
भारत में लोकसभा चुनाव के पहले चरण के चुनाव हेतु 102 लोकसभा सीटों पर प्रचार कार्य कल थम गया। आज मतदान होगा, जहां प्रचार कार्य घोषित तौर पर रोक दिया गया है, उसमें शहडोल लोकसभा क्षेत्र भी है। शहडोल भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में शामिल होने के कारण आदिवासी विशेष क्षेत्र वाला लोकसभा क्षेत्र है । क्योंकि पहले तो शिवराज सिंह मुख्यमंत्री के द्वारा और उसके 1 साल बाद आदिवासी समाज से आने वाली भारत की महिला राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू स्वयं शहडोल आकर यह घोषणा की थी कि यहां पर पेसा एक्ट लागू किया जाएगा यानी आदिवासियों की संरक्षण और विकास के अंकी गारंटी की घोषणा राष्ट्रपति के द्वारा की गई थी। अब राष्ट्रपति जी को भी एक लंबा समय हो गया है किंतु पेसा एक्ट नाम मात्र का ही लागू हुआ है यह शहडोल क्षेत्र की कड़वी सच्चाई है। कितनी जागरूकता है इसको इस चुनाव में हम समझने का प्रयास करेंगे.
—————————-(त्रिलोकी नाथ)—————————–
यदि चुनाव आयोग घोषित नहीं करता कि प्रचार कार्य थमा है तो शहडोल मुख्यालय में विशेष तौर पर यह पता नहीं चल पाता की लोकसभा का चुनाव हो भी रहा था क्या…? यदि नेताओं के आने-जाने को छोड़ दें तो लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी के किसी भी कार्यकर्ता की जागरूकता देखने वाली समझ में नहीं आई … ।
प्रशासन या निर्वाचन अधिकारी जितनी जागरूकता पैदा करने का काम कर रहे थे उतनी अखबार में और जमीन में दिख रहा था क्योंकि इसके लिए सरकारी पैसा आया था और उसे खर्च करना था इसलिए यह जागरूकता का कार्यक्रम चल रहा था ।तो कह सकते हैं कि शहडोल में लोकसभा चुनाव हो रहा है यह आज हमें पता चलेगा जब वोट डालने वाले लोगों को वोट डालने के लिए मतदान केंद्र तक खींचा जाएगा । क्योंकि मतदाता अब मतदान के लिए प्राय: उत्सुक नहीं रहता उसे चुनाव के बाद “हांसिल आई शून्य..” की तरह सब कुछ लगने लगा है। लेकिन एक औपचारिकता है और कुछ राजनीतिक दल इसमें पैसा खर्च कर देते हैं। इसलिए लोग वोट डालने चले जाते हैं इस बार मतदान प्रतिशत यह भी प्रमाणित करेगा कि पहले की अपेक्षा लोगों में मतदान प्रक्रिया पर कितना उत्साह बचा रह गया है।
इसे शायद निर्वाचन विभाग ने समझ लिया है इसलिए वह मतदान करने के लिए लोगों में उत्साह पैदा करने का अनेक प्रकार से करोड़ों रुपए खर्च करके प्रयास करता रहता है क्योंकि उसी से साबित होना है कि लोकतंत्र जिंदा है या बीमार है अथवा बेहोश है या मरने की कगार पर है..।
तो देखने को मिला है की शहडोल मुख्यालय में भारतीय जनता पार्टी का चुनाव प्रचार “ढिवरी की रोशनी” की तरह जुग-जुगाता रहा लेकिन प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस पार्टी का चुनाव प्रचार लगभग बेहोश रहा.. ऐसा कह सकते हैं।
वह क्यों बेहोश रहा मतदान के बाद दूसरे दिन जिम्मेदार दिखने वाले कांग्रेसियों के उत्साह को देखकर समझ जा सकता है। लोग पार्टीयां कर रहे होंगे, जश्न मना रहे होंगे। क्योंकि जो भी थोड़ी-बहुत फंड आया रहा होगा वह 19 तारीख की शाम तक प्रदर्शित नहीं किया जा सकता क्योंकि वह पैसा सुबहअखबार में लपटे पंपलेट के जरिए प्रचार कार्य के रूप में प्रदर्शित किया गया है कि कांग्रेस प्रत्याशी फु़ंदेलाल को वोट दे दीजिएगा । खुद फुंदे लाल भी शायद इस गंभीरता को समझ रहे होंगे इसलिए वह शहडोल लोकसभा क्षेत्र में लोकतंत्र के इस बड़े उत्सव में पहली बार आत्म समर्पण करने वाले प्रत्याशी के रूप में जान जाएंगे। क्योंकि उन्होंने चुनाव लड़ा ही नहीं ऐसा देखने में समझ में आता है। या फिर पूरा झगड़ा कांग्रेस में फंड के फंडा को लेकर जातिवाद में फंस कर रह गया।
