
हालांकि भाजपा के संबित पात्रा ने नरेंद्र मोदी को पति स्वरूप में स्वीकार नहीं किया है ,लेकिन आध्यात्मिक दुनिया में भगवान को पति स्वरूप में स्वीकार किया जाता है। क्योंकि वहां पुरुष कोई नहीं होता है, सब स्त्री होती है। और शायद राष्ट्रभक्ति भक्ति धारा बहकर इसीलिए संबित पात्रा ने भगवान जगन्नाथ को “मोदी जी का भक्त..” कह दिया था। दवाब बन तो अब वह आम महिलाओं की तरह तीन दिन का उपवास का व्रत ले लिए हैं ।किंतु बात हम बागी व्यक्तियों की नहीं करेंगे।लोकतंत्र की विभिन्न पदों में इस समय पतन के दौर का लोकतंत्र है और वह इतना पतित हो रहा है कि उसे अब जैविक रूप से पति मिलने लगे हैं। वैसे तो पदनाम लोकतंत्र में सुचारु व्यवस्था को बनाए रखने और संभाल कर चलाने के लिए बनाए गए हैं किंतु जैसे-जैसे लोकतंत्र 21वीं सदी के रामराज की ओर बढ़ा तभी इसके पतन शब्द ने पति-शब्द का आविष्कार करना 20वीं सदी के अंत में ही चालू कर दिया था। पंचायती राज व्यवस्था का पतन पति शब्द की खदान था… जहां पर पतित लोकतंत्र ने पंच-पति के नाम से इसका इस तरह “किया जैसे इस समय भगवान लोकतंत्र में नेताओं के रूप में अवतरित होकर घूम रहे हैं। धीरे से जहां उपसरपंच प्रभावी है वहां “उपसरपंच-पति”जहां सरपंच प्रभावी है वहां “सरपंच-पति” आम स्वीकारता के साथ लोकतंत्र में स्थापित हो गए…अब 21वीं सदी में अनैतिकता निर्वस्त्र होकर कहीं सांसद-पति कहीं विधायक-पति तो कहीं मंत्री-पति के रूप में स्थापित हो गए हैं।
———————————-(त्रिलोकीनाथ)——————–
कार्यपालिका में पटवारी-पति सहज स्वीकार्य हो चुका है अब धीरे से तहसीलदार-पति, एसडीएम-पति ,कलेक्टर-पति के रूप में भी इन्हें कार्यपालिका स्वीकृति चली जाएगी अभी असहमति के साथ स्वीकार कर रही है। जहां जितना भ्रष्टाचार में व्यक्ति डूबा है वहां लोकतंत्र का पतन , पति शब्द को उतना ही प्रभावी बनाता चला जाता है। और निसंकोच भ्रष्टाचार हमारे लोकतंत्र की आत्मा को अपने काकस में जकड़ने लगी है।
इसमें कोई संदेह नहीं है और यह विरासत के रूप में 2047 तक या फिर अगले 1000 साल में जो राम-राज्य की कल्पना की जा रही है ।
निर्वस्त्रता के साथ सहज स्वीकार हो जाएगी तब राष्ट्रपति पर एक और प्रधान पति लग जाएगा और उसे कहा जाएगा “राष्ट्रपति-पति” यानी डबल इंजन का राष्ट्रपति। प्रधानमंत्री पति भी दिखने लगेंगे.. कलेक्टर-पति, एसपी-पति और कमिश्नर-पति तो इस व्यवस्था के अंग के रूप में काम करेंगे। ऐसा काल्पनिक मिथक है। जो तौर तरीका होता जा रहा है उसे देखकर हम कल्पना ही तो कर सकते हैं।
यह भूमिका बनाने का मकसद इस देश में दो पतियों के विरोधाभास से देश की वैचारिक संस्कृति प्रभावित होती दिख रही है।एक पति वह हैं जिन्होंने अपनी पत्नी को अघोषित तौर पर तलाक दे रखा है यानी तालाक-तलाक-तलाक कहा तो नहीं, फिर भी दिखने वाला तलाक प्रमाणित होता है; इसमे़ पत्नी-त्याग की महान परंपरा से देवत्व बनने का प्रदर्शन होता है। संबोधन के रूप में इसे पत्नीत्याग-पति कहा जा सकता है… क्योंकि वास्तव में उसमें पत्नी को वैधानिक रूप से त्याग नहीं करता है इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बड़े उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं.
