चुनाव 2024 का निर्णय; मंगलसूत्र से मुजरा तक…. (त्रिलोकी नाथ)

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  1996 में जब मैं अपने पाक्षिक “विजय आश्रम” अखबार में पह अपनी संपादकीय में छपने के बाद जो पढ़ा तो मैं भी भारतीय पत्रकारिता को लेकर जो लिख दिया था उसे मुझे शर्म आई थी.. क्योंकि मेरी मनसा वह लिखने की नहीं थी वह लिपिकीय त्रुटि से आई मिस्टेक से प्रिंट हो गया था। आज नए भारत उसे दोहराने में मुझे जरा भी शर्म नहीं आ रही है। यह भारत देश की पत्रकारिता का पतन का प्रमाण पत्र है। जो धोखे से ही सही 20वीं सदी के अंत में मेरे हाथों लिखी गई थी अपने संपादकीय के इस वाक्यांश को मैं अब दोबारा प्रमाणित करना चाहता हूं । “…. भारतीय पत्रकारिता एक वेश्या की तरह है…”।5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है लेकिन आज 4 जून 2024 कोदोपहर बाद से भारत देश का पर्यावरण बदल जाएगा ।चाहे चुनाव के नतीजे पक्ष में जाएं या विपक्ष में.. यानी कारपोरेट जगत की मोदी सरकार बने या इंडिया गठबंधन सत्ता में आए, दोनों ही परिस्थितियों में देश का नजरिया नागरिकों के लिए बदलेगा।
आज शाम तक यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि देश “मंगलसूत्र” बेचना चाहता है या फिर “मुजरा” सुनना चाहता है… । क्योंकि पहली बार देश के प्रधानमंत्री ने मंगलसूत्र की कीमत लगाई है.. और हो भी क्यों ना, एक मंगलसूत्र कम से कम ₹100000(एक लाख रुपए )का तो पूंजीवादियों ने बना ही दिया है..।

रही मुजरा की बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी बनारस से चुनाव लड़ते हैं, वह काशी, मोक्ष का द्वार भी है। और कभी मुजरा की पहचान भी…. प्रसिद्ध फिल्मकार राज कपूर ने तो बकायदा कई साल पहले भारतीय राजनीति की पतित अवस्था का पूरी फिल्म ही बना डाला था। यह संयोग है की फिल्म का नाम अयोध्या वाले राम से ही चालू हुआ था। फिल्म “राम तेरी गंगा मैली” में उन्होंने दर्शाया की कैसे भगवान विष्णु के हरि चरणों से भागीरथी जी के तपस्या के बाद आर्यावर्त से पवित्रतम भागीरथी,गंगा होकर जैसे-जैसे आगे बढ़ी उसे विकास के प्रदूषण ने इतना प्रदूषित किया जितना किसी भारतीय मन में देवी का स्थान पाने वाली आधी आबादी की प्रतिनिधि महिला को भारतीय राजनीति में पतित कर दिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इस चुनावी भाषण में उस पतन को “मंगलसूत्र से मुजरा” तक पहुंचा दिया। यही आगामी भारतीय लोकतंत्र का कहीं ट्रेडमार्क भी ना बन जाए…?
किस प्रकार “राम तेरी गंगा मैली..” में मंगलसूत्र को वेश्याओं के रूप में हमारे नेता देखते हैं.. बनारस के कोठों में उसे जिस रूप में मुजरा करने वाली महिलाओं के रूप में प्रदर्शित किया गया है वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषण में चित्रित होता है..