यह बात भी कि कांग्रेसियों में आपस में विश्वास की बेहद कमी देखी गई जिसका परिणाम यह रहा की राहुल गांधी जैसा बड़ा नेता शहडोल में आया और परिस्थितियों बस उन्हें रात भी गुजारनी पड़ी किंतु क्षेत्र के कांग्रेसियों ने उनके होने का कोई जमीन लाभ नहीं लिया बल्कि उन्हें उन बहुचर्चित स्थान पर ले गए जो कभी अपने छवि के लिए समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था..।
और शायद चुनाव प्रचार के मामले में भाजपा की श्रीमती हिमाद्री सिंह के सामने आत्म समर्पण कर दिया था यह बात और भी प्रमाणित होगी जब मतदान का प्रतिशत कितना होगा और उसमें किसकी कितनी हिस्सेदारी दिखेगी उस यह तय होगा कि आत्मसमर्पण किस हद तक किया गया था अन्यथा लोकसभा जैसा महत्वपूर्ण चुनाव इतना नीरस इतना उत्साहहीन और इतना बेबस लाचारी शहडोल में कभी देखा नहीं गया।
यह हालत तब है जब जागरूकता के लिए भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू स्वयं शहडोल में आकर आदिवासियों को पावरफुल बनने के लिए पेसा एक्ट लेकर आई थी तो क्या वह एक मजाक था अथवा कोई साजिश जिसका परिणाम शहडोल के आगामी लोकसभा चुनाव में मतगणना परिणाम से झलकेगा…?
फिलहाल मत के दान की औपचारिकता प्रशासन कितनी पूरी करवा पता है यह भी प्रमाणित होगा हालांकि इन्हीं हालातो को समझने और देखने और अनुभव करने के बाद ही शायद राजस्थान के मंत्री रहे पायलट ने एक इंटरव्यू में साफ किया था कि जब 400 पार है तो फिर चुनाव कराने की क्या जरूरत है…? हो सकता है यही भाषा ट्रायल के रूप में या फिर उदाहरण के रूप में शहडोल में प्रदर्शित हो जाए कि जब जीत सुनिश्चित है जीत की गारंटी है तो फिर शहडोल में चुनाव कराने की क्या जरूरत है…?
देखना होगा कांग्रेस के शहडोल क्षेत्र के लोकप्रिय चेहरे रहे स्वर्गीय दलवीर सिंह और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती राजेश नंदिनी सिंह की पुत्री अब हिमाद्री सिंह भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में बीमार हो चुकी कांग्रेस के प्रत्याशी से कितने लाख वोट से चुनाव जीत पाती है…? फिलहाल विजय प्रत्याशी के लिए बहुत-बहुत बधाई क्योंकि मतदान सिर्फ एक औपचारिकता है और और पराजित यानी दूसरे नंबर में आने वाले के प्रत्याशी के लिए भी शुभकामनाएं क्योंकि अब आदिवासी विशेष क्षेत्र में यही मॉडल यानी शहडोल मॉडल अन्य आदिवासी क्षेत्र के रूप में भी विकसित किया जा सकता है…। किस प्रकार के चुनाव प्रशासन की पैसे फिजूल खर्च अलावा कुछ नहीं होता। फिर भी जिंदा दिखाए रखने की जिम्मेदारी है उन्हें औपचारिकता करना ही चाहिए और वही होता दिख रहा है….।क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ एक मनोरंजन है इसलिए मनोरंजन को भी जनता के ऊपर छोड़ना चाहिए की वह इस चुनाव को हारा हुआ चुनाव के रूप में देखें या जीता चुनाव के रूप में…..?

