
बिल्कुल, वही का वही.. मार्ग में कोई परिवर्तन नहीं.. उसी तरह का अपमान; उसी तरह का सम्मान… बस चरित्र नायक बदला बदला सा लगा। यह भारतीय जनता पार्टी की संस्कृति का हिस्सा हो चला है ऐसा कहने पर क्यों कंजूसी करनी चाहिए। आखिर है वे एक ही परिवार के सदस्य हैं।
………..(त्रिलोकीनाथ)………
जी हां हिंदुत्व विचारधारा के जिस जोशो-खरोश से जी जान लगाकर पूर्व मुख्यमंत्री संत हृदय उमा भारती ने तत्कालीन में दिग्विजय सिंह की सरकार को हवा में उड़ा दी थीं। अब कारण चाहे कुछ भी हो, शिवराज ने अपनी रफ्तार में लाडली बहन की दिखने वाली आंधी चलाई और दोबारा सत्ता पर लौट आए। बावजूद इसके शिवराज को मुख्यमंत्री की कुर्सी के इर्द-गिर्द भी फटकने नहीं दिया गया। जिसका आभास शिवराज को चुनाव के पहले ही हो गया था। जब केंद्र से मोदी-साह की जोड़ी ने अपने मोहरे मध्यप्रदेश की सियासत में बढ़ा दिए थे। जिसमें सांसद और मंत्री भी थे।
यह कहने में भी क्यों कंजूसी करनी चाहिए कि केंद्र से आया प्रत्येक मोहरे को मुख्यमंत्री कुर्सी-दौड़ लगा दिया गया था। अपमान का अनुभव तो इन्हें भी हुआ होगा..; जो चुनाव हार गए थे जैसे गणेश सिंह या फगन सिंह कुलस्ते इन्हें संतोष अवश्य हुआ होगा की जनता ने इंटरव्यू में उन्हें बाहर कर दिया। इसलिए वह मुख्यमंत्री नहीं बन सकते ।
किंतु जिन लोगों ने चुनाव जीता कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल,नरेंद्र सिंह तोमर जैसे लोग जो मुख्यमंत्री की कुर्सी के रिजर्वेशन-कोटे से आए थे उन्हें भी शिवराज सिंह से कम अपमान हुआ होगा ऐसा समझना गलत होगा…
किंतु शिवराज तो शिवराज है उन्हें मालूम था की अपमान भोपाल से सीधे अमरकंटक का रास्ता दिखाता है और जब मुख्यमंत्री की नियुक्ति का प्रथम चरण पूरा हो गया तो उन्होंने अमरकंटक सन्यास मार्ग का वही रास्ता चुना जो उमा भारती ने मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद चुना था। तब मैंने अमरकंटक “माई की बगिया” में उमा भारती को प्राय: अर्धविक्षिप्त परिस्थितियों में अपमान की वेदना को बर्दाश्त करते देखाई था। क्योंकि वह संत हृदय की थीं। उमा का अपमान उनके भगवान राम के आराध्य में इस कदर व्याकुल कर दिया कि जब अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास हो रहा था तब भी उन्हें सम्मानजनक तरीके से सेवा का अवसर नहीं दिया गया। और वह गंगा की लहरों में उसके किनारे विश्राम की मुद्रा में लेती दिखाई दी। क्योंकि गंगा की गोद में उन्हें शांति की तलाश थी। धीरे-धीरे उमा भारती ने अपमान के स्वर्ग में आनंद की तलाश में लगी रही। हालांकि अंत में अंत में उन्होंने मध्य प्रदेश के राजस्व में अपना कोष भरने वाले आबकारी विभाग की शराब दुकानों में पत्थर फेंकना चालू कर दिया था। और बाद में शिव ने दया कर उन्हें मनाया भी,
तो वह लाडली बहनों की तरह शिवराज के ऊपर फूल बरसाती हुई भी दिखाई दीं। लगा, सब कुछ शायद ठीक हो जाए.. लेकिन यह अंत नहीं था। आश्वासन के बाढ़ मे चुनाव की नैया तो पार हो गई किंतु जो बाद में हुआ उसने सन्यास-मार्ग को ही लक्ष्य का संकेत दिया और शिवराज यह कहने के बाद भी कि “मैं मर जाऊंगा लेकिन दिल्ली अपने लिए कुछ मांगने नहीं जाऊंगा..” वे दिल्ली भी गए और लौट कर एक नए आश्वासन के साथ अमरकंटक में शांति की तलाश में आए। यह सब ने देखा है।
अब अमरकंटक में क्या-क्या हुआ इसका परिणाम तो आगे दिखेगा.. किंतु इतना जरूर तय हुआ कि उमा भारती जो दो दशक पहले इसी अमरकंटक में शांति की तलाश में संभवतः अब तक का एकमात्र राजनीतिक विद्रोह का संबोधन आम सभा के जरिए किया था वह साहस शिवराज सिंह ने दिखा पाए… क्योंकि आश्वासन का छतरी उन्हें अभी भी सुनहरे भविष्य की कल्पना दिखता है.. तो दो मुख्यमंत्री अब तक भोपाल से सीधे शांति की तलाश में अमरकंटक में भटकते दिखे….
