
कहते हैं शहडोल में टोल टैक्स के मामले में स्थानी लोगों को छूट प्रदान की गई वह स्थानीय निवासी हैं और उन्हें नियमित वहां से आना-जाना होता है यानी स्थानीय व्यक्तियों को उसकी स्थानीयता के कारण विशेष छूट का कुछ प्राकृतिक हक है.वैसे भी शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र है,भारत के संविधान में इस क्षेत्र के निवासियों कोइस क्षेत्र के निवासियों को कुछ विशेष सुविधाएं मिली है जो पर्यावरण और पारिस्थितिकी के मामले में विशेष रूप से चिन्हित है बावजूद इसके शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में पर्यावरण एवं परिस्थितकी में भरपूर उपलब्ध हवा, पानी, जंगल रेत इत्यादि खनिज मामलों में उसका पहला हक है.लेकिन जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तब परिस्थितियों बदल जाती हैं कुछ इसी प्रकार नजर शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में विशेषकर प्रकृति उपहार रेत कीमाफियागरी में दिख रहा है
—————————-( त्रिलोकी नाथ )—————————-
जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार का शासन कायम हुआ है शहडोल में प्रतीत होता है उसके अधिकार वंचित कर दिए गए हैं विशेष तौर पर उपलब्ध होने वाले रेत खदान में रेत को एक माफिया अनुमति सिस्टम ने हाईजैक कर रखा है.कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री कमलनाथ की जब सरकार आई तो उसने नियम बना करके करोड़पतियो के लिए आदिवासी विशेष क्षेत्र की रेत खनिज सामग्री बाहरी लोगों को सौंप दी है .इस कारण से आम तौर पर सहज रूप से उपलब्ध होने वाला रेत सोने के समान बिकने की हालत पर आ गया है.एक स्थानीय समाचार पत्र की माने तो समाचार पत्र कहता है
प्रशासन ने मुंबई की सहकार ग्लोबल लिमिटेड कंपनी को जिले की 34 रेत खदानों का ठेका दे दिया गया है। जिसमें से 15 जनवरी से जिले की चार रेत खदानों से रेत निकासी का काम भी शुरू हो चुका है। जिले में अब 32 रुपएं स्क्वायर फीट के . हिसाब से कंपनी द्वारा रेत कीरायल्टी ली जाएगी। यानि हमें यदि सौ स्क्वायर फीट रेत लेना है तो उसकी रायल्टी. 3200 रुपए होगी। इसके अलावा इसमें रेत विक्रेता रेत परिवहन और अपना कमीशन यदि जोड़ता हैं तो आम लोगों को सौ स्क्वायर फीट रेत करीब चार,से पांच हजार रुपए में मिलेगी। ..
एक ट्रेक्टर में करीब सौ स्क्वायर’.फीट, डग्गी में करीब दो स्क्वायर फीट और हाइवा में करीब पांच सौ स्क्वायर फीट रेत आती है। जिले में अभी जिन चार रेत खदानों से रेत की निकासी की जा रही है, उसमें पोंड़ी, बोड्डिहा, चाका और मझगवां शामिल ।
तो एक नजर इस पर भी अवश्य रखना चाहिए की अर्थशास्त्र का मूल सिद्धांत मांग और पूर्ति के आधार पर सुनिश्चित होता हैऔर रेत की भरपूर मात्रा,असीमित रूप से शहडोल में उपलब्ध है यानी पर्याप्त पूर्ति है इसके बावजूद भी इस ठेके के जरिए नीलम करके किसी एक व्यक्ति को फ्रेंचाइजी दे देना कहां तक उचित है…? जोकहीं ना कहीं माफियागिरी को संरक्षण देता है औरउसके कारण अनेक प्रकार के अपराध घटित होते रहते हैं जैसा कि पूर्व में वंशिका ट्रेडर्स नाम की पूर्व में संस्था द्वारा शहडोल में जिस प्रकार से और अगल-बगल के जिलों में जिस प्रकार से खनिज का निर्वाध अवैध दोहन किया गया है और प्रशासन ने भी उसे चिन्हित करते हुए कई पुलिस प्रकरण भी दर्ज किए हैं जो यह सुनिश्चित करता है कि वास्तव में आदिवासी विशेष क्षेत्र में बाहरी ठेकेदारों द्वारा रेत खनिज की स्मगलिंग पर ज्यादा विश्वास करती है. वह वैध रूप से चिन्हित कुछ खदानों से कुछ खदानों से ही रेत निकाल इससे पर्यावरण और अपरिचित की पर क्या असर पड़ता है यह तो भविष्य में प्रकृति अपना निर्णय देगी तब पता चलेगा लेकिन वास्तव में वर्तमान में स्थानीय आम आदमियों को सहज रूप से प्राप्त उपहार खनिज रेत महंगाई का बड़ा कारण बन गया है.
