
क्या पुलिस की जांच एजेंसी का भी यही तौर तरीका है उद्देश्य अलग हो सकते हैं ।शहडोल में इसी प्रकार से मध्य प्रदेश की पुलिस भी एक आवश्यक जांच एजेंसी है आमतौर पर माना जाता है कि किसी शिकायत की जांच पर ही पुलिस सक्रिय होती है किंतु जब पुलिस, वकील के साथ मिलकर किसी आपराधिक उद्देश्य पूर्ति के लिए फर्जी मुकदमे करती है तो उसका सहयोग क्यों करना चाहिए और कानून इसकी गारंटी क्यों नहीं दे रहा है की एक भारतीय नागरिक को उसे तात्कालिक तौर पर गिरफ्तार करके अन्याय नहीं किया जाएगा या उसे अपमानित नहीं किया जाएगा..? मैं अपना अनुभव बताता हूं।
—————(त्रिलोकीनाथ)————
दैनिक जनसत्ता ने इस खबर को सेकेंड लीड न्यूज़ बनाया है इसलिए यह खबर है की दिल्ली का मुख्यमंत्री जो भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में काम कर चुके है और भारत के एक अति बौद्धिक समाज से आते हैं। आखिर वह बार-बार केंद्र शासन की अपराधिक जांच एजेंसी, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के बार-बार संमन्न भेजे जाने पर भी क्यों पेश नहीं हो रहे हैं । उन्हें क्यों लगता है की और जिसे वह खुलकर बोलते हैं कि उन्हें केंद्र शासन भारतीय जनता पार्टी ईडी के बहाने गिरफ्तार कर लेगी।
इस पर भी चर्चा करेंगे कि जांच एजेंसियां अगर अपने निहित उद्देश्य से भटक कर लोकतंत्र विरोधी राजनीतिक उद्देश्य पूर्ति के लिए हथियार बन जाएं तो उन्हें क्यों सहयोग नहीं करना चाहिए।
यह प्रश्न खड़ा होता है की क्या पुलिस की जांच एजेंसी का भी यही तौर तरीका है उद्देश्य अलग हो सकते हैं ।शहडोल में इसी प्रकार से मध्य प्रदेश की पुलिस भी एक आवश्यक जांच एजेंसी है आमतौर पर माना जाता है कि किसी शिकायत की जांच पर ही पुलिस सक्रिय होती है किंतु जब पुलिस, वकील के साथ मिलकर किसी आपराधिक उद्देश्य पूर्ति के लिए फर्जी मुकदमे करती है तो उसका सहयोग क्यों करना चाहिए और कानून इसकी गारंटी क्यों नहीं दे रहा है की एक भारतीय नागरिक को उसे तात्कालिक तौर पर गिरफ्तार करके अन्याय नहीं किया जाएगा या उसे अपमानित नहीं किया जाएगा..? मैं अपना अनुभव बताता हूं।
वैसे जाने अनजाने शहडोल की पुलिस आदिवासी विशेष क्षेत्र होने के कारण ज्यादातर नागरिकों के साथ न्याय नहीं कर पाती किंतु भ्रष्ट पुलिस वालों के शामिल होने पर जानबूझकर षड्यंत्र करके फर्जी मुकदमे लगा देना और नागरिकों को परेशान करना यह आम होता जा रहा है।
