
मेरे दिल में इस बात का मलाल रहा कि मैंने अपने क्षेत्रीय तत्कालीन विधायकजी को प्रमाणित कराया की किस प्रकार से थाना कोतवाली शहडोल में तत्कालीन थाना प्रमुख की लापरवाही अथवा जानबूझकर हो रही गलती के कारण कोई परिवार की ऊपर पूरी तरह से षड़यंत्र पूर्ण तरीके से और फर्जी एक अपराधिक मानसिकता वाले वकील के साथ मिल कर पुलिस और अपराधी ने घर में घुसकर हमला यानी 452 का झूठा प्रकरण दर्ज किया है । जो कि उस थाने में अराजकता का प्रमाण है और इस अराजकता को कैसे नियंत्रित करना चाहिए….?
——————(त्रिलोकी नाथ)——————
तब पत्रकार वार्ता में उन्हीं उपस्थित विधायक के समक्ष ही भाजपा के युवा जिलाध्यक्ष फुल-मैच्योर नेता की तरह जवाब दे रहे थे कि “उन्हें तो नहीं लगता कि कोई अराजकता है..?”
और पुलिस के भ्रष्टाचार और अपराधिक मानसिकता को सार्वजनिक तौर पर प्रोत्साहित कर रहे थे। इस निर्भीक सा राजनीतिक अराजकता में एक युवा नेता की हरकत देखकर मुझे स्वीकार करना पड़ा भाजपा की राजनीति और संस्कृति में ऐसा होता ही है और थोड़ा मलाल भी हुआ कि किस प्रकार के लोग राजनीतिक दायित्व मे लाद दिए गए हैं….?
भाजपा की 20 साल की सत्ता की राजनीति में ना सिर्फ पुलिस की अराजकता बल्कि इन धूर्त नेताओं के या कहना चाहिए नासमझ नेताओं के कारण एक पूरी तरह से आपराधिक गढ़ा गया, झूठा मुकदमा एक परिवार न्यायालय में लड़ने के लिए बाध्य हुआ।
तब कमलप्रताप लगा होगा “मोगेंबो खुश हुआ…”क्योंकि तब मोगैंबो के अहम की तृप्ति हो रही थी…
आज समाचार आया की भ्रष्टाचार को समर्पित सार्वभौमिक संस्था यातायात विभाग यानी आरटीओ का कोई एक महान कर्मचारी रविंद्र सिंह अपनी कर्तव्य निष्ठा से जब सामान्य शिष्टाचार की भाषा में इसी कमल प्रताप को यह कहा कि ” ..भाजपा जिलाअध्यक्ष हो कोई राष्ट्रपति नहीं…?” तो ऐसा लगा जैसे एक बार फिर से “मोगैंबो खुश हुआ…” का क्षण दोहराया जा रहा था।
यह अलग बात है कि इस बार में मोगैंबो कमल का नहीं था …….तो पहले घटना को समझ लीजिए की हुआ क्या था स्थानीय समाचार पत्रिका के अनुसार-
“ शहर से सटे छतवई गांव में वाहन चैकिंग के बाद भाजपा जिलाध्यक्ष व आरटीओ उड़नदस्ता टीम के बीच का कथित आडियो सोशल मीडिया में जमकर वायरल हो रहा है। यह ऑडियो भाजपा जिलाध्यक्ष व वाहन चैकिंग में लगे कथित आरटीओ उड़नदस्ताकर्मी के बीच हुई तीखी बहस का बताया जा रहा है। इस ऑडियो में भूसा लोड वाहन को पकड़ने को लेकर दोनों के बीच