
भ्रष्ट-निर्वाचन की चंडी कार्यपालिका ने चंडीगढ़ में किया पारदर्शी चुनावी-भ्रष्टाचार…..-1
लोकतंत्र में कार्यपालिका एक स्तंभ के रूप में पढ़ा लिखा और बौद्धिक समाज पैदा करके रखा गया है यह माना जाता है कि यह विशिष्ट बुद्धिजीवी समाज है जो आजाद भारत में गुलाम नहीं हो सकता है जिसमे भारत स्तर प्रशासनिक सेवाओं से, राज्यस्तर प्रशासनिक सेवाओं से और कुछ अनुकंपा और कुछ कृपा से पैदा किया जाता है। किंतु दुर्भाग्य वस प्रतियोगिता से पैदा हुआ बौद्धिक समाज होने के बावजूद यह न्यायपालिका की तरह अपने को लोकतंत्र का सच्चा सिपाही साबित नहीं करता, अक्सर देखा गया है यह विधायिका का बेहतरीन गुलाम बनने में और उसके हां में हां मिलाने में अपनी बुद्धिमत्ता समझता है उसे भारतीय संविधान से बहुत लेना देना नहीं रहता धीरे-धीरे इस समाज ने यानी कार्यपालिका ने स्वीकार कर लिया है कि विधायिका राजा है और वह उसका प्रधान गुलाम…
————————-( त्रिलोकी नाथ )—————————-
वरिष्ठ पत्रकारसंदीप चौधरी नेअपने कार्यक्रमसीधा सवाल परचंडीगढ़मेयर चुनाव मेंपारदर्शीचुनावी भ्रष्टाचार कीबड़ी रिपोर्टटीवी चैनल ए बी पीपरदिखाई है समाचारमें प्रकाशित चित्र का अंश हैऔर इसे प्रमाणित करने के लिए चंडीगढ़ के नगर निगम में मेयर के चुनाव पर पीठाधीश ने पूरी पारदर्शिता के साथ स्वयं को अपनी पूरी बौद्धिकता के साथ प्रमाणित करने का काम किया. यह अलग बात है कि वह मान चुका था की निर्वाचन आयोग पूर्णतया आंख बंद कर रहेगा किंतु इस कलयुग में कलयुग महाराज की आंखें यानी सीसीटीवी को वह घूरता जरूर रह गया किंतु सीसीटीवी ने दगा दे दिया और कार्यपालिका के इस गुलाम की सच्चाई सामने आ गई कि उसने किस प्रकार से पूरी पारदर्शक के साथ निष्पक्ष चुनाव को मजाक बनाया था। अब यह उस पीठाधीश मसीह की मूर्खता कही जाएगी या योग्यता यह तो उच्चतम न्यायालय के निर्णय आने के बाद प्रमाणित होगा किंतु फिलहाल चंडीगढ़ के नगर निगम के चुनाव में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रणाली को लोकतंत्र की हत्या के रूप में निरूपित किया है तो लिए पहले जान ले चंडीगढ़ में कार्यपालिका का यह कर्तव्य निष्ठ सिपाही कितनी निष्ठा के साथ अपने आका के लिए काम कर रहा था..
समाचार पत्र दैनिक जनसत्ता के अनुसार उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को “लोकतंत्र की हत्या” करार देते हुए आदेश दिया कि मतपत्रों और चुनावी कार्यवाही के वीडियो को संरक्षित रखा जाए।आम आदमी पार्टी (आप) के एक पार्षद की याचिका का संज्ञान लेते हुए शीर्ष न्यायालय ने नगर निकाय सहित चंडीगढ़प्राधिकारियों को नोटिस जारी किए। साथ ही निर्देश दिया कि सात फरवरी को होने वाली चंडीगढ़ नगर निगम की आगामी बैठक स्थगित कर दी जाएगी। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला तथा न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने चुनाव कार्यवाही का वीडियो देखने के बाद कहा कि जो कुछ हुआ, उससे हम स्तब्ध हैं। हम लोकतंत्र की इस तरह हत्या नहीं करने देंगे। इस अधिकारी पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए।
आप के एक पार्षद ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था, जिसमें चंडीगढ़ महापौर चुनाव नए सिरे से कराने के पार्टी के अनुरोध पर कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। भाजपा ने 30 जनवरी को चंडीगढ़ महापौर चुनाव में कांग्रेस-आप गठजोड़ के खिलाफ जीत हासिल की थी। महापौर पद के लिए हुए चुनाव में भाजपा के मनोज सोनकर ने आप के कुलदीप कुमार को हराया था। सोनकर को 16 जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी को 12वोट मिले थे। वहीं, आठ वोट को अवैध घोषित कर दिया गया था।