उदाहरणार्थ अनुभव में जो मेरे आया उसे व्यक्त करना उचित होगा । 12 फरवरी 2022 को शाम के यह खबर आई कि मेरे एक नजदीकी व्यक्ति पर जो कोतवाली शहडोल के बगल में मंदिर से पूजा करके लौट रहे थी उन पर एक आपराधिक प्रवृत्ति की महिला ने गिरोह बनाकर सड़क पर हमला कर दिया। और मारपीट की क्योंकि पूर्व में ऐसा नहीं हुआ और थाना कोतवाली के ठीक बगल में ऐसा नहीं हो सकता यह समझ कर सतर्कता के बावजूद भी महिला पर हमला हो गया। घटना के बाद मैं कोतवाली गया जहां पर पाया कि अपराधिक प्रवृत्ति की हमलावर महिला अपने गिरोह के साथ रिपोर्ट करने के लिए स्वत: बैठी है क्योंकि उसके पीछे रेलवे कॉलोनी में रहने वाला एक तिवारी नाम का वकील पूरे षडयंत्र को अंजाम दे रहा था। वह पुलिस के लिए दलाली करता था इसलिए भ्रष्ट पुलिस ने बेहतरीन तरीके से इस मामले को हैंडल करना चालू किया। यह जानबूझकर कि मैं एक पत्रकार होने के नाते भी उसे ऑब्जर्व कर रहा हूं जिस जांच अधिकारी पुलिस को यह काम सौंपा गया वह भी एक महिला थी पहले तो उसने घटनास्थल पर जाने से आनाकानी की ताकि समय बीतने के साथ साक्ष्य नष्ट हो… जो ठीक कोतवाली के बगल में हुआ था। और जब कुछ घंटे बीत गए तो जिस अंदाज पर उन्होंने साक्ष्य ढूंढने का काम किया उससे शायद ही इस खुले आम वारदात पर कोई बोलने वाला था। क्योंकि आम नागरिक डरपोक होता है और उसे यदि जरा भी शंका हो की भ्रष्ट-पुलिस का संरक्षण इस अपराध हो रहा है तो बहुत साहसी साक्षी ही होता है जो हिम्मत जुटा पाता है…स्वाभाविक है ऐसे में बहुत कम लोग हैं।
चुंकि प्रताड़ित महिला मेरे नजदीक थी और मैं एक पत्रकार था इसलिए घटनाक्रम को कानूनी तौर पर न्याय दिलाने के लिए इस पर साक्षी बना रहा। शाम की घटना के बाद मैं करीब 1:00 बजे रात अपने घर जा सका यानी हर घटना को वॉच कर रहा था और पूरी परिस्थितियों की जानकारी पुलिस को लिखित में दिया भी की क्या-क्या घटा।
किंतु पुलिस महानिरीक्षक, कोतवाली और पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी भी इस पर सही काम नहीं कर पा रहे थे..।
मैंने क्षेत्रीय विधायक का सहारा लिया क्योंकि मुझे भय था कि मुझे पक्षपाती मानकर पुलिस इस पर अन्याय कर रही है। क्षेत्रीय विधायक में संपूर्ण स्थिति को समझने के बाद घटना को गंभीर माना और स्वयं पुलिस अधीक्षक से मिलने गए।
मैं पुलिस अधीक्षक के बाहर कक्षा् में बैठा रहा ताकि विधायक जी इसे निष्पक्ष तरीके से रख सकें और परिस्थिति को समझ सकें क्योंकि मेरे समझने में हो सकता है गलती हो। करीब आधे घंटे बाद तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने मुझे बुलाया और मेरे बैठते ही कहा कि यदि मेरा नाम उन्होंने आवेदन पर नहीं कटा होता तो मैं घर में घुसकर के मारपीट करने के मामले में अपराधी महिला की रिपोर्ट पर आरोपी होता । मुझे आश्चर्य लगा कि उस घटना में मैं कहीं था नहीं तो फिर मैं आरोपी कैसे हो सकता था…?
