
शहडोल में दो युवक, दो युवतियों की लाशें फिर निकली है और यह अंतिम लाशें है नहीं कहीं जा सकती सोन नदी के मामले में कई अनुभव आए हैं इसके बावजूद भी यहां का शासन और प्रशासन इस मामले में पुरुषार्थहीन हैं रहा। वह बेहद पिछड़ा रहा और उसकी कोई सोच नहीं रही, कह सकते हैं अनपढ़ रहा है। उसने सोन नदी को पढ़ा लिखा नहीं समझा नहीं… और ना ही समझना चाहता है क्योंकि उसे लोकगीत से जनहित से कोई लेना देना नहीं वह दुर्घटनाओं में लाशों को समेटने में अपनी सफलता समझता है अन्यथा अभी तक इसका कोई ना कोई निदान निकल आता । सरकारी आंखों को बताने वाला सांख्यिकी विभाग लगभग मरा हुआ है इसलिए यह जानकारी मिल पाना कि अब तक कितनी लाशें कहां-कहां से मिली संभव ही नहीं…
जब से मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज अथवा आधुनिक विकास हुआ है तब से शहडोल की नदी नालों में पहाड़ों में और ढेर सारी ऐसी रोमांचक स्थान में जाने का ट्रेंड बन गया है वहां पर सुरक्षा की जिम्मेदारी वास्तव में अनुभव होने के बाद प्रशासन की ही है. जिसे हमारा शासन या स्थानीय राजनेता उसे नियंत्रित करते हैं जिसमें स्थानीय अनुभवी लोगों की जानकारी के बिना उसे सुरक्षित किया करना या उसे खतरनाक कर बताना संभव नहीं लेकिन इस दिशा में कोई काम कभी नहीं हुआ और यह मामला सिर्फ युवक और युवतियों की हत्याओं या लाशों से नहीं जुड़ा है बल्कि रोजगार परक स्मगलिंग और कालाबाजारी से भी जुड़ा है जिसमें जबरदस्त जोखिम होती हैकिंतु अलग-अलग तरह से लोग ऐसे खतरनाक स्थान पर पहुंचकर अपने सुख की तलाश करते हैं कुछ लोगों को रोजगार का सुख होता है और कुछ लोगों को काला बाजार का सुख किंतु प्रशासन इनकी समीक्षा करने में कोई रुचि कभी रखता हुआ नहीं दिखाई दिया हम 21वीं सदी के एक चौथाई भाग में पहुंच गए हैं लेकिन शायद 20वीं सदी की चौथाई भाग की जीवन को भी नहीं छुए हैं । ऐसी घटनाएं हमें नए आधुनिक जंगल के होने का प्रमाण देता है
उम्मीद करना चाहिए शहडोल जैसे अरबाज आदिवासी विशेष क्षेत्र में यहां प्राकृतिक सौंदर्य अपने चरम पर रहा है उसे उसकी संवेदनाओं के साथ रहने देना चाहिए और उसकी संवेदना की पहचान भी करनी चाहिए ताकि इस प्रकार की दुर्घटनाएं हमारे लिए दुख का कारण ना बने और परिवार के लिए प्राकृतिक प्रहार टूटने जैसा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति भी ना बने देखते हैं नए प्रशासन है शायद कुछ सो सके फिलहाल तो अनुभव में कुछ नहीं आया यही कड़वी सच्चाई है।

