हंस चुनेगा का दाना-चुनगा, कौवा मोती खायेगा…. ( त्रिलोकीनाथ)

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  हो सकता है वह वृद्ध है लालकृष्ण आडवाणी जी को खड़े होने में शारीरिक रूप से कोई समस्या हो, लेकिन यह समस्या है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तो फिल्हाल होती दिखाई नहीं देती फिर भी फोटो ऐसी है कि तकलीफ देती ही है, जो गलत भी है तकलीफ नहीं होना चाहिए.बहुत दिन बाद देर से सही भारत के विपक्षियों ने एकजुटता के साथ नई दिल्ली के रामलीला मैदान में वह सब कुछ दिखाया जो लोकतंत्र का विपक्ष को दिखाना चाहिए। इसके साथ ही भविष्य के लोकतंत्र की झलक भी चुनाव आचार संहिता के दौरान देखी गई, जिसमें तथाकथित राम-राज्य को लाने के लिए रथ यात्रा पर सवार हो निकले पहली बार लोकतंत्र में सांप्रदायिकता या कहना चाहिए उनके राष्ट्रीयता का उन्माद और गर्व भरने वाले बीत चुके लोह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न देने के नाम पर एक और इवेंट को को साझा किया गया।
जिसमें “…हंस चुनेगा दाना-चुनगा, कौवा मोती खायेगा।” इस वाक्यांश का क्रियान्वयन होता दिखा कि अगर आने वाले समय में जैसा की दावा किया गया है भाजपा भारी बहुमत के साथ आ रही है अगर आती है तो हमारा लोकतंत्र की झलक क्या होगी..