हो सकता है यह राजनीति में किए गए पापों का प्रायश्चित हो। किंतु उमा ने कोई पाप नहीं किया था, इतना तो तय है पाप का जो हिस्सा उमा के साथ शिव ने किया था, उमा को परित्याग करके.. शायद मां नर्मदा इसी के लिए शिव के संन्यास की साक्षी रही…।
किंतु वही रास्ता, वही का वही यह थोड़ा रोमांचक रहा.. हालांकि बुढार के भारतीय जनता पार्टी के विधायक रहे छोटे लाल सरावगी के लिए यह संयोग हो सकता है किंतु प्रकट में यह प्रमाण है कि वर्ष 2023 में एक पूर्व मुख्यमंत्री का स्वागत करने का अवसर जो दो दशक पहले “सेम टू सेम” स्थिति में सरावगी जी को मिला दो दशक बाद उससे कम स्वागत अवसर इस बार नहीं था… अंतर यह था की 18 वर्षों में मुख्यमंत्री रहते शिवराज सिंह चौहान ने सरावगी जी का स्वागत स्वीकार नहीं किया था। बल्कि उनके राज्य में उन्हें शायद उमा-सहायता की प्रताड़ना का शिकार का अनुभव के दंश जरूर झेलने पड़े.. यह भी स्वाभाविक प्रमाणित है।
तो हम बात कर रहे थे उमा ने राजनीतिक संन्यास के जो रास्ते बनाए थे क्या उसी रास्ते पर शिवराज भी चल पड़े हैं या उनका संघर्ष संत ना होने के कारण गृहस्थी-जंजाल के चलते कुछ बड़ा होने वाला है.. यदि उनके जमीर टकराव के रास्ते चुनेगा तो संघर्ष बड़ा होगा। इसमें कोई शक नहीं करना चाहिए . विपक्षी पार्टी के साथ जो होता है वह उन्हें अपनों से भी अनुभव करना पड़ सकता है… इसलिए भी वक्त की नजाकत है मोदी-शाह के मरुस्थली तूफान में शुतुरमुर्ग की तरह स्वयं को जीवित रखना चाहिए। जैसा की केंद्र के कद्दावर मंत्री रहे नरेंद्र तोमर, प्रहलाद पटेल और कैलाश विजयवर्गी स्वीकार किया है । हो सकता है मोदी-शाह की जोड़ी खुश हो जाए और उन्हें उनके बचे-कुचे सम्मान के साथ राजनीति की मुख्य धारा में बहने का आनंद मिले… अन्यथा उनके राम भी उनसे मुंह फेर सकते हैं, फिर बाकी गंगा की लहरों में आनंद लेने के लिए उमा की तरह एक मार्ग और चुनना पड़े…।
यही आधुनिक राजनीति की कड़वी सच्चाई है यही विष है जो भाजपा के शिव को पीना पड़ेगा। अन्यथा उमा ने तो राजनीतिक पापों के प्रायश्चित का रास्ता बता ही रखा है क्योंकि वह संत हैं, संत हृदय है…
. शिव की शिव जाने…. यही हमारी सनातन व्यवस्था में कर्मों का फल कहलाता है….”हुई हैं वही, जो राम रचि राखा…..” इसकी एक झलक हमें 22 जनवरी को भी अयोध्या में शायद देखने को मिले चंपत के राम के दरबार में…….।

