बिरसा मुंडा, राम और इजरायली कट्टरपंथ.. और लोकतंत्र ….(.त्रिलोकी नाथ)

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ऐसा नहीं है की प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी ऐसे धार्मिक प्रति का उपयोग करने से परहेज करती है किंतु वह मर्यादा में रहकर छिंदवाड़ा में हनुमान जी के जरिए अपना राजनीतिक संदेश देना नहीं भूलती ।भारतीय जनता पार्टी इस मर्यादा का पालन नहीं करती इसलिए वह पारदर्शी तरीके से वोट बैंक के लक्ष्य को रखकर ईमानदारी से अपना संदेश देती है। बावजूद इस धार्मिक दुरुपयोग के संदेश को देने की अगर वह जैसे कर्नाटक में चुनाव हार गई… ,इस बार भी सभी विधानसभा में चुनाव हारती है तो यह भगवान की हार नहीं होगी‌, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के स्थापित “चुनावी -भगवानों “की हार होगी।

धर्म का दुरुपयोग कितना खतरनाक होता है उन 24 लाख फिलिस्तीनियों पर गिर रहे खतरनाक रासायनिक  और हथियारोंके हमले इजरायल के कट्टरपंथी सोच से प्रदर्शित होता है जहां इजरायली प्रधानमंत्री अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए सत्ता में बने रहने के लिएअपनी धार्मिक कट्टरता का प्रदर्शन करते हुए करीब एक तिहाई आबादी को फिलिस्तीन राष्ट्र से बेघर कर दिया है। और लाखों लोगों को मार डाला है यह धर्म के साथ राजनीति का सबसे गंदा चेहरा है। हमारे लोकतंत्र को इस दिशा में आगे बढ़ने से क्यों नहीं बचना चाहिए…?

……..……….(.त्रिलोकी नाथ)……………..

कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश की धरती में यह याद दिला कहकर विदाई ली कि यह उनका अंतिम चुनाव प्रचार अभियान होगा क्योंकि उन्हें झारखंड में जाना है।birsa munda saved freedom and dharma both from christianity and british -  India Hindi News - धर्म बचाया और आजादी भी; कैसे 25 साल के बिरसा मुंडा ने  जंगलों से मिशनरियों को झारखंड में जनजाति समाज के क्रांतिकारी नेता बिरसा मुंडा का जन्म दिवस है जो अंग्रेजो के प्राकृतिक संसाधन लूट का पहला बिद्रोही ने आंदोलन चलाया था। जिसका आशय था ,डाकुओं, लुटेरो को मार भगाओ पर अपने परम्परागत आयुध धनुष बाण के बूते आधुनिक अस्त्रों से सुसज्जित अंग्रेजी फौज से भला कब तक लोहा लेते ..?इसलिए बाद में पकड़े गए और अंग्रेजी कानून के तहद उन्हें फांसी की सजा हुई ।
अंग्रेजी हुकूमत मे बिरसा मुंडा की कोई निजी सम्पत्ति नही लूट रही थी । यू भी आदिबासी समुदाय की साझी सम्पत्ति प्राकृतिक संसाधन ही तो है जिसे वह सामूहिकता के साथ बचाता है। जीव जगत को लाखों वर्ष बनाये रखने की अवधारणा वाली उनकी संस्कृति में यू भी निजी सम्पत्ति का अधिक महत्व नही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने ही उन्हें शायद मध्य प्रदेश की धरती से ही भगवान का दर्जा दिया और “भगवान बिरसा मुंडा” कहकर महिमा पंडित किया था…उसी तरह जिस तरह अयोध्या के हिंदू सनातन धर्म में राजा रामचंद्र को भगवान राम का दर्जा प्रचारित किया गया है।
यह अलग बात है कि वह स्वाभाविक भगवान विष्णु के त्रेता युग में अवतार पुरुष थे क्योंकि राम से भाजपा की सत्ता की लक्ष्य पूर्ति होती है। इसलिए उन्होंने भगवान राम को लोकतंत्र में अयोध्या में स्थापित कर कॉपीराइट हासिल करने का अप्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया। यह भी अलग बात है कि इस अयोध्या में हजारों मंदिर हैं जिम अयोध्या के भाजपा के राम मंदिर की तरह भव्यता नहीं है।इसलिए जो राजनीतिक चेतना का भूचाल राम के नाम पर खड़ा किया गया वही चेतना का भूचाल आदिवासी जनजाति समाज में भाजपा के सत्ता प्राप्ति के लिए क्रांतिकारी नेता बिरसा मुंडा को राम के समक्ष भगवान का दर्जा देकर राजनीतिक लक्ष्य साधे गए हैं । और चुनाव के वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश की धरती में झारखंड को याद कहकर राजनीतिक संदेश देने और उसके आधार पर वोट डालने का भी संदेश दिया है।इसमें कोई शक नहीं है|