इन्हीं की मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पति प्रकाश ला प्रभाकर बड़े अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते हैं और इन पर कई वीडियो में आया है कि उनके एक पति हैं जो बहुत बड़े अर्थशास्त्री हैं प्रकाशला प्रभाकर। वे अक्सर अपने मिथक-राष्ट्रहित में नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों कीआलोचना करते रहते हैं।
इस समय भारत में यह दो पति सभी प्रकार के प़ंच-पति, उपसरपंच पति, सरपंच-पति, पटवारी-पति, विधायक-पति, सांसद-पति से देश के प्रथम श्रेणी के पतियों में माने जा सकते हैं.. तो कह सकते हैं की अर्थशास्त्री प्रकाशला प्रभाकर कि वे सदी में भारत के “वित्त-मंत्री पति- हैं
और आश्चर्यजनक विरोधाभास यह है कि देश की वित्त मंत्री, निर्मला सीतारमण, मोदी सरकार की वित्त व्यवस्था की अनुगामी है क्योंकि वह इस देश के लिए सर्वोच्च व्यवस्था के रूप में देखते हैं.. लेकिन “वित्तमंत्री-पति” ठीक इसके विपरीत मोदी सरकार की नीतियों के प्रबल आलोचक हैं अगर थोड़ा सा अतिशयोक्ति अलंकार मिक्स कर दिया जाए तो वित्त-मंत्री पति “उनकी” नजर के राष्ट्रद्रोही है.. किंतु कमाल की बात यह है कि प्रधानमंत्री जी नरेंद्र मोदी ने अपने वित्त मंत्री को वित्तमंत्री-पति के करतूत के लिए कभी जिम्मेदार नहीं ठहराया और वित्त मंत्री को अपने मंत्रिमंडल से हटाया भी नहीं।यूट्यूब में सिर्फ इतना बोल दीजिए कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति तो गूगल महाराज पूरा रामायण खोलकर राम-रावण का युद्ध दिखाने लगता है।
इतनी पारदर्शिता राम राज्य के सरकार में ही संभव है। और शायद इसीलिए निर्मला सीतारमण की वित्तमंत्री स-सम्मान बरकरार हैं इसीलिए भगवान राम को त्रेता युग से पतित-पावन राम के रूप में उन्हें देखा भी गया है।बात कलयुग के 21वीं सदी की है तो जो स्वाभाविक विकास क्रम कलयुग में होना चाहिए वह सार्वजनिक रूप से पारदर्शी है। इसमें कोई शक नहीं करना चाहिए किंतु जो लोकतंत्र की नई व्यवस्था चल पड़ी है पदों में पति का जुड़ जाना अपने आप एक नए पद का निर्माण हो जाना रोजगार की नई गारंटी भी है। शायद इसे कम लोग समझते हैं बावजूद इसके यह एक कड़वा सच होता जा रहा है जमीनी पंच से लेकर प्रधानमंत्री तक घोषित पद सरनेम की तरह पद नाम के साथ जुड़ता चला जा रहा है और हमारा समाज और देश इसे स्वीकार भी कर रहा है। कहीं विवाद हो जाता है तो कुछ समय के लिए पद के साथ उसका यह पदनाम ओझल हो जाता है लेकिन चुकी यह एक जैविक-सभ्यता है इसलिए कुछ समय बाद वह पुनः प्रकाशित होने लगता है..
लेकिन कुछ मामलों में यह पद नाम उल्टा भी हुआ है मुख्यमंत्री पत्नी के रूप में; इसकी खोज बिहार की धरातल में रावड़ी देवी के रूप में प्रकट हुई थी। 2024 के चुनाव में जैसे-जैसे भ्रष्टाचार पारदर्शी हो गया शक्ति के रूप में पत्नियों ने पद नाम के साथ अपना स्वरूप दिखाना चालू कर दिया जिसमें मुख्यमंत्री केजरीवाल की धर्मपत्नी केजरीवाल की अनुपस्थिति में अपनी आभामंडल प्रकाशित करती रही है तो झारखंड में हेमंत सोरेन की पत्नी ने भी यही स्वरूप प्रकट किया है। और सफलता के साथ हमारा लोकतंत्र विशेष स्वीकार भी किया है। इसमें शक नहीं करना चाहिए, अन्य उदाहरण भी ढूंढे जा सकते हैं।
कार्यपालिका में यह चर्चा का विषय होता है कि कमिश्नर की पत्नी, कलेक्टर की पत्नी, सेक्रेटरी की पत्नी आदि आदि प्रभावशाली पदों के साथ यह सभा जुड़ ही जाता है। और कुछ पद नाम भी इसके साथ गठित हो गए हैं।
शहडोल के राजेंद्र क्लब में कलेक्टर कोई भी होते हैं उनकी पत्नी उसे क्लब की मुखिया होती हैं यही परंपरा हैअन्य बड़े पदों में भी हमने इसे देखा और समझा। तो कार्यपालिका ने भी इसे स्वीकार कर लिया है विधायिका ने भी इन संबंधों को सहज रूप सेस्वीकार कर लिया है।