इसी लोक तंत्र में जहां 80 करोड लोगों कोभूख से बचने के लिए 5 किलो अनाज देनेपेट भरने की व्यवस्था की जाती हैवहां आदिवासी क्षेत्र मेंमुफ्त मेंप्रकृति द्वारा मिलने वालेखनिज रेटजो कभीनेतासस्ते में देतेथे अब वह महंगी हो चली हैसमझ में ये नहीं आता कि पहले के नेताऔर अधिकारीयानी विधायिका और कार्यपालिका मुर्ख थे या वर्तमान के नेता बुद्धिमान अथवा विपरीत है…? सब कुछ भ्रामक है इसके बावजूद कभी 200 से ₹300 प्रति ट्रैक्टर ट्रॉली अब 5 से ₹6000भी मिल जाए तो बड़ी बात है…? और यह किस अर्थशास्त्र के सिद्धांत पर निर्धारित होता है यह विचार करने योग्य है…? यह बात भी साथ-साथ चलती है की आदिवासी विशेष क्षेत्र में पेसा एक्ट के तहत रेत खनिज की उपलब्धता विशेष अधिकार हैं वावजूद इसके संबंधित जिला पंचायत का मुख्य कार्यपालक अधिकारी हो अथवा जिला पंचायत की परिषद हो दोनों ही ग्राम सभाओं को अधिकारों के प्रति जागरूक करने के मामले में नकारा साबित हुए हैं .इस मामले में डिंडोरी जिला की ओर से एक मामला रेट खदानों को लेकर हाईकोर्ट में अधिकारों की अधिकारिक पर चल भी रहा है.लेकिन शहडोल में ग्राम सभाओं कोउसके अधिकारों को मोटे तौर पर जिला पंचायत का मुख्य कार्यपालन अधिकारी निष्फल रहा है.या कहा जा सकता है की रेत खनिज के मामले में व्याख्या करने पर ठेकेदारों के पक्ष में अपना विचार रखता है और यही कारण है कि शहडोल में पर्याप्त वा होने के बाद भी अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांत के खिलाफ जाकर केअधिकतम महंगी रेत बाजार में स्थानी लोगों को उपलब्ध हो पा रही है..
यह सही है कि शहडोल से बाहर ले जा करके इस रेत को महंगा बेचा जा सकता है लेकिन जिस प्रकार से रेत खनिज के मामले में माफिया गिरी सक्रिय है और शासन प्रशासन राजस्व की लालच में इन पूंजीपतियों में एक नकली प्रतियोगिता बना करके रेत की रॉयल्टी बढ़ा दी गई है उसे स्थानी लोगों का शोषण आम बात हो रही है जिसे रोकने की जिम्मेदारी जिला पंचायत के जिला परिषद की सर्वोच्च है कि वह अपना निर्णय इस मामले में स्पष्ट करें किंतु ऐसा करना तभी संभव होगा जब परिषद के हर सदस्य जागरूक और ईमानदार हो तथा ग्राम सभा में आदिवासी विशेष क्षेत्र के मामले मेंसंपूर्ण जागरूकता रखते हो जो फिलहाल तो नहीं दिखता है और इसीलिए इस आदिवासी विशेष क्षेत्र के तमाम खनिज वस्तुएं आम आदमियों को अधिकारों से छीन करके पूंजीपतियों के हवाले माफिया गिरी के तौर पर लूट रही है

