भारत रत्न पुरस्कार; राजनीति का नया हथियार….? -त्रिलोकीनाथ

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संविधान में सम्मान देने की इजाजत ...   भारत रत्न सम्मान के लिए सभी व्यक्ति जाति, व्यवसाय, पद और लिंग के भेदभाव के बिना पात्र हैं। इस पुरस्कार से अंलकरण मानव प्रयत्न के किसी भी क्षेत्र में की गई सर्वोत्कृष्ट स्तर के निष्पादन के सम्मान के फलस्वरूप दिया जाता है।.देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान जो 1954 में प्रारंभ किया गया था अपनी शुरुआती प्रतिष्ठा और सम्मानजनक गरिमा से शुरुआत हुआ था और उन लोगों को प्राप्त हुआ वास्तव में जो निष्पक्ष रूप से इसे प्राप्त करने के हकदार थे। बाद में यह भारत रत्न सम्मान पक्षपात रूप से प्रभावित होने लगा। लेकिन जब देश में उनके अनुसार नई आजादी 2014 में आई यानी नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद भारत रत्न सम्मान मरणोपरांत दिए जाने की बहुतायत परंपरा बन गई दिखती है अथवा उन लोगों को दिया गया जिससे भारत का वोट-बैंक प्रभावित होता है। यानी भारत रत्न वोट साधने की एक औजार मात्र बनकर रह गया।                     

———————( त्रिलोकीनाथ )————————–

1-2014 सी॰ एन आर राव,(30 जून, 1934-अब तक), 16 नवंबर, 2014 घोषित. 

2- 2014 सचिन तेंदुलकर (24 अप्रैल, 1973-अभी तक), 16 नवंबर 2014 घोषित

3- 2015 अटल बिहारी वाजपेयी,(25 दिसंबर, 1924-16 अगस्त 2018), 25 दिसंबर, 2015 को घोषित

4- 2015 मदन मोहन मालवीय(25 दिसंबर, 1861- 12 नवंबर, 1946, मरणोपरांत), 25 दिसंबर 2015 को घोषित किया गया

5- 2019 प्रणब मुखर्जी,(11 दिसम्बर 1935 31 अगस्त 2020 )

6- 2019 नानाजी देशमुख,(11 अक्टूबर 1916 27 फ़रवरी 2010), मरणोपरांत

7- 2019 भूपेन हजारिका(8 सितंबर 1926 5 नवंबर 2011), मरणोपरांत

8- 2024 कर्पूरी ठाकुर ,(24 जनवरीर 1924 17 फ़रवरी 1988), मरणोपरांत

9- 2024 लालकृष्ण आडवाणी,(8 नवंबर 1927-अभी तक)

10-2024 चौधरी चरण सिंह(23 दिसंबर 1902 – 29 मई 1987), मरणोपरांत

 11- 2024 पी.वी. नरसिम्हा राव (28 जून 1921-23 दिसम्बर 2004), मरणोपरांत

,12- 2024 डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन(7 अगस्त 1925-28 सितंबर 2023), मरणोपरांत

और यह अच्छा भी है भारत रत्न का पतन इसी स्तर पर होना चाहिए उससे अच्छा यह है कि यह मरणोपरांत लोगों को ही दिया गया है, जो चाह कर भी जाग कर भारत रत्न सम्मान वापस नहीं लौटा सकते। अन्यथा भारत रत्न सम्मान का वही हश्र हुआ होता जो की साहित्य अकादमी पुरस्कारों का 2014 के बाद पुरस्कार विजेताओं ने वापस लौट कर भारत सरकार की धज्जियां उड़ा दी थी।  कारण चाहे जो कुछ भी रहा हो, हुआ यही था। साहित्य अकादमी पुरस्कारों को वापस लौटने की झड़ी लग गई थी क्योंकि पुरस्कार प्राप्त विजेताओं को लगा था कि भारत में सहिष्णुता नाम क्या चिड़िया अब खत्म हो गई है। और इसके बाद पुरस्कार लौटने की परंपरा को या  रोड में छोड़ देने की परंपरा को बलात्कार और योन पीड़ित खिलाड़ियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके सड़क पर प्राप्त पदकों को लौट कर साधारण भाषा में फेंक कर अपना सम्मान और स्वाभिमान बढ़ाने का प्रयास किया था। जिसमें ओलंपिक विजेता महिला खिलाड़ी और पुलिस पुरुष खिलाड़ी भी शामिल रहे हैं।

इन हालातो में जब की स्वाभिमान को धक्का लगता हो और न्याय प्रणाली संदेह के घेरे में हो अथवा अन्याय का साथ दे रही हो या उसे संरक्षण दे रही हो प्राप्त पुरस्कारों की तिलांजलि भी एक तरीका भारत की नई आजादी में देखा गया है। यह उन लोगों द्वारा किया गया है जिन्होंने अपने दमखम पर देश और दुनिया में भारत का नाम ऊंचा किया ।

यह भी सही है कि खेलों की दुनिया में पहचान वाले व्यक्तित्व को भारत रत्न पुरस्कार जिस जीवित लोगों को 2014 के बाद दिया गया है उनमें वह स्वाभिमान प्रकट होता हुआ नहीं दिखा.. खास तौर से महिला खिलाड़ियों की यौन प्रताड़ना और अन्य के मामले में विशेष कर युवा खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर द्वारा भारत रत्न लौटना तो दूर की बात भारतीय महिला खिलाड़ियों के स्वाभिमान बचाए रखने के पक्ष में एक टिप्पणी तक बोलने का साहस नहीं दिखाया गया।

