
गली-गली में शोर है, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया …… है
भारतीय बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया गर्व से नाम लिए जाने वाला संस्थान है किंतु लगता है अब इस पर ग्रहण लग चुके हैं उसकी अमूल्य साख जनता के बीच में विश्वसनीय के साथ बनी रही किंतु राजनीति के चलते वह अब जिले की एक सहकारी संस्था यह सहकारी बैंक से ज्यादा उसकी हैसियत नहीं दिख रही है क्योंकि उसके अधिकारी बेईमानी पर उतारू है और उनकी यह बेईमानी बेहद पारदर्शी तरीके से लोकतंत्र में दिखाई देने लगी है इतना बड़ा जोखिम कैसे कोई वित्तीय संस्था उठा सकती है इससे लगता है कि भारत सचमुच बदल रहा है और “गली-गली में शोर है, स्टेट बैंक आफ इंडिया बहुजोर है।”
आधुनिक राजनीतिक परिस्थिति में हालांकि भारत के मीडिया संस्थान जो हंगामा दिखाने और फैलाने में विश्वास रखते हैं वह इन खबरों को ज्यादा महत्व नहीं देते किंतु कुछ राष्ट्रीय अखबार शायद अभी भी भारतीय पत्रकारिता को प्रति गंभीर हैं और वह गए बगाहे इस दिशा में अपने दायित्व का वहन करते रहते हैं जो देश की लाखों कुर्बानी के बाद ए आजादी की विरासत है संक्षेप में बता दें की स्थानीय सहकारी बैंक घटिया राजनीतिक वातावरण में ज्यादातर चोर और बदमाश टाइप की लगने वाली संस्थान दिखने लगी हैं क्योंकि अक्सर उसमें घोटाले होते रहते हैं वह जानकारी को छुपाती है और छुट भैया राजनिति के दबाव में भी अक्सर अपनी साख को गवांती रहती है समय-समय पर सहकारी संस्था की पंजीयन इस पर अपना निर्णय भी देते रहते हैं कि किस प्रकार से घोटाले दर घोटाले सहकारी संस्थाओं की पहचान बन गई है किंतु अब यही पहचान स्टेट बैंक आफ इंडिया की राष्ट्रीय स्तर पर दिखने लगी है कि वह असंवैधानिक तौर पर बनाए गए चुनाव बांड की बिक्री की मामले की पूरी सूचनाओं एक राष्ट्रीय पार्टी के हित में छुपा रही है तो लिए देखें आज अखबार क्या लिखता है हमने इसमें कोई बदलाव नहीं किया है सिर्फ इसे सर्वजन हितार्थ सामने ला रहे हैं ताकि नागरिक समाज समझ सके की गंभीर और बैंक संस्थानों में बैठे उच्च स्तर के लोग कितने घटिया स्तर पर इस देश की ताना-बाना को नष्ट करना चाहते हैं
नई दिल्ली प्रकाशित दैनिक जनसत्ता 7 मार्च को इस पर अपनी प्रथम लीड बनाया वह विस्तार से रिपोर्टिंग करता है कि
राजनीतिक दलों द्वारा भुनाए गए प्रत्येकचुनावी बांड के विवरण का खुलासा करने केलिए 30 जून तक का समय मांगने के भारतीयस्टेट बैंक (एसबीआई) के आवेदन कोचुनौती देते हुए दो एनजीओ ने गुरुवार को उच्चतम न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह याचिका को सूचीबद्ध करने के आग्रह पर विचार के लिए राजी है। कृपया ईमेल भेजें।
प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने एनजीओ’एसोसिएशनफार डेमोक्रेटिक रिफाम्स’ (एडीआर) की ओर से अदालत में पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने एनजीओ ‘एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) की और से अदालत में पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण की अवमानना कार्यवाही शुरू करने संबंधी दलीलों पर संज्ञान लिया। की अवमानना कार्यवाही शुरू करने संबंधी दलीलों पर संज्ञान लिया। भूषण ने कहा कि एसबीआई की याचिका 11 मार्च को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है और अवमानना याचिका पर भी साथ में सुनवाई होनी चाहिए। इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘कृपया एक ईमेल भेजिए। मैं आदेश जारी करूंगा।
याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि ‘जानबूझकर और मंशा’ के साथ शीर्ष अदालत के छह मार्च तक चुनावी बांड के जरिए राजनीतिक दलोंको मिले चंदे की विस्तृत जानकारी निर्वाचनआयोग को मुहैया कराने के निर्देशों कीअवज्ञा की गई।
दो एनजीओ द्वारा दायर याचिका में दावाकिया कि एसबीआइ ने जानबूझकर आखिरीक्षण में अर्जी दाखिल कर दलों द्वारा चुनावी चांड भुनाने की जानकारी देने के लिए 30 जून तक का समय मांगा ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि दानकर्ताओं और उनकी ओर से दान दी गई राशि की जानकारी आगामी लोकसभा चुनाव से पहले सार्वजनिक नहीं हो।
एसबीआइ ने चार मार्च को शीर्ष अदालत से अनुरोध किया था कि चुनावी बांड का ब्योरादेने के लिए समय 30 जून तक बढ़ाया जाए।शीर्ष अदालत की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 15 फरवरी को दिए अपने एक फैसले में अज्ञात राजनीतिक वित्तपोषण के लिए केंद्र द्वारा शुरू चुनावी बांड योजना रद्द कर दी थी और इसे ‘असंवैधानिक करार दिया था। न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को 13 मार्च तक दानदाताओं, उनके द्वारा दान की गई राशि और प्राप्तकर्ताओं का खुलासा करने का आदेश दिया था। चुनावी बांड योजना को तुरंत बंद करने का आदेश देते हुए शीर्ष अदालत ने इसके लिए अधिकृत वित्तीय संस्थान एसबीआइ को 12 अप्रैल, 2019 से अब तक खरीदे गए चुनावी बांड का विवरण छह मार्च तक निर्वाचन आयोग (ईसी) को सौंपने का निर्देश दिया था। साथ ही कहा था कि 13 मार्च तक निर्वाचन आयोग इसे अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सूचना प्रकाशित करेगा
अवमानना याचिका में गैर सरकारी संगठनों ने कहा कि जानकारी देने की तय समय सीमा सेमहज दोदिन पहल एसबीआइ ने याचिका दायर कर आदेश के अनुपालन के लिए 30 जून तक समय देने का अनुरोध किया। याचिका में कहा गया, ‘उक्त आवेदन दुर्भावनापूर्ण है और इस अदालत की संविधान पीठ द्वारा पारित फैसले की जानबूझकर और मंशा के साथ अवज्ञा को प्रदर्शित करता है। यह इस न्यायालय के अधिकार को कमजोर करने का एक स्पष्ट प्रयास है।
याचिका में कहा गया कि भारतीय स्टेट बैंक के पास प्रत्येक चुनावी बांड के लिए विशेष संख्या है और खरीददार की अपने ग्राहक को जाने (केवाईसी) के तहत जानकारी है। इस प्रकार चुनावी बांड का ‘पूरी तरह से पता’ साबित होता है कि एसबीआइ बांड खरीदने लगाया जा सकता है और यह तथ्य इससे भी आधारित रिकार्ड रखती है।
याचिका में कहा गया है कि सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार केवल 30 चरणों में चुनावी बांड की बिक्री हुई है और 29 अधिकृत भारतीय स्टेट बैंक की शाखाओं में से केवल 19 ने इन बांड की बिक्री की है जबकि केवल 14 शाखाओं में इन्हें भुनाया गया है। इसके अलावा इसमें ये भी कहा गया, कि जनवरी 2024 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक केवल 25 राजनीतिक दलों ने अपना खाता खुलवाया है और चुनावी बांड भुनाने के लिए अहंता रखते हैं। ऐसे में
इन जानकारियों को संकलित करने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए क्योंकि पहले ही एक प्रणाली मौजूद है।