————————( त्रिलोकीनाथ)————————–
संविधान और कानून की मर्यादाओं का किस प्रकार से उपहास किया जाएगा हालांकि वह वाक्यांश राम राज्य की कल्पना के दौरान ही भक्ति-काल में लिखा गया था, किंतु भारत में संविधान लागू होने के बाद उसका क्रियान्वयन कैसा होगा राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की उपस्थिति में लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न दिया गया, इसमें कोई किसी मर्यादा का टूटना शायद अतिवादी सोच का हिस्सा होगा किंतु संविधान की मर्यादाओं पर टूटना यह अवश्य देखा गया। हो सकता है इसके पीछे दलित वर्ग की राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू को उच्च पद पर बैठकर उसका अपमान करना उद्देश्य ना रहा हो.., लेकिन हुआ तो यही …।
यह भी कहना पूरी तरह से मूर्खतापूर्ण गुलामी होगी कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मर्यादाओं और नैतिकता का ज्ञान नहीं है हमने देखा है उन्होंने हर बार, हर उस पल को जिया भी है जिसमें जब भी उनके पुराने मित्र दिखने वाले गुजराती साथी गृहमंत्री अमित शाह मिलते हैं हर बार उतनी ही नैतिकता सज्जनता मर्यादाओं के साथ मिलते हैं जितने की पहली बार कोई व्यक्ति किसी से मिल रहा होता। उतने ही दूरी बनाकर रखते हैं, उतनी ही सभ्यता से खड़े होकर उन्हें अभिवादन करते हैं। यानी हर पल, मर्यादाओं के साथ, हर बार मिलते हैं… इस पढ़ाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ना पढ़ा हो…., बार-बार पढ़ाये जाने के बाद भी, उन्हें याद ना हुआ हो… यह कहना बिल्कुल गलत होगा; तो क्या वह दिखाने का दांत है…? जिसका वास्तव में स्क्रिप्ट में नकल करना होता है..
ऐसा लिखा जाता है क्योंकि संविधान में सर्वोच्च सत्ता में चाहे वह दलित वर्ग से आदिवासी जनजाति समाज की महिला राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू ही क्यों ना हो.. उस पद पर बैठी हैं..जिन्हें सोते वक्त यह खबर दी गई थी कि उन्हें राष्ट्रपति का चुनाव लड़ाया जा रहा है …।,बावजूद इसके वह देश की राष्ट्रपति हैं। और हमारी प्रथम नागरिक भी और धोखे से यह आदत भी आजादी के बाद संवैधानिक तौर पर हमारे अंदर डाली गई है कि जब भी राष्ट्रपति कहीं खड़ी होती हैं तो बाकी लोग वहां खड़े ही रहते हैं, उनका सम्मान दिखाने वाला अवश्य होना चाहिए।
किंतु जो फोटो सार्वजनिक रूप में प्रदर्शित की गई है यह गलती होगी यह सोचना भी शायद गलत होगा…. ऐसी फोटो भविष्य में अन्य क्षेत्रों में अलग-अलग संस्थाओं के पदाधिकारी के साथ आम होगी…. यही भविष्य का लोकतंत्र की झलक होगी। शायद उसी की यह झलक चुनाव आजाद संहिता के दौरान प्रदर्शित किया जा रहा है इसमें कोई शक नहीं और हमें ऐसे लोकतंत्र को स्वीकार करना होगा, यही हमारे मनोविज्ञान में डाल भी जा रहा है। ताकि भारत की जनता यह जान ले कि भविष्य में आपको इसी प्रकार से जीने की आदत डालने चाहिए। इसे गुलामी कहना शीर्ष पद में बैठे व्यक्तियों की आचार संहिता का अपमान होगा… क्योंकि अभी तक घोषित तौर में गुलामी को गर्व करने का विषयवस्तु के रूप में प्रदर्शित करने की आदत नहीं बनाई गई है।
ऐसे में विपक्षी पार्टियों क्या बोलते हैं क्या कहती हैं… उससे क्या फर्क पड़ता है…? राहुल गांधी आग लगाए जाने की बात करते हैं उसे क्या फर्क पड़ता है… आखिर कांग्रेस पार्टी में अपने समर्थकों के साथ लंबे समय तक इस देश में शासन चलाया है और सामने जो लोकतंत्र का उत्पादन दिख रहा है वह उसी का पुण्य है… ऐसा क्यों नहीं स्वीकारना चाहिए..? अब चिल्लाते रहने से क्या कुछ हासिल होने वाला है…? भारतीय जनता जनार्दन का मनोबल कितना ऊपर उठने वाला है यह चुनाव के नतीजे के बाद दिखाई देगा फिलहाल उन नतीजे की घोषणा की कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने स्पष्ट तौर पर अपनी आशंका में कर दी है कि “चुनाव का मैच-फिक्स किया जा रहा उसके अलग-अलग  भी उन्होंने उदाहरण स्वरूप दिए हैं यह युवा नेता की सार्वजनिक स्वीकृति भी कहीं जा सकती है अगर जनता जनार्दन तक यह बात नहीं पहुंचती है तो और फिक्स मैच में जीतना किसको है… यह भी फिक्स होता है… यानी लोकतंत्र को जाना ही होगा…!
और नई स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए सामंती सोच के मानसिकता वाली पार्टी को अपने चरम में भी पहुंचना ही होगा…. यही इस चुनाव का मनोरंजन पूर्ण संघर्ष भी है …. यही लोकतंत्र का अवसाद भी होगा, यही कल रामलीला मैदान में सभी विपक्षी पार्टियों ने अपने-अपने अंदाज में देश में तानाशाही थोपी जा रही है इसकी घोषणा कर रहे थे। अघोषित इमरजेंसी लगाई गई है कहां जा रहा था।
ऐसे में “….हंस चुनेगा दाना-चुनगा, कौवा मोती खायेगा…” उसका ट्रेलर भी लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति द्वारा खड़े होकर भारत रत्न देते हुए दिखाया गया है जहां प्रधानमंत्री बगल की कुर्सी में बैठकर ताली बजा रहे हैं….. और राष्ट्रपति गुलाम की तरह आज्ञा का पालन कर रहे हैं… यही भविष्य का लोकतंत्र है.. इसमें आखिर क्यों बुराई देखना चाहिए…..?


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