उन्होंने स्पष्ट किया की घटना उस दिन की नहीं यानी 12 फरवरी की नहीं 14 फरवरी की रात के 10:00 बजे की है जब अपराधी महिला ने पुलिस महानिरीक्षक के पास जाकर अपना शरीर दिखाई और बताया कि उसके साथ मारपीट की गई है साथ में अपने साक्षी के लिए अपने किराएदार उसे हरिजन महिला को ले गई जो 12 तारीख की घटना में अपराधी थी। क्योंकि यही महिला पूर्व में आरोपी महिला के साथ बाजार में भी प्रताड़ित महिला के पति पर हमला कर चुकी थी और उसमें भी साक्षी रही। जिसमें पुलिस ने सफलता से फर्जी मुकदमे पर न सिर्फ मुकदमा चलाया बल्कि न्यायालय को गुमराह करने में सफल रही क्योंकि वकील की योजना के अनुसार सब होता रहा।
बताते चलें इस तरह घटना को समझते हुए निरपेक्ष भाव से अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक शहडोल( एडीजीपी ) ने पुलिस अधीक्षक को मामले में तत्काल एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया किंतु जब पुलिस अधीक्षक के सामने मेरा नाम देखा गया तो उन्होंने चुंकि वे मुझे जानते थे सहज ही पूछ लिया कि क्या मैं उसे घटना में था और षड्यंत्रकारी अपराध करने वाली महिला ने कहा नहीं वह (यानी मैं) पीछे सहयोग करते हैं.., इस तरह मेरा नाम काट दिया गया।
मैं आश्चर्य व्यक्त किया कि जिस वक्त 14 फरवरी की घटना बताई गई मैं तो था नहीं साथ में जो दो अन्य हमलावर बताए गए घर में घुसकर मारने के मामले में, वहां सीसीटीवी लगी है उसे देखा जा सकता है की क्या घटना हुई…? क्योंकि दो अन्य जो पति-पत्नी थे उनके पति अपने मार्केटिंग के सिलसिले में घटना स्थल से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर कार्यरत थे और पत्नी 14 तारीख को करीब 3:00 बजे अस्पताल में अपने हमले से हाई बीपी की शिकार होने के बाद जिला अस्पताल से रिलीज होकर घर पर आराम कर रही थी।
तो सवाल उठता है कि हमला किसने किया…? क्योंकि हमला तो हुआ था और अपराधिक प्रवृत्ति की षड्यंत्रकारी महिला के शरीर पर चोट के निशान थे..? ऐसा पुलिस अधीक्षक ने बताया क्योंकि उन्होंने देखा था। मैंने इसे और गंभीरता से लिया तथा कहा कि तब तो यह गंभीर जांच का विषय है कि आखिर उसे महिला के शरीर पर चोट के निशान किसने बनाए थे…? या उसे घायल किया था…? सिर्फ इसलिए की एक फर्जी मुकदमा बनाया जा सके..
और उसमें कौन-कौन शामिल था इस बात को लेकर मैं एडीजीपी से भी मिला उन्होंने सहज भाव में कहा महिला की रिपोर्ट है इसलिए आप अपने जमानत की तैयारी करिए.. यह उनकी सलाह थी। वह मेरी बातों को नाम मात्र को भी नहीं सुनना चाहते थे जो उसे वक्त की स्पष्ट सच्चाई थी। एडीजीपी का यह भी कहना था कि मामला कोर्ट में आप साबित कीजिए मुझे आश्चर्य लगा की कोई एडीजीपी स्तर का अधिकारी या पुलिस अधीक्षक स्तर का अधिकारी बताए जाने पर और प्रमाणित होने के बावजूद भी उसको सिर्फ इसलिए नहीं सुनना चाहते क्योंकि एक आपराधिक प्रवृत्ति की महिला एक आपराधिक प्रवृत्ति की वकील के साथ मिलकर के एक आपराधिक प्रवृत्ति की साक्षी को लेकर के एक आपराधिक प्रवृत्ति की पुलिस को शामिल करते हुए षड्यंत्र पूर्ण तरीके से अपने शरीर में घाव बनाकर झूठी रिपोर्ट करने पहुंच गई और उसकी जांच करने को पुलिस तैयार नहीं है….?
जबकि सब कुछ साफ-साफ था सीसीटीवी रहा और आरोपी लोग भी बाहर थे किंतु पुलिस ने निश्चय कर लिया था कि वह इस षड्यंत्र पूर्ण बनाए गए फर्जी मुकदमे को कोर्ट में जो लोग बैठे हैं उन्हें उसकी सफाई करने के लिए भेज देगी…? क्योंकि पुलिस की नजर में न्यायपालिका में बेकार लोग बैठते हैं.. न्यायाधीश नहीं…?
