“प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्” राजनीति में हरामी, कम पढ़ा-लिखा और अरबपति होना क्या एक योग्यता है…? ( त्रिलोकीनाथ )

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    तो यह समझना जरूरी होगा कि जिस देश में करीब 81 करोड़ लोग भिखारी के रूप में लाभार्थी जाति के चिन्हित किए गए हैं और पेट भरने के लिए उन्हें अनाज दिया जा रहा है, उस देश में जब विधायिका का सर्वोच्च सदन अपना प्रतिनिधि चुनता है जिसे जनप्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता है उसमें भिखारी कम लाभार्थी जाति का 81 करोड लोगों में एक भी व्यक्ति उसकी आर्थिक स्थिति के आधार पर राज्यसभा का सदस्य नहीं होता।   यह प्रश्न 21वीं सदी के भारत की कड़वी सच्चाई है और यह कड़वी पतित सच्चाई विधायिका के सर्वोच्च सदन राज्यसभा में उम्मीदवारों की उम्मीदवारी से सामने आई है। समाचार एजेंसी भाषा के अनुसार चुनाव में अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था संगठन का एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर)ने जो रिपोर्ट प्रकाशित की है उसके अनुसार हाल में राज्यसभा चुनाव के लिए 15 राज्यों में 56 सीटों के लिए मैदान में उतरे 59 उम्मीदवार में 58 उम्मीदवारों के शपथ पत्रों को समीक्षा की गई है ।

—————( त्रिलोकीनाथ )————–

जिसके अनुसार मुख्य रूप से  तथ्य उभर कर आए हैं।58 उम्मीदवार ने अपने शपथ पत्र में स्वीकार किया है कि उन पर आपराधिक मामले चल रहे हैं जिसमें भाजपा के 30 में से 8 उम्मीदवार कांग्रेस के 9 में से 6 उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस के 4 में से 1 उम्मीदवार समाजवादी पार्टी के 3 में से 2 उम्मीदवार वाईएसआर सीपी के 3 में से 1 उम्मीदवार राष्ट्रीय जनता दल के 2 में से 1 उम्मीदवार बीजू जनता दल के 2 में से 1 उम्मीदवार ने हलफनामे में अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है की एक उम्मीदवार पर हत्या के प्रयास से संबंधित मामला भी चल रहा है।प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है की 17 फ़ीसदी उम्मीदवार पांचवी से लेकर 12वीं तक की पढ़ाई किए हैं वहीं 79% उम्मीदवार ग्रेजुएट अथवा उच्च शिक्षा ग्रहण किए हैं

अब बात करते हैं इन 58 उम्मीदवारों में इनकी औसत संपत्ति 127.81 करोड रुपए है। जिसमें कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी की संपत्ति 1872 करोड रुपए उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी की जय अमिताभ बच्चन की संपत्ति 1578 करोड रुपए कर्नाटक से जनता दल एस के उम्मीदवार कुपेंद्र रेड्डी की संपत्ति 871 करोड रुपए।
और इन सब में सबसे कम संपत्ति के मालिक मध्य प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के बाल योगी उमेश नाथ की है जिनकी संपत्ति 47 लाख रुपए से अधिक है।