बहरहाल हम भारत रत्न के 2014 के बाद राजनीतिक प्रयोग अथवा दुरुपयोग या फिर औजार बनाए जाने पर चर्चा कर रहे थे, तो जिन 12 लोगों  को देश की 2014 के बाद नई आजादी में भारत रत्न दिया गया उसमें सात लोगों को मृत्यु बाद यह पुरस्कार प्राप्त हुआ है। स्वाभाविक है भारत रत्न पुरस्कार प्राप्त करने के बाद टिप्पणी करने पर इन व्यक्तित्व की कोई आवाज जिंदा नहीं है  ।

जिन जीवित पांच लोगों को पुरस्कार प्राप्त हुआ है उसमे सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से संबंधित उसमें अटल बिहारी वाजपेई लगभग सैया अवस्था पर रहे,  लालकृष्ण आडवाणी सैया में ना रहने के बाद भी लगभग उसी हालत पर भाजपा के मार्गदर्शक मंडल का प्रमुख चेहरा है। जिसमें तटस्थ कर दिए गए लोगो शामिल कर दिए गये। बावजूद वे आरएसएस से जुड़े पाकिस्तान से आए सिंधी समाज के शरणार्थियों का प्रमुख चेहरा है। समझा जा सकता है सिंधी समाज को खुश करने के लिए उनके संगठन को देखते हुए पुरस्कार दिया गया है । यानी 2024 के वोट बैंक के लिए पुरस्कृत किया गया है। प्रणब मुखर्जी को कूटनीतिक राजनीतिक पहल के रूप में पुरस्कृत करना देखा गया है। इस तरह साथ मृत व्यक्तियों और और तीन राजनीतिक उद्देश्य पूर्ति के लिए भारत रत्न प्रत्यक्ष रूप से दिए गए हैं मात्र दो सचिन तेंदुलकर और सीएनआर राव को भारत रत्न में निष्पक्षता को दिखाया जा सकता है किंतु राम मंदिर में जिस तरह सचिन तेंदुलकर भक्ति-भाव का प्रदर्शन किया और महिला खिलाड़ियों के मामले में अपने व्यक्तित्व को छुपा कर रखा उससे 12 दिए गए भारत रत्न पुरस्कारों में मात्र एक भारत रत्न पुरस्कार की निष्पक्षता पर प्रश्न नहीं खड़ा किया जा सकता से सभी भारत रत्न पुरस्कार पात्र होते हुए व्यक्तित्व को भी उनके व्यक्तित्व के खिलाफ जाकर उन्हें पुरस्कृत किया गया है.. ऐसा समझा जा सकता है  ।

हाल में मात्र एक पखवाड़े में जिन पांच भारत रत्न पुरस्कारों की घोषणा की गई है उसमें कर्पूरी ठाकुर ,चौधरी चरण सिंह ,पीवी नरसिंहा राव डॉक्टर एस स्वामीनाथन के आदर्श और उनकी विचारधारा या उनके द्वारा अपनाई गई जीवन प्रणाली को पुरस्कार देने वाले भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वीकार नहीं करते हैं ।

यह भी कहा जा सकता है कि अगर यह व्यक्ति जीवित होते तो हो सकता है साहित्य अकादमी पुरस्कारों की तरह भारत रत्न पुरस्कार को भी लेने से मना कर देते। क्योंकि जिन मापदंडों को उन्होंने भारत की जीवन प्रणाली का और भारत के भविष्य का आधार बनाया है या उसे स्थापित किया है वर्तमान सरकार का उससे जमीन पर कोई संबंध दिखाई नहीं देता। तो कहां जा सकता है कि जैसे राम मंदिर के रामलला विराजमान की मूर्ति के समक्ष एक राजनीतिक उद्देश्य पूर्ति के लिए अन्य मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा उससे बड़ी कर दी गई है और उसका राजनीतिक उपयोग औजार के रूप में किया जा रहा है इस तरह मरणोपरांत तमाम नागरिकों को भारत रत्न सम्मान उनकी साख और प्रतिभा को वोट बैंक में कन्वर्ट करने के उद्देश्य से भारत रत्न देकर सिर्फ वोट बैंक साधने का काम किया गया है। यह अलग बात है कि उसके परिणाम लक्ष्य पूर्ति के हिसाब से 2024 के चुनाव में किस प्रकार दिखेंगे …? फिलहाल यही सच है कि भारत रत्न पुरस्कार भारत की नई आजादी 2014 के बाद सिर्फ पॉलिटिकल टूल बन कर रह गया है कोई बड़ी बात नहीं है कि नरेंद्र मोदी अपने जीवित रहते हुए स्वयं को भी अथवा अपने मित्रों को भी यह पुरस्कार से सम्मानित कर डालें…? 2024 के चुनाव के बाद इसके परिणाम देखे जा सकते हैं की पॉलिटिकल टूल भारत रत्न पुरस्कार अपने लक्ष्य या किस हद तक भेद पाया है…?


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