कम से कम इस मामले में ऐसा होता दिखा अन्यथा पुलिस इतना पारदर्शी फर्जी मुकदमा बनाने का दुस्साहस नहीं करती।
अब इस घटना की वस्तु स्थिति का अनुमान लगाना चाहिए की एक अपराधी किस्म का महिला जिस पर अपने पति की हत्या सफलतापूर्वक किए जाने का संदेह हो, जो अपने पति के अतिरिक्त अन्य पुरुष से विवाह कर लेती है जिसे मध्यप्रदेश की ही पुलिस अन्य मामलों में रखैल का दर्जा देती हो और ढेर सारे षड्यंत्र करती हो उस महिला को रेलवे कॉलोनी का अपराधिक प्रवृत्ति का एक वकील (जो की गैर कानूनी तरीके से रेलवे की जमीन पर और नजूल की जमीन पर अवैध डबल स्टोरी मकान बनाकर रहता है, जो की कथित तौर पर औद्योगिक क्षेत्र में अतिक्रमण करके एक बड़ी जमीन पर कब्जा कर लिया है) क्योंकि वह वकील का कथित लाइसेंस से ले लिया है इसलिए अधिवक्ता के नकाब में वह पुलिस का बेहतरीन दलाल है.. उसे कुछ भ्रष्ट पुलिस कर्मी मिल जाते हैं और उसकी नियत अपराधिक प्रवृत्ति की महिला के युवा लड़की पर भी है.. क्योंकि उसे मालूम है की ऐसी महिलाओं की संतान इसी प्रकार की उपयोग की जा सकती है.. इसलिए वह तमाम षड्यंत्र रच करके घर में घुसने मारपीट का झूठा प्रकरण तैयार करता है… स्वाभाविक है जब एक भ्रष्ट वकील, एक भ्रष्ट पुलिस षड्यंत्र करके अपराध की रचना कर रहे होते हैं तो कोर्ट में उसे साबित करने में सामान्य नागरिक को बहुत परेशानी जाएगी… और कई मामलों में जज ऐसे षड्यंत्र को अनजाने में पक्के साक्षी होने के कारण निर्दोष को दंडित भी कर देते हैं…. क्योंकि ऐसे ही मामले में एक निर्णय शहडोल के न्यायालय ने कर दिया था। जिससे इस अपराधी के संरचना का षड्यंत्र करने वाले गिरोह का मनोबल काफी ऊंचा है।
इससे कानून का राज क्षतिग्रस्त होता है इन सबको मॉनिटरिंग करने के लिए जो पुलिस अधीक्षक स्तर के जो भारतीय पुलिस सेवा के जरिए अति बौद्धिक होने के कारण कानून बनाए रखने के लिए रखे गए हैं वह भी ऐसे पारदर्शी षड्यंत्र को अनजाने में जब साथ दे रहे होते हैं.. तब पुलिस पर भरोसा क्यों किया जाना चाहिए…?यह प्रश्न भी उठता है।
यह आदिवासी विशेष क्षेत्र की घटना है जहां आमतौर पर ऐसा होता है क्योंकि पुलिस सेवा में भ्रष्टाचार पर विश्वास रखने वाले तमाम अधिकारी और सिपाहियों का यही रोजी-रोटी होती है.. जबकि हमारा लोकतंत्र उन्हें पर्याप्त वेतन जीने खाने के लिए देता है।
इस घटना में तमाम कोशिशें के बावजूद भी मैंने पाया कि मेरा नाम तो इसलिए कट गया क्योंकि पुलिस अधीक्षक ने वह प्रश्न उस अपराधी महिला से कर डाला.. की क्या मैं वहां था..? अगर वह नहीं करते तो शायद मैं भी न्यायपालिका के सामने अपनी जमानत कर रहा होता… जैसे कि फर्जी मुकदमे में अन्य मेरे नजदीकी को अपनी जमानत करना पड़ा.. जिसमें यह बात तो स्पष्ट है की पुलिस की जो जांच कर्ता महिला अधिकारी थी उसने अपराधिक प्रवृत्ति के साक्षी को एकत्र किया, जो अक्सर पुलिस के कई प्रकरण में गवाह बनने के लिए दलाल का काम करते हैं यह भी अलग बात है कि ऐसे दलाल की जांच के लिए जो भी आवेदन पुलिस के पास हैं वह सब ठंडे बस्ते में पड़े हुए हैं। क्योंकि हर थाने में ऐसे झूठ में कदमों के लिए कई स्थाई दलाल रखे हुए हैं जिन्हें पुलिस के प्रकरणों में कई बार उन्हें उपयोग किया जाता है यह सब प्रमाणित दस्तावेज है इसके बावजूद भी पुलिस उच्च अधिकारी इस पर कभी कोई कार्रवाई करते नहीं दिखाई देते कि आखिर एक ही गवाह कैसे ढेर सारे प्रकरणों में गवाही देने के लिए क्यों खड़ा हो जाता है पुलिस की ओर से…?
