आखिर 19 हजार करोड रुपए की मुफ्त-खोरी “लाडली बहन योजना” का सकारात्मक उपयोग क्या हो..? ( त्रिलोकी नाथ)

Share

हो सकता है कार्यपालिका के कर्तव्य निष्ठा से लोकतंत्र में कुछ जागरूकता नागरिकों में भी पैदा हो और वह एक लहर बनाए, क्योंकि अंततः हर घर परिवार की केंद्र में महिला इकाई सर्वाधिक संपन्न शक्तिशाली इकाई होती है और अगर उसने तय कर लिया या उसने ठान लिया कि वह पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित है तो वह पहली शिक्षिका होगी जो परिवार और भारतीय नागरिक समाज को क्रियान्वयन रूप से प्रकृति प्रेम के प्रति उदाहरण पेश करेगी.. किंतु अभी तक ऐसा होता नहीं दिख रहा है…?
——————-( त्रिलोकी नाथ)——————————

18 साल शिवराज सिंह ने मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रयोगशाला के तौर पर शासन चलाया ऐसा राहुल गांधी कहते हैं, कुछ कार्यकाल के लिए संत स्वभाव की उमा भारती भी मुख्यमंत्री रही और उससे भी अल्पकाल के लिए बाबूलाल गौर ने भी बतौर मुख्यमंत्री सत्ता सुख भोगा। क्या 20 साल में शुद्ध भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपनी प्रयोगशाला का आंतरिक मूल्यांकन संत स्वभाव की उमा भारती से निरपेक्ष भाव से नहीं कराना चाहिए की जो सत्ता में बने रहने के लिए हो रहा है वह कितना उचित है..? कितना मानवी है ..?कितना अमानवीय है ..? उमा भारती इसलिए कि उनकी एक सोच “पंच ज” अभियान में दम था..

किंतु भाजपा अपना आंतरिक मूल्यांकन क्यों करना चाहेगी क्योंकि उसे सत्ता में बने रहने के लिए साम-दाम-दंड-भेद प्रदेश को गिरवी रखना हो.., प्रदेश को बेचना हो तो भी वह कोई कीमत लगा सकती है …ऐसा क्यों नहीं समझा जाना चाहिए…?
क्योंकि मध्य प्रदेश के सबसे रहस्यमई “व्यापम घोटाले” में आधा सैकड़ा हत्या या आत्महत्या अथवा दुर्घटना में मर गए लोग जिसमें खुद उनका एक मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा भी था उन्होंने कभी इस बारे में विचार क्यों नहीं किया..? इसलिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी अगर यह कहते हैं की व्यापम घोटाले का अब राष्ट्रीयकरण हो गया है यानी वह देश में फैल गया है तो उसमें गलत क्या है ..? क्योंकि भाजपा ने अपनी आंतरिक शुद्धि का कोई प्रयास नहीं किया था।
यह अलग बात है कि कितने विपक्षी नेता अथवा जीवित पत्रकारिता या फिर न्यायपालिका इस मामले में कुछ कहने का साहस दिखा पाई..? इस पर भी समय मूल्यांकन करके परिणाम भी देता रहेगा….