बातचीत होनेकी बात सामने आई है। कथित ऑडियों में अपने आप को भाजपा जिलाध्यक्ष बताते हुए वाहन पकड़ने वाले से बात कराने की बात कही जा रही है। इसके बाद संबंधित आरटीओ कर्मी को अपना परिचय दिया लेकिन वह उन्हे जानने से इनकार कर दिया। भूसा लोड वाहन के चलान को लेकर बात शुरू हुई और धीरे-धीरे बहस शुरू हो गईऔर बात एक दूसरे को देख लेने तक पहुंच गई।कथित आडियो में आरटीओ कर्मचारी द्वारा कहां ज रहा है कि आप जिलाध्यक्ष बन गए तो क्या राष्ट्रपति बन गए। इतने में जिलाध्यक्ष मौके पर आने की बात कहते हैं तो कर्मचारी द्वारा कहा जाता है कि आओ यहां सारी जिलाध्यक्षी निकाल दूंगा। कथित आडियो में कर्मचारी अपना नाम रवीन्द्र सिंह बता रहा है।
बताया जा रहा है कि वाहन किसी भाजपा पदाधिकारी का था। भाजपा जिलाध्यक्ष व आरटीओ कर्मी के बीच हुई तीखी बहस वाले ऑडियो की सत्यता तो जांच के बाद ही पता चल पाएगी। भाजपा जिला अध्यक्ष कमलप्रताप सिंह का कहना है कि किसानों के वाहनों को रोककर परेशान किया जा रहा है। रेल गिट्टी का अवैध परिवहन हो रहा है। उस पर कार्रवाई नहीं कर रहे हैं किसानों के साथ इस तरह होने पर मुझे बात करनी पड़ती है। लोग हमसे न्याय की उम्मीद करते हैं।”
इसी प्रकार की न्याय की उम्मीद में लोकतंत्र के पारदर्शी स्तंभ पत्रकार-वार्ता में जब मैं कमल प्रताप से पुलिस की अराजकता की बात की थी तब उन्होंने कहा था उन्हें तो नहीं दिखता… आज एक नागरिक होने के नाते हमें भी लगता है कि सच में आरटीओ का कर्तव्य निष्ठ कर्मचारी रविंद्र सिंह ठीक कह रहा था, कि जिलाअध्यक्ष हो कोई राष्ट्रपति नहीं…?
तो इसमें उत्तेजित हो जाने वाली बात कहां से आ गई..?
अच्छा हुआ की कमल प्रताप 20 साल की भाजपा की सत्ता वाली पार्टी में संस्कार को समझते थे और चरित्र को जानते थे इसलिए वह मौकाआए वारदात पर नहीं गए अन्यथा परिस्थितियों रविंद्र सिंह के लिए प्रमाणित करने वाली हो जाती कि सच में सच में वह राष्ट्रपति नहीं है । और एक पूरी तरह से झूठा मुकदमा कमल प्रताप के खिलाफ लग जाता। क्योंकि चुनाव आचार संहिता लगा है और रविंद्र वर्तमान में अपने दायित्व का सर्वोच्च कार्य का निर्वहन कर रहा था। और यह सच्चाई कमल प्रताप भी जानते ही थे क्योंकि यही चाल चरित्र और चेहरा वर्तमान लोकतंत्र का कड़वा सच है। जैसे तब कमल प्रताप पुलिस की अराजकता को छुपाने के लिए झूठे मुकदमे को रचे जाने की प्रक्रिया को नजर अंदाज कर रहे थे..