इसका सामान्य सा आशय यह है कि जब आदिवासी क्षेत्रों में इस प्रकार से आपराधिक षडयंत्रों को पारदर्शी तरीके से किया जा रहा है तो दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर बैठा हुआ एक अति बौद्धिक नागरिक, यदि षड्यंत्र पूर्ण तरीके से परिवर्तन निदेशालय ईडी के प्रकरणों पर उनके बुलाए जाने पर उपस्थित नहीं हो रहे हैं तो वह उनके कानूनी हक होगा, वह ठीक कर रहे हैं… जैसा कि उन्होंने कहा भी की प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अब अपने सम्मन के पालन हेतु न्यायपालिका से सहयोग ली है तो अगर न्यायपालिका कहेगी तब मैं संबंध पर उपस्थित होऊंगा।
यह बात उच्च स्तर की प्रशासनिक सेवा में रह चुका अरविंद केजरीवाल जो मुख्यमंत्री दिल्ली का है इसलिए कह पा रहा है क्योंकि उसके पीछे उसके चाहने वाले नागरिकों की पूरी फौज है। और जाने अनजाने उनके शंका अनुसार ईडी अगर उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र से गिरफ्तार करती है तो वह राजनीतिक फायदा उठाने के लिए सक्षम होंगे।
भारत के हर नागरिक के पीछे कोई फौज नहीं होती है वह सामान्य नागरिक होता है और अपराधी प्रवृत्ति के कुछ भ्रष्ट पुलिस आपराधिक प्रवृत्ति का वकील और अपराध जगत के तमाम सिद्ध अपराधी यदि एक साथ मिल जाए तो नागरिकों की दुर्दशा होनी तय है..
इसमें कोई प्रश्न नहीं खड़ा होता, इसलिए क्योंकि नागरिक समाज अरविंद केजरीवाल की तरह अपने समाज को कनेक्ट नहीं कर पाया है इसलिए भी अरविंद केजरीवाल ने सातवीं बार भी ईडी के सम्मन को अगर अवैध का कर नजरअंदाज किया है तो वह उनका नागरिक हक है। यह दुर्भाग्य है यह नागरिक हक आम नागरिक को नहीं मिल रहा है। वह अपराधी चरित्र के पुलिस, वकील और आपराधिक प्रवृत्ति के नागरिकों के बने षड्यंत्र में फंस जाता है और यही हमारे तथाकथित अमृतकाल तक पहुंची देश की आजादी का सबसे बड़ा पाप है.. इसमें अति बौद्धिक समाज जो भारतीय प्रशासनिक सेवा स्तर से चयनित हो अथवा उस स्तर का ज्ञान रखते हो वही लड़ने में सक्षम होते हैं. अन्यथा पारदर्शी भ्रष्टाचार सफलता के साथ विधायिका का गुलामी होने पर गर्व करता रहता है।