और यह नई बात भी नहीं है जब गुजरात का चुनाव हुआ था तब मध्य प्रदेश की धरती में इसी 14 नवंबर को जनजाति समाज के झारखंड के क्रांतिकारी नेता बिरसा मुंडा को महिमा मंडित करते हुए संविधान की पांचवी अनुसूची से संबंधित “पेसा एक्ट” लागू करने की दुबारा घोषणा जनजाति समाज से आई महिला राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू के द्वारा शहडोल के लालपुर में भव्य कार्यक्रम हुआ था।यह भी अलग बात है कि “पेसा एक्ट” जमीनी धरातल पर नाम मात्र का नहीं है. राष्ट्रपति जी के पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने5 दिसंबर 2021 को जब टंट्या भील महोत्सव इंदौर में इसी पेसा एक्ट को पहली बार लागू करने की घोषणा इंदौर में कर चुके थे।

नरेंद्र मोदी झारखंड में क्रांतिकारी नेता को भगवान का दर्जा देते हुए उनकी मूर्ति का अनावरण झारखंड में आज करेंगें, ताकि जहां विधानसभा के वोट डाले जा रहे हैं वहां का जनजाति समाज भाजपा के अंदर उनके भगवान को स्थापित करने की भव्यता दिखाई दे और उसे चमक के धुंध में जनजाति समाज अपना वोट अपने नए भगवान के लिए भाजपा के पक्ष में करें। कर्नाटक के चुनाव में तो स्पष्ट रूप से बजरंगबली के नाम पर वोट डालने का मांग की गई थी। यह अलग भी बात है रही कि वहां की जनता जनार्दन (यानि लोकतंत्र का वास्तविक भगवान) ने उनकी मांग को खारिज कर दिया और वह चुनाव हार गए।
ऐसा नहीं है की प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी ऐसे धार्मिक प्रति का उपयोग करने से परहेज करती है किंतु वह मर्यादा में रहकर छिंदवाड़ा में हनुमान जी के जरिए अपना राजनीतिक संदेश देना नहीं भूलती ।भारतीय जनता पार्टी इस मर्यादा का पालन नहीं करती इसलिए वह पारदर्शी तरीके से वोट बैंक के लक्ष्य को रखकर ईमानदारी से अपना संदेश देती है। बावजूद इस धार्मिक दुरुपयोग के संदेश को देने की अगर वह जैसे कर्नाटक में चुनाव हार गई… ,इस बार भी सभी विधानसभा में चुनाव हारती है तो यह भगवान की हार नहीं होगी‌, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के स्थापित चुनावी भगवानों की हार होगी।
क्योंकि वृंदावन के एक वास्तविक सन्यासी प्रेमानंद महाराज का संदेश बाद साफ है की हर व्यक्ति के अंदर भगवान है अगर वह अपने भगवान को देख लेता है और सत्य की राह पर चल पड़ता है तो हर मनुष्य में भगवान बनने की क्षमता है । इस हिसाब से बिरसा मुंडा को भगवान का दर्जा क्यों नहीं मिलना चाहिए… लेकिन जैसे राम स्वाभाविक भगवान होने के बावजूद लोकतंत्र की वोट बैंक के मात्र औजार बनकर रह गए वैसे ही बिरसा मुंडा क्या औजार बनकर सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन सकेंगे….? यह विधानसभा चुनाव के परिणामों से घोषित होगा।
यह भी अलग बात है कि भारतीय चुनाव आयोग इन धार्मिक प्रतीकों के दुरुपयोग पर अब चुप्पी साधे रखना लोकतंत्र के हित में समझने लगा है… अन्यथा अभी तक कुछ ना कुछ लोकतांत्रिक कार्यवाही धार्मिक दुरुपयोग को लेकर दिखाई पड़ती…? यह नए भारत का प्रतीक भी है।
धर्म का दुरुपयोग कितना खतरनाक होता है उन 24 लाख फिलिस्तीनियों पर गिर रहे इजरायल के कट्टरपंथी सोच से प्रदर्शित होता है जहां इजरायली प्रधानमंत्री अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए सत्ता में बने रहने के लिएअपनी धार्मिक कट्टरता का प्रदर्शन करते हुए करीब एक तिहाई आबादी को फिलिस्तीन राष्ट्र से बेघर कर दिया है। और लाखों लोगों को मार डाला है यह धर्म के साथ राजनीति का सबसे गंदा चेहरा है। हमारे लोकतंत्र को इस दिशा में आगे बढ़ने से क्यों नहीं बचना चाहिए…?