हम बात करेंगे मध्यप्रदेश को कर्ज में डुबोकर , उद्योगपतियों को लूट का अवसर देकर आखिर सत्ता भोगने के लिए कर्ज लेकर 19000 करोड रुपए सिर्फ लाडली बहन योजना के नाम पर भीख बांटने की शिवराज सिंह का वोट-बैंक लूटने की योजना पर क्यों नहीं बात होनी चाहिए. आखिर यह गवर्नमेंट जैसा कि आरोप लगाया जाता है की 16 लाख करोड रुपए उद्योगपतियों का माफ करके यानी उसे भारतीय धन लुटवाकर के अगर सत्ता में बनी रहती है तो 19000 करोड रुपए कर्ज लेकर मुक्त बांटने में क्या हर्ज है..?
लेकिन इसका हम एक सकारात्मक पक्ष प्रदेश में देखना चाहते हैं यदि आप वोट बैंक इकाई पर केंद्रित अपनी योजना को सफलता के साथ अंजाम दे रहे हैं चाहे वह प्रदेश को कर्ज में डुबोकर दे रहे हो तो क्या उसका कोई फायदा, इसका सकारात्मक पक्ष देखने का साहस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अथवा भा ज पा क्यों नहीं निकाल पाई है, इतनी बड़ी संख्या में लाडली बहन आपके टारगेट में है उनके वोट लूटने का सैद्धांतिक रूप से घूंस देकर बनाई गई नीति को प्रदेशहित और राष्ट्रहित में व्यापक दृष्टिकोण से बदलाव क्यों नहीं किया जा सकता है।
हाल में हम देखते हैं पर्यावरण और परिस्थिति की बुरी तरह से बर्बाद हो रही है और भाषण बाजी के अलावा कोई शासकीय कार्य नहीं हो रहे हैं पूरा प्रशासकीय हमला उस प्रोपेगेंडा और भाषण बाजी को ही आगे बढ़ता दिख रहा है। वृक्षारोपण, तालाब संरक्षण अथवा नदी संरक्षण को लाडली योजना बहन में श्रम इकाई का उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता है, सिर्फ यह शर्त, पुण्य के रूप में परमार्थ के रूप में और सत्य ,धर्म और न्याय के रूप में लाडली बहनों से क्यों नहीं कराया जा सकता ।
यह प्रश्न इसलिए भी उठना है कि आखिर मुफ्त खोरी के शराब का नशा जो पैदा किया जा रहा है उसे हम मान लेते हैं की राजनीतिक लोग अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करते हैं किंतु सवाल यह है कि कार्यपालिका में बैठा हुआ जो पढ़ा लिखा उच्च बौद्धिक तबका है वह भी क्या इस विधायिका का गुलाम है.. जबकि वह इस लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है या फिर वह भी इस गुलामी में अपनी संभावना देखा है..? इतने प्रशासनिक अधिकारी जो कलेक्टर के रूप में बैठे हैं आखिर वह लाडली बहन योजना, जन अभियान परिषद या फिर आंगनवाड़ी,आशा इकाई से जुड़ी हुई महिलाओं को फोर्स करके जब नेताओं की भीड़ बुलाने के लिए सफलता पूर्वक अंजाम दे सकते हैं.. तो इस बहन-योजना में श्रम-इकाई को सकारात्मक रूप से वृक्षारोपण, तालाब संरक्षण अथवा नदी संरक्षण में क्यों नहीं लगाकर किसी भी जिले में प्रयोग कर रहे हैं..?
   आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल संभाग में भी इसका प्रयोग प्रशासनिक अधिकारी क्यों नहीं कर पा रहे हैं, अगर एक बहन भी अपने मां के नाम पर, अपने पिता के नाम पर अपने भाइयों परिवार के नाम पर पांच पांच पेड़ भी लगाती हैं तो कितने पेड़ स्वाभाविक रूप से लाडली बहन योजना इकाई के नाम पर लगाया जा सकते हैं इसी तरह इन बहनों को तालाब संरक्षण, नदी संरक्षण की सामूहिक जिम्मेवारी और उन पर दायित्व निर्वहन की क्षमता का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा है। जबकि श्रम इकाइयां सुनिश्चित हैं, जबकि मानव संसाधन उपलब्ध है, जबकि यह एक सकारात्मक पहल हो सकती है बावजूद इसके इतनी बड़ी श्रम इकाई को मुफ्त के शराब के नशे में लगातार डुबोये रखना और उन्हें बार-बार यह याद दिलाना की लाडली बहन योजना के मुफ्त खोरी की शराब भाजपा की कृपा से मिल रही है, कितना उचित है…? आखिर उनमें स्वावलंबन को जिंदा करके क्या घाटा हो सकता है..?
हो सकता है यह वोट बैंक की एक सफल प्रयोगशाला हो किंतु इसका एक सकारात्मक पक्ष भी है ऐसी राजनीतिक अंजाम हो , हो सकता है राजनेता अपनी स्वार्थ की सीमा के कारण ऊपर उठकर नहीं देख पा रहे हैं किंतु जो प्रशासनिक अधिकारी हैं जो लोकतंत्र में इस बात की तनख्वाह उठाते हैं उनका परिवार का पेट इस बात पर पलता है कि वह लोकतंत्र की रक्षा के लिए कर्तव्य निष्ठ हैं आखिर हमारी स्वतंत्र कार्यपालिका यह क्यों नहीं सोच पा रही है..?
क्या प्रशासनिक अधिकारी स्वयं को कटिबंध गुलामों की तरह है इन वोट बैंक के लालचियों के लिए समर्पित है यह बड़ा प्रश्न है…?
अन्यथा अगर भुगतान हो ही रहा है 19000 करोड रुपए का बजट में प्रावधान भी है.. बोट बैंक में कब्जा जमाए रखने के लिए घूंस देने का तो उसका सकारात्मक पक्ष पर अमल करने की जिम्मेदारी प्रयोग के तौर पर ही आदिवासी क्षेत्र शहडोल संभाग में इतने सक्रिय प्रशासनिक अधिकारियों की सक्रियता के बाद भी क्यों अमल में नहीं आ सकता..?

