
पिछले दिनों मध्य प्रदेश में एक महिला अधिकारी ने यह कहकर के कन्यादान का विवाह मेंउपयोगिता को खारिज किया था कि वह स्वयं कोई वस्तु नहीं हैजिसकादान उसका पति कोउसके पिता द्वारा किया जाएऔर इस तरहउसने कहा कि मैं अपने पिता से कन्यादान नहीं कर आऊंगी वह महिला अधिकारीकी का विवाह अंतर्जातीयवर्ग के एक पुरुष से हो रहा था.इस तरह देश की आजादी मेंके बाद यहहिंदू विवाह पद्धति में अनिवार्य इमोशनलउत्सवविवाह में कन्यादान का कार्यक्रम कोप्रगतिशील समाज के साथ अब उच्च न्यायालय ने कहा कि हिंदू विवाहअधिनियम में शादी के लिए कन्यादान काप्रावधान नहीं है।इसकी जगह उच्च न्यायालय नेसप्तपदीको कानूनीअवैध प्रक्रिया माना हैहिंदू रीति रिवाज मेंअक्सर यह देखा गया है कि कन्या दान विवाह का आवश्यक हिस्सा है क्योंकिकन्या पक्षवर पक्ष कोमंडप के अंदरकोवर्गको दूल्हे कोविष्णुदेव स्वरूप देखा है औरअपनी लड़की कोलक्ष्मी के रूप मेंदूल्हे को दान करता हैऔर यह अत्यंत मार्मिक उत्सव के रूप में एक आवश्यकपारंपरिक व्यवस्थाचली आई थी तो देखते हैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस बारे में इसे किस प्रकार से व्याख्या दिया है.तो एक सवाल यह बनता ही हैकी फिर राज्य सरकार “कन्यादान योजना” नाम की योजनाओं को क्यों बढ़ावा दे रहे हैं….?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने हाल ही में कहा कि हिंदू विवाहअधिनियम के तहत हिंदू शादियों के लिए कन्यादान जरूरी नहीं है। अदालत ने कहा कि केवल सप्तपदी ही हिंदू विवाह का एकआवश्यक समारोह है और हिंदू विवाहअधिनियम में शादी के लिए कन्यादान काप्रावधान नहीं है।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने गत22 मार्च को आशुतोष यादव द्वारा दायर एकपुनरीक्षण याचिका की सुनवाई के दौरान यहटिप्पणी की। अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियमकी धारा सात का भी जिक्र किया। अदालत नेकहा, ह्यहिंदू विवाह अधिनियम की धारा सात स प्रकार है- हिंदू विवाह के लिए समारोह-(1) एक हिंदू विवाह किसी भी पक्ष के प्रथागतसंस्कारों और समारोहों के अनुसार मनाया जासकता है। (2) ऐसे संस्कारों और समारोहों मेंसप्तपदी (यानी दूल्हा और दुल्हन द्वारा पवित्रइलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, केवलसप्तपदी ही हिंदू विवाह का एक आवश्यकसमारोह है और हिंदू विवाह अधिनियम मेंशादी के लिए कन्यादान का प्रावधान नहीं है।अग्नि के समक्ष संयुक्त रूप से सात फेरे लेना)शामिल है। सातवां फेरा लेने पर विवाह पूर्णऔर बाध्यकारी हो जाता है।न्यायालय ने कहा, इस तरह हिंदू विवाहअधिनियम केवल सप्तपदी को हिंदू विवाह केएक आवश्यक समारोह के रूप में मान्यताप्रदान करता है। वह हिंदू विवाह के अनुष्ठान केलिए कन्यादान को आवश्यक नहीं बताता है।
अदालत ने कहा कि कन्यादान का समारोहकिया गया था या नहीं यह मामले के न्यायोचितनिर्णय के लिए जरूरी नहीं होगा और इसलिएइस तथ्य को साबित करने के लिए अपराधप्रक्रिया संहिता की धारा 311 के तहत गवाहोंको नहीं बुलाया जा सकता। पुनरीक्षण याचिकादाखिल करने वाले ने इसी साल छह मार्च कोअपर सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक अदालतप्रथम) द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी थी।इस आदेश में अदालत में मामले की सुनवाईके दौरान दो गवाहों के पुनर्परीक्षण के लिए उन्हेंबुलाने से इनकार कर दिया था। न्यायालय ने Cमुकदमे की कार्यवाही के दौरान अभियोजनपक्ष के दो गवाहों को फिर से गवाही के लिएबुलाने से इनकार कर दिया था। पुनरीक्षण -आवेदन भरते समय यह तर्क दिया गया किअभियोजन पक्ष के गवाह नंबर एक और उसकेपिता जो अभियोजन पक्ष के गवाह नंबर दो थे,के बयानों में विरोधाभास था और इस तरहउनकी फिर से गवाही जरूरी थी।अदालत के सामने यह बात भी आई किअभियोजन पक्ष ने कहा था कि वर्तमान विवादमें जोड़े के विवाह के लिए कन्यादान आवश्यकथा। ऐसे में अदालत ने समग्र परिस्थितियों परविचार करते हुए कहा कि हिंदू विवाह केअनुष्ठान के लिए कन्यादान आवश्यक नहीं है।पीठ को अभियोजन पक्ष के गवाह संख्या एकऔर उसके पिता की फिर से गवाही कीअनुमति देने का कोई पर्याप्त कारण नहीं मिलाऔर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।(SABHARजनसत्ता)