तो यह समझना जरूरी होगा कि जिस देश में करीब 81 करोड़ लोग भिखारी के रूप में लाभार्थी जाति के चिन्हित किए गए हैं और पेट भरने के लिए उन्हें अनाज दिया जा रहा है, उस देश में जब विधायिका का सर्वोच्च सदन अपना प्रतिनिधि चुनता है जिसे जनप्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता है उसमें भिखारी कम लाभार्थी जाति का 81 करोड लोगों में एक भी व्यक्ति उसकी आर्थिक स्थिति के आधार पर राज्यसभा का सदस्य नहीं होता। यानी 81 करोड लोग पूरी तरह से आयोग्य घोषित करार दिए जाते हैं क्योंकि उसमें योग्य व्यक्ति नहीं होते। क्योंकि सबसे कम संपत्ति का मालिक 47 लाख रुपए की संपत्ति घोषित करता है जो मध्य प्रदेश का भाजपा उम्मीदवार बाल योगी उमेश नाथ होता है। ऐसे में भारत का सर्वोच्च विधायिका का संसद-सदन कम से कम भिखारी कम लाभार्थी जाति जिसमें बहुतायत ईमानदारी जैसी बीमारी को नैतिक जीवन में ढो रहे होते हैं, का तो नहीं होता है…. यह स्पष्ट है।
अब दूसरी बात यह भी देखने लायक है क्योंकि इनमें हारामी तरीके से पैसा कमाने और बड़ा आदमी बनने की कोई सोच नहीं होती सबसे कम आमदनी वाला 47 लख रुपए की संपत्ति घोषित करने वाला भाजपा का उम्मीदवार यह पैसा कैसे कमाया है अगर इसी की समीक्षा कर ली जाएगी तो स्पष्ट होगा की आमदनी कम से कम इमानदारी से तो नहीं आई होती है…?
अब दूसरी बात इस विधायिका के उच्च सदन में जिन्हें भेजा गया है वह कितने पढ़े लिखे हैं इस मामले में कहा जा सकता है की प्रतिनिधि भारत के भिखारी कम लाभार्थी 81 करोड़ की जनता के प्रतिनिधियों में शामिल हैं क्योंकि वह 11वीं अथवा 12वीं तक पढ़े लिखे हैं.. कहा जा सकता है सदन में पढ़े लिखे समाज की बहुत आवश्यकता नहीं है.. तो फिर 81 करोड़ लाभार्थी जाति के गरीब लोगों में से उनकी गरीबी को तिरष्कृत कर दिया जाता है और उनकी कम पढ़े लिखे होने की शिक्षा को ग्रहण क्यों कर लिया जाता है…? उसे योग्यता क्यों माना जाता है..? यह बड़ा प्रश्न चिन्ह है ।
अब चलते हैं भारत की विधायिका के उच्च सदन में 21वीं सदी में उच्चतम चुने गए बौद्धिक जनप्रतिनिधियों द्वारा चुने गए व्यक्तियों के अपराध की दुनिया के मामले में रिपोर्ट स्पष्ट करती है की जो लाभार्थी जाति है जिसमें भिखारी के रूप में उन्हें अनाज दिया जा रहा है पेट भरने के लिए उनकी विशेष योग्यता यानी अपराधी की योग्यता को कोई अछूत करार नहीं किया गया है। उनकी उस महान योग्यता अपराध करने की योग्यता धारी को 36 फ़ीसदी उम्मीदवारों को उनकी योग्यता समझ करके मान्यता दी गई है। एक ऐसा भी उम्मीदवार इन 58 लोगों में से है जिसके ऊपर हत्या का मुकदमा चल रहा है। चोरी बदमाशी रह जानी 420 और धमकी आदि तो सामान्य अपराधों की श्रेणी तरह देखे गए होंगे।
तो सवाल यह है कि भारत के 140 करोड़ नागरिकों में सिर्फ 58 चिन्हित व्यक्तियों में भी अपराध मुक्त व्यक्ति आखिर पैदा क्यों नहीं किये जा सके…? क्या यह भी एक बड़ी योग्यता है…?
जो हराम के धन से चोरी और बेईमानी करके अनैतिकता से किंतु कानूनी भाषा में करोड़पति और अरबपति बनने की महत्वपूर्ण सीड़ी है और इस पर चढ़कर के 81 करोड़ लाभार्थी चिन्हित जातियों में से जनप्रतिनिधि उनकी इस विशेष योग्यता को भारत के उच्च सदन की सर्वाधिक योग्यता के रूप में स्वीकार करने लगा है।
क्या यही 21वीं सदी का भारत है..? ऐसे प्रश्न चिन्ह राज्यसभा के 56 सीटों में आए 59 उम्मीदवारों के बीच से निखर कर आ रहे हैं कि। तो क्या हमारी विधायिका ने यह स्वीकार कर लिया है की इन प्रकरण हराम की कमाई करके हारामी हो जाना और फिर हराम की कमाई करके अपराधी हो जाना सोने में सुहागा की तरह एक योग्यता है…? और अगर आप कम पढ़े लिखे हैं तो आपकी इस योग्यता को भारत की विधायिका के उच्च सदन के लिए बहुत अयोग्ता नहीं मानी जाएगी। कम से कम 17 फीसदी उम्मीदवारों के मामले में यह स्वीकार किया गया है ।
यही भारत की आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद तथाकथित अमृतकाल का अमृत है। क्या इसी योग्यता को हम प्रोत्साहित कर रहे हैं…? या यह योग्यता एक भयानक तानाशाह के रूप में भारत की नागरिकों के ऊपर ला दी जा रही है…? क्या इसे बचा नहीं जा सकता था…? और अगर नहीं बचा जा सकता था तो क्यों नहीं बचा जा सकता था…?
सिर्फ 140 करोड़ में 56 उम्मीदवार चुनने के लिए आए 59 व्यक्तियों में भी हम यह पवित्रता नहीं ला सकते तो फिर यह देश किन लोगों का देश है…? यह प्रमाणित होता है ।और यही वर्तमान का प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् है ,है कि नहीं मित्रों…. यह सतत चिंतन करते रहना चाहिए.. इसलिए कि इसमें लगातार बढ़ोतरी इस योग्यता को स्वीकार करने के बाद आती रहेगी…..
यह अलग बात है की सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बांड की नीतियों के तहत हराम का पैसा एकत्र करने की पारदर्शी कानूनी नीति को रद्द कर दिया गया है । और चंडीगढ़ में नाली-नरदा के चुनाव में यानी नगर निगम के चुनाव में पारदर्शी तरीके से चुनावी भ्रष्टाचार को पकड़कर उसे निर्णय को खारिज कर दिया गया, जिसे वर्तमान लोकतंत्र की सर्वाधिक बड़ी भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष, अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व की योग्यता में चिन्हित कर रहा था। यही दैनिक जनसत्ता में प्रकाशित इस रिपोर्ट की पारदर्शी सच्चाई है तो क्या हम सही दिशा में हैं यह बड़ा प्रश्न चिन्ह है….? और यही वर्तमान का प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् है….।


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