दरअसल होता यह है की गंभीर पदों पर गंभीर लोग कभी-कभी बैठते हैं क्योंकि विशेष कर राजनीतिक पार्टियों में नेता गुलाम पसंद हो गए हैं। उन्हें,उनका अपना गुलाम जो कहता है उसे सच माना जाता है।
यही कारण भी है कि देश में इतना बड़े कांग्रेस का नेता राहुल गांधी शहडोल में एक रात रुके लेकिन उनकी उपयोगिता निरर्थक साबित रही, अगर वह खुद का महुआ बिनने वालों से उमरिया जाते वक्त बात नहीं करते या महुआ नहीं उठाकर खाते तो उन्हें कोई जान भी नहीं पता कि राहुल गांधी रात को रुके थे। क्योंकि अखबार में छपने से कुछ नहीं होता। क्योंकि उनके इर्द-गिर्द नेताओं ने आदिवासी क्षेत्र में उनके अचानक रुक जाने की प्रक्रिया को स्थानीय लोगों की उपयोगिता की नजर में शून्य रखा…. जैसे कोई ब्यूरोक्रेट्स आता है, रुकता है और चला जाता है । जबकि वह नेता थे, लेकिन गए भी तो कहां…? “मदारी” में …. जबकि उनके ही अपने स्थानीय बड़े नेता और कार्यकर्ताओं के संपर्क में आकर वह स्थानीय राजनीति को पलट रखने की क्षमता रख सकते थे…. किन्तु उनके ही स्थानीय नेताओं ने उनको पप्पू बना दिया.. यह अलग बात है राहुल गांधी में योग्यता थी उन्होंने इसकी उपयोगिता को पहचान और आदिवासी क्षेत्र की महुआ बनाने की संस्कृति और आजीविका को देश में पहचान दी। संभव है भविष्य में कुछ करें भी, अगर अवसर लगता है…?
किंतु कांग्रेस की जो जमीनी राजनीति है उसने पांच दशक सत्ता वाली राजनीति के उत्तराधिकारी राहुल गांधी की उपयोगिता को लगभग सून्य में समेट कर रख दिया था। यही हाल प्रदेश में दो दशक से सत्ता में रही भाजपा की स्थिति को भूंसा वाली घटना ने सिर्फ यह प्रदर्शित किया है कि नेताओं के दिमाग में भूंसा भरा है इसके अलावा कुछ नहीं…?
अभी वक्त है विशेष पर आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल की दशा में देश की राजनीतिक परिस्थितियों की दुर्दशा को विधायिका को पहचानना चाहिए अन्यथा आपको लगता है कि आप देश को चूटिया बना रहे हैं…; ब्यूरोक्रेट्स के लगता है कि वह देश को चूटिया बना रहा है…
लेकिन वास्तव में ऐसी घटनाएं जब घटती हैं तो लगता है “..मोगैंबो खुश हो रहा है…? इसके अलावा कुछ नहीं है बधाई हो कमल प्रताप को कि अपने पुरुषार्थ को दबाकर वह रविंद्र सिंह के पास जाकर संभावित युद्ध को चुनौती नहीं दिए अन्यथा साबित हो जाता की कौन असली है और कोई बात नहीं…? फिलहाल अपने कह सकते हैं की जो कुछ हुआ उससे “…मोगैंबो खुश हो गया…” क्योंकि जिस जिस रेत और खनिज में अवैध परिवहन की न्याय की बात कर रहे थे..
दरअसल उसका नंगा नाच पिछले 4 साल में खुलकर शहडोल जिले में हुआ है और इस नंगे नाच में भाजपा के तमाम पदाधिकारी रेत के हमाम में नंगे होकर नाच भी रहे थे। यह अनुभव में देखा भी गया है। यही कड़वा सच है, आदिवासी क्षेत्र का और यह नंगा नाच अब नियम बन गया है आपके बगल में पड़ी हुई रेत की नदी से आप एक किलो उठा नहीं सकते… हां चोरी और डकैती डालना हो तो भाजपा और ब्यूरोक्रेट्स के साथ मिलकर पूरी पारदर्शिता के साथ नियम बनाकर डाका डाल सकते हैं.. कई नेताओ चाहे वह कांग्रेस को हो या भाजपा के या किसी अन्य दल के या इन सब को नियंत्रित करने वाले किसी दो के..लोगों की कालोनियां आदिवासियों की जमीन पर इसी अवैध रास्ते से ब्यूरोक्रेट्स की सहायता से बन भी गई है.. इसीलिए रविंद्र सिंह कहते थे की जिलाध्यक्ष हो कोई राष्ट्रपति नहीं…?
(….जारी…२)