अगर भगवान बिरसा मुंडा का जन्मदिन आता है तो शहडोल संभागीय क्षेत्र में अथवा जनजाति समाज क्षेत्र में उन आंकड़ों को प्रदर्शित क्यों नहीं किया गया जो आदिवासी विशेष क्षेत्र के लिए बने “पेसा एक्ट” के तहत देश की आजादी के बाद कितने शोषण आदिवासियों को मुक्त कराया गया है…? उसे प्रदर्शित किया जाए।
बिरसा मुंडा ने अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए विद्रोह किया था क्या शहडोल जैसे क्षेत्रों की जनजाति समाज अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए एक कदम भी काम कर रहा है…? शायद नहीं.. इसीलिए शहडोल के तालाब, जंगल और खनिज संसाधन की लूट मची हुई है… हाल में एशिया का सबसे बड़ा ईवीएम गैस का स्रोत शहडोल में रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपना आधिपत्य बनाया है और उसे निकाल रही है। शहडोल का खनिज विभाग संविधान के तहत निर्धारित कानून में रिलायंस से अनुबंध करना भी उचित नहीं समझा और बिना अनुबंध के करोड़ अरबो रुपए का गैस अवैध रूप से निकल रहा है।
क्या भारतीय जनता पार्टी इसे नहीं देख पा रही है…? हमने पूर्व पर्यावरण मंत्री और मुख्यमंत्री रहे कमलनाथ जो विपक्ष के नेता हैं उनसे पूछा था उन्होंने कहा जब हमारी सत्ता आएगी हम अनुबंध कराएंगे…।
क्या भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर भारत के तमाम जनजाति समाज की विरासत में स्थित प्राकृतिक संसाधनों को आजाद भारत में अवैध रूप से निकलने की छूट दी जानी चाहिए…? शायद नहीं।
किंतु ऐसा हो रहा है आखिर जब लोकतंत्र का मतदाता अपना मतदान करता है तो वह आजादी की क्रांतिकारियों की मूल भावना में अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के पक्ष में वोट क्यों नहीं करता…? यह बड़ा मुद्दा है। जो किसी राजनीतिक पार्टी के किसी चुनावी घोषणा का हिस्सा नहीं होता।
शहडोल में भी भविष्य में भारी मात्रा में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन पानी का भयानक संकट आने वाला है.. संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में तो भारत में जल स्तर 2025 में ही घट जाने की चेतावनी संकेत दिए, किंतु इन पर चुनाव मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं होती क्योंकि भगवान-भगवान का खेल, खेल कर राजनीतिक पार्टियों तमाम मतदाताओं को सिर्फ “जैविक मशीन” बनाकर रख दिया है। अब तक तो यही समझ में आता है।
अन्यथा शहडोल नगर के तमाम प्राकृतिक अपराधों पर नियंत्रण के लिये, तालाबों की रक्षा के नाम पर मतदाता अपना वोट करता दिखाई देता… इसी तरह जो शहडोल की छोटी-छोटी नदियां और जंगल नष्ट हो रही हैं अगर वह वोट बैंक का मॉडल नहीं बन पाती तो भगवान बिरसा मुंडा जैसे कितने ही भगवान पैदा हो जाएं इस लोकतंत्र का कुछ नहीं होने वाला….. फिलहाल तो यही समझ में आता है। क्यों उम्मीद नहीं रखना चाहिए की मतदाता इन बिरसा मुंडा जैसे बलिदानियों से उनके बलिदान के मूल मुद्दों पर प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए अपना वोट करता है..? यह कैसा लोकतंत्र है ..? जरूर सोचिए और सोचते रहिए ताकि लोकतंत्र जिंदा रहे और कोई बात नहीं…


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