हो सकता है नए संसद भवन में लोकसभा अध्यक्ष “मंगलसूत्र और मुजरा” का संबंध के बीच में चुनावी गाथा में प्रधानमंत्री के बोले गए शब्दों को असंवैधानिक घोषित कर दिया जाए.. ।किंतु वह संसद के अंदर ही होगा। संसद के बाहर यह प्रधानमंत्री भी बोलेंगे और अन्य लोग उसी का अनुगमन करते हुए इसे भी निकृष्ट भाषा का उपयोग “गर्व से कहो हिंदू” की तरह करेंगे… यही भारत का दोहरा चरित्र भी बन सकता है।
यही पर्यावरण आज शाम से भारतीय राजनीति का गौरव बनने वाली है। क्योंकि यदि नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी वाली सरकार आती है तो यह उनके बोले गए गौरवशाली शब्दों का महिमा मंडन होगा.. लेकिन अगर इंडिया गठबंधन की सरकार आती है तो इन्हीं शब्दों से अथवा इससे भी पतित भाषा शैली में भारतीय राजनीति सिलेंडर और चूड़ियां लेकर के पुनः इंडिया गठबंधन की सरकार को मुजरा करती दिखेगी.. क्योंकि उनकी राजनीतिक मंसा के अनुसार कभी महंगाई पर किसी प्रकार की मुजरा के मनोरंजन ने उन्हें इस ऊंचाई तक पहुंचा था। कारपोरेट जगत से चलने वाली राजनीति भारत की भावनात्मक तुष्टिकरण को तृप्त नहीं कर पाती है। 80 करोड़ आबादी को 5 किलो अनाज देने में अगर मोदी की भाजपा सरकार गर्व करती है तो उसकी प्रतियोगिता में 10 किलो अनाज में कांग्रेस तौलने की घोषणा करती है। चुंकी घोषणा है तो उसे पूरा भी करना पड़ेगा कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि वह जुमला बाजी का मुजरा नहीं करती।
जबकि यह देश उसे वर्ण व्यवस्था से विकसित हुआ है जिसमें ब्राह्मण वर्ण को समाज के अंदर रहते हुए समस्त त्याग का स्वरूप बताया गया था । क्योंकि उसने ही कभी यह स्वीकार किया था कि उसका संबंध सामाजिक अनुबंध में यज्ञ ,अग्नि, और देवता से है जिसकी प्रतिपूर्ति समाज से प्राप्त भिक्षाटन में समाज कल्याण के निहित पर टिका है। 1947 को जब देश का नया संविधान बना तब हजारों साल से वर्णित वर्ण व्यवस्था में त्याग तपस्या की इस परंपरा को सुरक्षित रखना और उसे आगे बढ़ाने की बजाय देश का प्रधानमंत्री अपने ही नागरिकों से पुरुष और महिला के बीच में विश्वास की कड़ी मंगलसूत्र बेचने का गारंटी देते हैं, और यह गारंटियां देश की अवधि आबादी को मुजरा करते हुए देखना भी चाहती है।
यही भारतीय राजनीति को प्रदर्शित करती चर्चित फिल्म “राम तेरी गंगा मैली…” में नेताओं का दोहरा चरित्र दिखाया गया है। कि किस प्रकार अपने परिवार मैं महिला को इज्जतदार-बहू बनाकर रखना चाहते हैं और अन्य महिला को रखैल (मुजरा वाली) बनाकर रखने का निर्णय करने में जरा भी संकोच नहीं करते… कुछ हद तक पूंजीवादी कॉरपोरेट जगत अपने पारिवारिक प्रतिष्ठा की इज्जत में अपनी ही घर की लड़की से मुजरा करवाने में तथा पोल खुल जाने पर गोली मार देने का आदेश देते हैं.. यही भारतीय राजनीति की कड़वी सच्चाई बनने जा रही है..? अगर ऐसा है तो यही उसका पर्यावरण भी होगा।

भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल में जिस प्रकार से शासन, प्रशासनिक निर्णय नीतिगत तरीके से ले रहा है वह इस क्षेत्र की संपूर्ण पर्यावरण और पारिस्थितिकी को सिर्फ मुजरा-वाली बना रहा है.. जब तक मनोरंजन होगा, तथाकथित कार्यपालिका और विधायिका इस मुजरे का आनंद लेंगे। इसके बाद संपूर्ण पर्यावरण और पारिस्थितिकी को गोली मार देने में इन्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। क्योंकि ऐसी नीतियां आदिवासी विशेष क्षेत्र में राजनीतिक शून्यता के कारण लगातार आगे बढ़ती ही चली जा रही हैं।
अब तो यह सोचकर आश्चर्य भी लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने क्यों अमरकंटक क्षेत्र में बॉक्साइट की खदानों के उत्खनन पर रोक लगा दिया था। अगर वह लगातार चलता रहता तो शायद वर्तमान लोकतंत्र को अमरकंटक क्षेत्र को नष्ट करने में इतना मेहनत नहीं करना पड़ता। अब तक तो नर्मदा, सोन और जोहिला के जल स्रोत काफी तेजी से नष्ट हो गए होते।

