों में उन्हें बेहुला और लक्ष्मींदर के साथ दिखाया गया है ।

महाभारत 

महाभारत में मनसा के विवाह की कहानी बताई गई है। ऋषि जरत्कारु ने कठोर तपस्या की और विवाह से दूर रहने का निर्णय लिया। एक बार, उसकी नज़र एक पेड़ पर उलटे लटके हुए लोगों के एक समूह पर पड़ी। ये लोग उनके पूर्वज थे , जो दुख के लिए अभिशप्त थे क्योंकि उनके बच्चों ने उनका अंतिम संस्कार नहीं किया था। इसलिए, उन्होंने जरत्कारु को शादी करने और एक बेटा पैदा करने की सलाह दी जो अनुष्ठान करके उन्हें उन दुखों से मुक्त कर सके। वासुकि ने अपनी बहन मनसा का हाथ जरत्कारु को दे दिया । मनसा ने एक पुत्र अस्तिका को जन्म दिया , जिसने अपने पूर्वजों को मुक्त कर दिया। अस्तिका ने नागा जाति को विनाश से बचाने में भी मदद की जब राजा जनमेजय ने उन्हें अपने यज्ञ , जिसे सर्प सत्र कहा जाता है, में बलि देकर नष्ट करने का फैसला किया । 

2023 में नवरात्रि के प्रथम दिवस पर मां भुनेश्वरी को बारंबार चरण वंदन करतें हैं  वह शहडोल का उद्धार करें और कल्याण करें। उनकी शक्ति साधना शहडोल के हित में समर्पित हो, प्रदर्शित हो इसी प्रार्थना के साथ प्रथम सोपान समर्पित है

 और अगर यह मनसा देवी  प्राचीन देवी यहां स्थापित हैं तो निश्चित तौर पर विभिन्न प्रकार के अलग-अलग सांपों की प्रजाति का भी यह केंद्र रहा होगा। जिसे संरक्षित करने की बजाय यहां के प्राकृतिक संसाधनों लूटने और निकालने की चकल्लस में इस वैभवशाली विरासत को भारतीय लोकतंत्र ने क्या खो दिया है… यह एक बड़ा  प्रश्न चिन्ह है.. ?लेकिन इसका उत्तर लोकतंत्र के जिम्मेदार विद्वान व्यक्ति ही दे सकते हैं, वह चाहे प्रशासनिक स्तर पर हो अथवा राजनैतिक स्तर पर होता है अगर उनमें कोई क्षमता है तो….? अन्यथा लूट सके तो लूट की दिशा में लोकतंत्र अपने स्तर पर  सारी विरासत को लगभग हत्या कर ही दिया है…? ऐसा भी क्यों नहीं समझना चाहिए।

 
 
 
 
 
 

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