
शहडोल।
वोट-लूट के धंधे के लिए पतित हो चुका लोकतंत्र अब भारतीय सेवा के जवानों की कमाई हुई इज्जत और उसकी साख के जरिए सेना के सिपाहियों को छुट्टी के वक्त तथा कथित सरकारी योजनाओं के प्रचार के धंधे में लगाने का लगभग निर्णय ले चुका है कि वह कुछ सेल्फी प्वाइंट बनाकर वहां सरकारी योजनाओं का प्रचार करें। यानी आध्यात्मिक के भगवान राम से लेकर लोकतंत्र के भगवान बिरसा मुंडा तक चुनाव के वोट के धंधे में लगभग बेकार साबित होने जा रहे हैं ऐसा उन्हें लगता है ऐसे में अपमान तो होना ही था।
और शहडोल में यह देखा भी गया।चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद भलाई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह या प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति की फोटो सरकारी कार्यालय अथवा सरकारी रिकॉर्ड से ना हटाई गई हो क्योंकि भारत का संविधान फोटो ना हटाने की शायद उन्हें संरक्षण देता हो, किंतु भारत के संविधान निर्माता में से एक बिंध्य प्रदेश के एकमात्र मुख्यमंत्री रहे पंडित शंभूनाथ शुक्ला की मूर्ति को कलेक्टर परिसर में छिपा दिया गया है। शम्भूनाथ शुक्ल , भारत के एक राजनेता, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे। कानूनी विद्वान होने के कारण उन्हें भारत की संविधान सभा के लिए मनोनीत किया गया। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने विंध्य प्रदेश के तीसरे मुख्यमन्त्री के रूप राज्य का नेतृत्व किया।। यह अलग बात है कि आगामी 21 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि होने के कारण उस पर प्रशासन क्या निर्णय लेता है..? उनकी पुण्यतिथि मनाने भी देता है या फिर उसे पर भी प्रतिबंध लगा देता है …? क्योंकि वे भी भारतीय लोकतंत्र में संविधान बनाते वक्त जातिगत आरक्षण को शायद आवश्यक मानते थे और स्वयं ब्राह्मण होने के कारण 21वीं सदी की प्रदूषित हो चुकी जातिगत जनगणना में सांख्यिकीय गणना में निम्न दर्जे के जाति के एक हिस्सा है।
——————————( त्रिलोकीनाथ )————————————
इसलिए उनका चुनाव आचार संहिता में अगर सामूहिक और सार्वजनिक अपमान किया जाता है उसे इस लोकतंत्र को फर्क नहीं पड़ने वाला है। शायद यही सोचकर लोकतंत्र के प्रशासन ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और भारत के संविधान के निर्माता पंडित शंभूनाथ शुक्ला को चुनाव आचार संहिता में किसी पार्टी विशेष के लिए वोट प्रभावित करने का दोषी अपने पाए जाने की शंका में कपड़े से ढक दिया है।
पंडित शंभू नाथ शुक्ला हालांकि 20वीं सदी में आजादी के 30 साल बाद ही इस दुनिया को अलविदा कह दिए थे और उनके साथ बिंध्य प्रदेश भी अलविदा हो गया था जिसके लौटने की आहट 21वीं सदी के तीसरे दशक में प्रारंभ जरूर हुई किंतु वह भी वोट की राजनीति का घटिया टुकड़ा बनकर रह गई।
पं. शंभूनाथ जी शुक्ल के नाम पर शहडोल और मध्य प्रदेश में कई जगह स्मारक बने हुए हैं पंडित शंभू नाथ शुक्ल विश्वविद्यालय उन्हें में से एक है।
तो क्या शंभू नाथ शुक्ल विश्वविद्यालय को भी कपड़े से ढक देना चाहिए या फिर चुनाव आचार संहिता लागू रहने तक उसे
बंद कर देना चाहिए..? यह एक बड़ा प्रश्न है अगर भारत के संविधान निर्माता में एक पंडित शंभूनाथ शुक्ला भारतीय चुनाव प्रणाली को प्रभावित करते हैं तो फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अथवा महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इस चुनाव को प्रभावित क्यों नहीं करते हैं..? यह बड़ा प्रश्न है। उनकी फोटो कार्यालय से तत्काल क्यों नहीं हटाई गई यह भी बड़ा प्रश्न है..
