भारतीय संसद महामारी कोविड और कैंसर का खतरे मे: उपराष्ट्रपति

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मुंबई "काही लोक विदेशात जाऊन..." : उपराष्‍ट्रपतींचा राहुल गांधींना टोला | पुढारीउपराष्ट्रपति जगदीप धनकड की माने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के  राम राज्य में और अमृतकाल के दौर में गुजर रही भारतीय लोकतंत्र का संसद को महामारी का सामना करना पड़ रहा है उन्होंने कहा की कभी संसद में ऐसी परिस्थितियों हो जाती हैं जिससे उसे कोविड महामारी की तरह सामना करना पड़ता है…. पेसे से अधिवक्ता यानी कानूनी जानकार उपराष्ट्रपति धनखड़ ने यहां तक कह दिया की प्रतिनिधि संस्थाओं और प्रतिनिधियों में जनता के विश्वास का काम होना समाज के लिए कैंसर है इस बड़ी सच्चाई को कबूलने के बाद उन्होंने सिर्फ इसके पीड़ा का अनुभव किया उसके निराकरण का कोई रास्ता नहीं बताया। यह बात उन्होंने मुंबई में 28 जनवरी को 84 में अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन पर कही।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने रविवार को कहा कि चर्चा, जो लोकतंत्र की आधारशिला  है. हंगामे में तब्दील हो गई है और सदन की कार्यवाही में व्यवधान लोकतंत्र के लिए कोविड के खतरे से कम नहीं है। धनखड़ ने 84वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारियों को सदन की मर्यादा सुनिश्चित करने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि विधायी निकायों की कार्यवाही में व्यवधान एक ‘दुखद परिदृश्य’ है। धनखड़ ने कहा, ‘यह
कोई रहस्य नहीं है कि गड़बड़ी और व्यवधान की योजना बनाई जाती है, जिसके लिए बैनर छापे जाते हैं और नारे गढ़े जाते हैं। ऐसी चीजों का हमारी प्रणाली में कोई स्थान नहीं है।’
उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रतिनिधि संस्थाओं और प्रतिनिधियों में जनता के विश्वास का कम होना समाज के लिए ‘कैंसर’ है। धनखड़ ने कहा कि पीठासीन अधिकारियों को सदन की कार्यवाही पर बारीक नजर रखनी चाहिए और
मर्यादा सुनिश्चित करने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने कहा,*पीठासीन अधिकारी लोकतांत्रिक स्तंभों के संरक्षक हैं।’ उन्होंने अफसोस जताया कि (सदन में) अनुशासनहीनता और अशोभनीय
व्यवहार की घटनाएं बढ़ रही हैं और व्यवधान डालने में गर्व महसूस किया जाता है। धनखड़ ने कहा, ‘यह परेशान करने वाला परिदृश्य है और इससे बाहर निकलने का रास्ता खोजने के लिए आत्ममंथन की जरूरत है।”
धनखड़ ने कहा कि पीठासीन अधिकारियों के कर्तव्यों में यह सुनिश्चित करना शामिल हैं कि विधायी प्रक्रिया सार्थक, जवाबदेह, प्रभावी और पारदर्शी हो तथा जनता की आवाज उठाई जाए। उन्होंने कहा, ‘जनता की ओर देखें। वे हमें चुनते हैं, उन्हें हमसे उम्मीदें हैं। वे चाहते हैं कि उनकी आकांक्षा हमारे माध्यम से साकार हो। ऐसे में, जब कोई कार्यवाही में व्यवधान पैदा करता है तो यह उनके (जनता) लिए कितना कष्टदायक होता है। तब यह और भी
अधिक पीडादायक होता है जब व्यवधान करने में गर्व महसूस किया जाता है।


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