न्यायपालिका में अभी यह अछूत है और पत्रकारिता स्वयं में एक अदृश्य सत्ता है इसलिए सहज रूप से पति को ढूंढना अपवाद होता है या पत्नियों को ढूंढना अपवाद के रूप में सामने आता है। हां कुछ लोग इसमें गौरवपूर्ण तरीके से इसे स्वीकार करते हैं फलां प्रेस का पति फलां प्रेस की पत्नी…जहां पत्रकारिता मीडिया के रूप में परिवर्तित है वहां पर कारपोरेट जगत के मीडिया घराने अपने पसंद से सुविधा तो उपलब्ध हेलीकॉप्टर तक करते हैं किंतु उन्हें उसे स्तरीय दर्जा नहीं मिलता है। जिस स्तर पर लोकतंत्र की दो स्तंभों में प्रमाणित सहज स्वीकार्य होता जा रहा है। दो उदाहरण एक में एनडी तिवारी को पापा बनने का है और दूसरा भी हाल में सांसद रवि किशन के ऊपर पति बनने का आरोप है यह तो तथा-कथा है ।
दरअसल यह घटना वित्तमंत्री-पति के प्रमाणित होने के बाद अपने ही मंत्रालय के मंत्री के पति के द्वारा मंत्रिमंडल के निर्णय के विरोध में जो सार्वजनिक स्वीकार्यता हो रही है उसे मंत्रिमंडल जब खारिज नहीं करता तो आभास होता है कि इनके अतिरिक्त भी क्या कोई अदृश्य पति की सत्ता है जो इस विरोधाभास को जिंदा रहता है। अन्यथा विरोध करने पर राष्ट्रद्रोह कह लेना या आरोपी बना देना सहज है।
इतना मंथन इस बात पर होना पड़ा क्योंकि सबसे पावरफुल भारत के मोदी मंत्रिमंडल का जब नया दौर चालू होने वाला है और प्रक्रिया चुनाव की है तब वित्त-मंत्री पति ने यह कहकर अचंभित कर दिया है कि “इस बार चुनाव-चोरी हो गया है… उसे यूट्यूब में जाकर कोई भी देख सकता है. तो जैसे चंडीगढ़ का चुनाव चोरी हो गया, यह अलग बात है कि सीसीटीवी के कारण पकड़ भी गया .. जैसे गुजरात का सूरत का चुनाव चोरी हो गया, निर्विरोध मिस्टर दलाल 2024 के पहले सांसद घोषित हो गए अथवा इंदौर के निर्वाचन मैं कांग्रेसी उम्मीदवार आत्म समर्पण हो गया या फिर इन सबको पीछे छोड़कर भारत में एक नया सांसद कर्नाटक के हसन संसदीय क्षेत्र का सैकड़ो की संख्या में बलात्कार या यौन प्रताड़ना का आरोपी पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा का पोता प्रज्वल रेवन्ना पूरी सफलता के साथ मतदान प्रक्रिया तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वह ताकतवर बनाने वाला व्यक्ति अचानक देश छोड़कर बाहर चला जाता है और उसे सरकार पकड़ना भी नहीं चाहती है।
तो क्या यह सरपंच-पति से ऊपर महिला मतदाताओं का अपमान करने वाला सीधे संसद गठन होने पर शपथ लेने आएगा…? क्या इसे भी राजनीति ने स्वीकार कर लिया है…? यह देखना होगा “नाक दूर ना हासिया”के अंदाज में 5 जून को इसकी भी घोषणा हो जाएगी यही 21वीं सदी के लोकतंत्र का कड़वा सच प्रमाणित होता जा रहा है ।
सवाल यह है कि लोकतंत्र का पतन अभी और कितना पतित होने की संभावना है क्या इसका कोई नया रिकॉर्ड बन सकता है अथवा मूल पद नाम से पति शब्द हटा करके इसे वैध घोषित किया जाएगा। क्योंकि वास्तव में यह कड़वी सच्चाई है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह कड़वी सच्चाई का बाप है।जो पदनामी पति होते हैं वह बहुत पतित होते हैं तब पति होते हैं तब पद नाम से एक अघोषित बदनाम प्रवाहित करते हैं और लोकतंत्र इन्हें मान्यता देता है।
अघोषित ही सही यह सब हो रहा है और सिस्टम इसकी ताकत को पहचानता भी है कम से कम पतित पदनाम से जुड़ने वालापति शब्द अबतक की सबसे ताकतवर स्वयं को बताने वाली मोदी सरकार को वित्तमंत्री-पति लगातार चुनौती दे रहे हैं और कुछ पति भी मोदी जी को और मोदी सरकार को चुनौती देते होंगे.. यह बात हम तक गूगल पंडित जी ने नहीं पहुंचाई है या हमारे नजर में नहीं आई है। इसलिए हम इसी लक्ष्मण रेखा को प्रणाम करते हैं और उम्मीद करते हैं कि इसे संसद में पारित करके सम्मानित श्रेणी में रखा जाना चाहिए। क्योंकि यह अवैध है लेकिन वैधता को अब चुनौती देने लगा है…बहरहाल चुनौती देने वाली जिसमें वित्त मंत्री पति कहते हैं 2024 का चुनाव चोरी हो गया है अवश्य देखना चाहिए यह पति शब्द की ताकत ही है कि वह अभी तक राष्ट्रद्रोही घोषित नहीं किए गए हैं..