यह बात इसलिए कहीं जा रही है कि जिस रफ्तार से नेतृत्व-विहीन शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र के जल स्रोत योजना पद तरीके से नष्ट किए गए, रिलायंस कंपनी द्वारा सीवीएम गैस को मनमानी तरीके से बिना अनुबंध के खनन किया जा रहा है.., आसपास कोयला खदानों के ब्लॉक नीलाम कर कोयला खदानें खोली जा रही हैं… और ऊपर अन्य खनिक खदान सिर्फ सैकड़ो करोड़ों रूपए राजसव की रॉयल्टी की लालच में मनमानी तरीके से उत्खनन किया जा रहे.. हैं यानी लगातार जल स्रोतों का आधार नष्ट किया जा रहा है उससे यह स्पष्ट होता है की शहडोल का “मंगल-सूत्र” यानी मंगल की कामना वाला पर्यावरण अवश्य बिक जाएगा। क्योंकि यहां की पर्यावरण और पारिस्थितिकी नामक महिला को कारपोरेट जगत के लोग मुजरा वाली तवायफों की तरह नंगा नचाने को स्वतंत्र कर दिए गए हैं… स्वाभाविक है ऐसे पर्यावरण और परिस्थिति के साथ खुला वेश्यालय बन जाएगा और बलात्कार होता रहेगा। कानून संरक्षण करने वाला कर्तव्य निष्ठ हमारा बौद्धिक समाज, कार्यपालिका के लिए नियुक्त आइएएस, आईएफएस अथवा उच्च स्तरीय तथाकथित कानून के रक्षक करने को बात होंगे क्योंकि उनकी मानसिकता “स्वविवेक” नामक वायरस से मुक्त होगी। क्योंकि उन्हें अपने और अपने परिवार का पेट पालना पहली प्राथमिकता होगी।
कुल मिलाकर जैसा चल रहा है उसे हिसाब से 25-30 साल बाद का जो आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल होगा वैसा ही हर जगह का भारत होगा …मुजरा वाली आदिवासी क्षेत्र की न होकर उच्च विकसित कॉरपोरेट जगत की पढ़ी-लिखी स्थिति होगी.. इसमें कोई शक नहीं है….।

इसीलिए यह बात महत्वपूर्ण हो

जाती है कि पर्यावरण दिवस कल जरूर है लेकिन आज देश का पर्यावरण और स्थिति बदलने वाली है। हम सिर्फ शुभकामना या मंगल कामना कर सकते हैं ना हम मंगल-सूत्र बचा सकते हैं और ना ही मुजरा वालियों की आने वाली नई पीढ़ी को रोक पाएंगे.. क्योंकि स्वतंत्रता सतत संघर्ष का नाम है। और वह कानूनन नष्ट की जा रही है इसमें कोई शक नहीं..।

सत्ता किसी का भी हो, राजनीति का चेहरा “राम तेरी गंगा मैली…” में प्रतीत होती गंगा की तरह प्रमाणित होने जा रहा है …. सिर्फ आशा ही कर सकते हैं ईश्वर ऐसा ना करें…जैसे सोमनाथ के मंदिर में जब-जब गजनबी आक्रमण किया तब तक वहां की पुजारी भगवान से पूजा पाठ करने के लिए जाप करते रह जाते थे और मंदिर लुटता चला गया। यह संयोग है कि भारत में स्वतंत्रता आई और सोमनाथ का आध्यात्मिक मंदिर पुन: जिंदा हो गया किंतु “राम तेरी गंगा मैली…” के बनारस के कोठों मे मंगलसूत्र बेचकर मुजरा करने वाली व्यवस्था ने अब कानून का नकाब पहनना चालू कर दिया है। क्या इस देश का संविधान रोक पाएगा यह भी हम कल से देखेंगे…..
—————————————————————————-(त्रिलोकी नाथ)


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