ऐसी बात नहीं है की कार्यपालिका का वेतनखोर यह सेवक पहला सेवक रहा हो… जिसने अपने आका की जी हुजूरी में स्वयं को साबित करने का प्रयास किया. शहडोल संभाग के उमरिया जिला अंतर्गत जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में अनुभव में पाया गया कि किस प्रकार से पीठासीन अधिकारी ने आदिवासी नेता से झगड़ा करके अपने आका के प्रति निष्ठा व्यक्त किया था और विरोधी व्यक्ति को निर्वाचित घोषित किया था. इसकी चर्चा के लिए कोई सीसीटीवी पारदर्शी तरीके से प्रमाणित होकर सामने नहीं आई थी बस पुलिस रिकॉर्ड में जो दर्ज हुए और आदिवासी नेताओं की अधिकार की जो मांग दर्ज हुई, वहीं एक रिकॉर्ड रहा. मामला उच्च न्यायालय में लंबित है और लंबित रहता ठीक उसी तरह जैसे कि चंडीगढ़ के उच्च न्यायालय में चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव का मामला टाल दिया गया.. किंतु सुप्रीम कोर्ट में जाते ही इस प्रकरण को प्रथम दृष्टया लोकतंत्र की हत्या के रूप में निरूपित किया गया।
अक्सर लोग मीडिया और पत्रकारिता को लोकतंत्र की बदहल स्थिति का जिम्मेदार बताते हैं किंतु जब भी जैसा भी परीक्षित रही हो यही मीडिया यह पत्रकारिता ने उसे डूबने से बचाया है.. और कोई ना कोई पत्रकारिता का वायरस इतना सक्रिय हो जाता है की कार्यपालिका और विधायिका के साथ मिलकर लोकतंत्र की हत्या के तमाम सपनों को ताश के पत्तों की तरह उसे यदा कदा गिरा देने का काम मीडिया करता रहा है… यही लोकतंत्र की ताकत है, अब आप अंदाज लगा लीजिए कि बिना अधिकार और बिना आर्थिक बुनियादी ढांचा के, बिना किसी संवैधानिक ताकत के पत्रकारिता अगर यह कर पा रही है तो लोकतंत्र की कार्यपालिका में बैठा हुआ प्रशासनिक सेवाओं का वेतन पाने वाला तथा कथित कर्तव्य निष्ठ कर्मचारी और अधिकारी क्या लोकतंत्र को बचा नहीं सकते …?
लेकिन हो उल्टा रहा है भ्रष्टाचार की चाहत और अयोग्यता की स्थापना के कारणो तमाम संवैधानिक अधिकारों को भ्रष्ट विधायिका के शरण में जाने पर कार्यपालिका के लोग स्वयं को धन्य मानने का काम करते हैं यह देखा जा रहा है. यह अलग बात है की जो वास्तव में बहुसंख्यक नहीं है प्रतियोगी परीक्षाओं में राष्ट्रीय स्तर की यानि भारतीय स्तर की परीक्षा प्रणाली से बौद्धिक तबका निकलकर प्रमुख लोक सेवक के रूप में कलेक्टर, एसपी, सेक्रेटरी आदि- आदि के रूप में स्थापित होता है वह तो कुछ आजादी के प्रति समर्पित होता दिखता है किंतु विधायिका द्वारा बहुसंख्यक बना दिया गया पदोन्नति प्राप्त लोक सेवक है वह पूरे वातावरण को भ्रष्टाचार की प्रतियोगिता में विधायिका के गुलाम के रूप में समर्पित हो जाने के लिए प्रतियोगी बन जाता है… परिणाम स्वरूप उसे विधायिका का असंवैधानिक कृत्यों के प्रति गुलाम की तरह व्यवहार करना पड़ता है. जिस विधायिका में अब अपराधिक प्रवृत्ति के लोग समाज से लोक और कृपा और अनुकंपा से प्राप्त चट्टुकारों की भीड़ विधायिका को नियंत्रित कर रही है.
और यही कारण है कि चंडीगढ़ में मेयर के चुनाव मैं मैं प्रशासनिक अधिकारी पीठासीन मशीह पूरी पारदर्शक के साथ लोकतंत्र की हत्या करने का काम किया…. क्योंकि वह अपनी संपूर्ण शिक्षा, प्रतियोगिता परीक्षा को पास करने वाली योग्यता, भ्रष्ट विधायिका की गुलाम सिस्टम में बेहतरीन गुलाम बनने का और दिखाने के लिए प्रयासरत रहा… पीठासीन अधिकारी मसीह पूरे देश में कार्यपालिका का वह प्रमाणित भ्रष्ट-गुलाम है जो कैंसर की तरह फैल गए लोकतंत्र की आजादी में कार्यपालिका के पूरे सिस्टम में सडांध मार रही है। (…..जारी 2)