जो प्रदेश का मॉडल हो सकता है और इससे यह भी बेहतर संदेश जाएगा कि हमारा ब्यूरोक्रेट्स लोकतंत्र के लिए सभी सकारात्मक पक्ष को प्राथमिक दृष्टिकोण से विधायिका की वोट-बैंक की नीतिगत फैसलों में पर्यावरण संरक्षण के हित में कुछ सोच सकता है..
हो सकता है कार्यपालिका के कर्तव्य निष्ठा से लोकतंत्र में कुछ जागरूकता नागरिकों में भी पैदा हो और वह एक लहर बनाए, क्योंकि अंततः हर घर परिवार की केंद्र में महिला इकाई सर्वाधिक संपन्न शक्तिशाली इकाई होती है और अगर उसने तय कर लिया या उसने ठान लिया कि वह पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित है तो वह पहली शिक्षिका होगी जो परिवार और भारतीय नागरिक समाज को क्रियान्वयन रूप से प्रकृति प्रेम के प्रति उदाहरण पेश करेगी.. किंतु अभी तक ऐसा होता नहीं दिख रहा है…?

क्योंकि प्रशासकीय स्तर पर ऐसी किसी भी प्रकार की योजनाओं को अंजाम नहीं दिया गया है जो भी काम हो रहे हैं वह मात्र प्रोपेगेंडा इंडस्ट्री के विस्तार के लिए हो रहे हैं ।
स्वाभाविक सामाजिक आंदोलन को नीति का धरातल में लाने के लिए सिर्फ प्रशासनिक अधिकारियों को स्थान सुनिश्चित करना और लाडली बहनों को उसे तरफ प्रवाहित करना एक बड़ी उपलब्धि के रूप में माना जा सकता है। इससे हम भारत में लोकतंत्र के अंदर फैली हुई सामाजिक गुलामी, राजनीतिक गुलामी और तुष्टिकरण की आर्थिक गुलामी से मुक्ति पा सकते हैं.. किंतु सवाल यह भी है कि क्या हमारी सोचने की क्षमता इस दिशा में है भी या नहीं..? और अगर है तो उसमें किस प्रकार की संभावना को हम देखते हैं…
और अगर जैसा कि राहुल गांधी आरोप लगाते हैं या कहते हैं की मध्य प्रदेश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रयोगशाला है तो राष्ट्रीय सेवक संघ में जो कथित बौद्धिक संगठन है उसमें भी कोई लोकहितार्थ बौद्धिकता जीवित है..? और अगर वह जीवित है तो वह कार्यपालिका से जब सब कुछ अंजाम करवा सकती है तो इन सकारात्मक प्राकृतिक तत्वों के विकास के लिए उसकी कोई सोच क्यों नहीं है..?
अथवा वह भी भारतीय जनता पार्टी के प्रोपेगेंडा इंडस्ट्री की राजनीतिक गुलामी को आत्मसात कर चुकी है सिर्फ यह कह देने से कि वह भाजपा से सहमत नहीं है काम नहीं बनेगा।
कथित बौद्धिक संगठन को जिंदा होकर दिखाना होगा वह भी लोकतंत्र के सकारात्मक पक्षों पर समर्पित है अन्यथा 1 साल मणिपुर को गृह युद्ध में झोंकने या जलाने के बाद उसकी राख पर भस्म लगाकर संत बनने का जो तरीका मोहन भागवत ने प्रदर्शित किया है, वह एक साल पहले भी किया जा सकता था क्योंकि आज भी राष्ट्रीय सेवक संघ से भयभीत होकर भाजपा के नरेंद्र मोदी संसद में जवाब देते हैं अन्यथा व मणिपुर के मामले में जब 1 साल नहीं बोले तो नहीं बोलते, वह फर्क नहीं पड़ने वाला है।
क्योंकि बाकी मामलों में वह राहुल गांधी को अभी भी बालबुद्धि बोलने में जरा भी नहीं झिझकते क्योंकि उनकी राजनीति इसी पर टिकी है। वह थोड़ा बहुत डरते हैं तो आरएसएस से, यह उनके अंदर की बात है जो बौद्धिक संगठन की ताकत को सिद्ध करता है।हम मध्य प्रदेश में जो कथित तौर पर आरएसएस का प्रयोगशाला है उसमें पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण के संबंध में अगर आरएसएस ने बौद्धिक संगठन जिंदा है, तो उसके सकारात्मक पक्ष को उसके प्रयोगशाला की धरती पर देखना चाहते हैं वह इसलिए भी की समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडीज का कहना था की रस अगर एक बड़ा संगठन है तो उसका उपयोग लोकहित में मूल धारा के लिए क्यों नहीं होना चाहिए…? लेकिन क्या हम इस तुष्टिकरण को देख पाएंगे… यह भी देखेंगे….

 


Share

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

राशिफल

- Advertisement -spot_img

Latest Articles