और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान जबकि वहां आचार संहिता लागू थी वहां के आदिवासियों के वोटो को प्रभावित करने के लिए आदिवासी विशेष क्षेत्र में लागू होने वाले संविधान की पांचवी अनुसूची के तहत पेसा एक्ट 1996 कानून लागू करने के नाम पर जो पाखंड शहडोल के लालपुर हवाई अड्डे में राष्ट्रपति जी को लाकर किया गया ताकि गुजरात के आदिवासी भारतीय जनता पार्टी को पेसा एक्ट लागू होने के लिए वोट कर सकें… क्या वह चुनाव आचार संहिता की उलंघन नहीं था…?
यह भी एक अलग बात है की इसी यह पेसा एक्ट को 1 साल पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने इंदौर में लागू कर दिया था बहुत बड़ी जनसभा में उसमें भी करोड़ों रुपए खर्च हुए रहे होंगे जैसे की शहडोल के लालपुर हवाई अड्डे में करोड़ों रुपए अपव्यय किए गए। और मुख्यमंत्री और महामहिम राष्ट्रपति के द्वारा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के उपस्थिति में पेसा एक्ट को दोबारा लागू करने की घोषणा कराई गई ।
और यह पूरी तरह से अलग बात है कि पेसा एक्ट लागू होने के बाद भी ना तो शहडोल के प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की कोई ताकत मिली और ना ही पेसा एक्ट में मिले प्रावधानों के तहत आदिवासियों की जल, जंगल,जमीन उन्हें वापस मिल पाई है। आज भी माफिया सत्ता के संरक्षण में खुलेआम उसमें काबिज है । तालाब नष्ट ही हो रहे हैं जंगल और खनिज खुली लूट का उदाहरण बनते जा रहे हैं ऐसे में सिर्फ चुनाव आचार संहिता में जबकि भारतीय लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ कार्यपालिका को यह पावर मिलता है कि वह निष्पक्ष निर्वाचन कर सके आखिर विंध्य प्रदेश की आस्था पर प्रतीक भारत के संविधान निर्माता में एक पंडित शंभूनाथ जी शुक्ल के मूर्ति को कलेक्टर परिसर में छुपा कर पारदर्शी अपमान कैसे कर सकता है…? तब जबकि एक हफ्ता के अंदर ही उनकी जयंती आने वाली है… शहडोल की राजनीति को देख कर तरस आता है जिन्होंने यह कहा था कि अगले वर्ष शंभू नाथ जी का और शानदार तरीके से जयंती मनाई जायेगी ।
तो क्या यही हमारे राजनीति की आदर्श आस्था के प्रतीक नायक संविधान निर्माता का सम्मान होना शेष रह गया था…? अथवा इस पर यह लोकतंत्र स्वयं को जीवित होने का प्रमाण पत्र देगा…? यह बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
देखना होगा की कार्यपालिका निर्वाचन के नाम पर आखिर इस महान संविधान निर्माता का कितना सम्मान बचा पाने में खुद को योग्य को साबित करती है…? या फिर वह भी लोकतंत्र की भीड़तंत्र का भेड़तंत्र बनकर रह जाती है…? फिलहाल तो इसी भेड़तंत्र में हम सांस लेते नजर आ रहे हैं.. क्योंकि भीड़तंत्र ने मूर्ति स्थापना के नाम पर वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और संविधान निर्माता के समक्ष अपनी मूर्तियां खड़ी कर दी हैं.. शायद यही भ्रम के कारण संविधान निर्माता का अपमान हो रहा है….
7-

