सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या मायने हैं शहडोल के लिए; क्या खनिज विभाग से अब खनिजअनुबंध करेगी मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज..? (त्रिलोकी नाथ)

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         गत 16वर्ष से उद्योगपति मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल से निकलने वाली सीबीएम गैस का अनुबंध खनिज विभाग से नहीं किया , यानी बिना वैधानिक अनुबंध के वह शहडोल से अवैध तरीके से करोड़-अरबो रुपए का गैस शासन में प्रशासनिक अधिकारियों को अपने कब्जे में रखकर निकाल रहा था। इस बाबत उसने प्रशासन के संबंधित अधिकारियों को अपनी पहुंच का नाजायज इस्तेमाल करते हुए यह आश्वासन दे रखा था कि वह ऊपर से गैस खनिज को खनिज की श्रृंखला से मुक्त करने में लगा है… इस तरह उसका यह प्रयास भी रहा कि उसे गैस की गणितीय मापदंड के हिसाब से जो भी रायल्टी खनिज विभाग को दी जा रही है वह उद्योगपति की कृपा का हिस्सा है। ऐसा प्रशासन पर उसका दवाब भी था। और इसे खनिज विभाग के अधिकारियों ने तथा संबंधित प्रशासन ने स्वीकार भी कर लिया था..
—————(त्रिलोकी नाथ)————————

शायद इसीलिए 2009 में प्रारंभ किए गए इस उद्योग रिलायंस इंडस्ट्रीज सीबीएम का खनिज विभाग द्वारा कोई अनुबंध नहीं कराया गया और ना ही उसने कानूनी तरीके से दबाव बनाने के लिए नियमित रूप से अपने अधिकारों का उपयोग किया।
कहते हैं 30 वर्ष के लिए जारी गैस खनिज पट्टा की अवधि प्रथम चरण में समाप्त होगी इसके बाद वह द्वितीय चरण के लिए पुन: पट्टा प्राप्त करेगा। यानी स्पष्ट तरीके से गत 16 वर्ष से बिना अनुबंध के वैधानिक तरीके से गैस का उद्ववहन किया जा रहा है और इसे संबंधित प्रशासनिक अधिकारी पूर्ण गुलामी के साथ उद्योगपति मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज का सहमति प्रदान कर रहे हैं। अभी तक तो यही होता चला आ रहा है…।
केंद्र सरकार ने प्रयास तो यह भी किया था कि राज्य को मिलने वाली खनिज रॉयल्टी का अधिकार भी वह अपने पास रख ले, उसकी इसके पीछे क्या मंसा थी यह 16 वर्ष के रिलायंस इंडस्ट्रीज की दादागिरी से भी स्पष्ट होती है। क्योंकि केंद्रीय नेताओं से रिलायंस के मुखिया मुकेश अंबानी की याराना जग जाहिर है।
बहरहाल कल 24 जुलाई को उच्चतम न्यायालय की एक बड़ी जजों की पीठ ने 8-1 के बहुमत के साथ केंद्र सरकार के मंसा पर पानी फेर दिया और राज्य सरकारों को यह अधिकार सुरक्षित सुनिश्चित किया कि वह खनिज में रॉयल्टी ले सकते हैं।    यानी यह बात तो समाप्त हो गई की खनिज पर पहला अधिकार राज्य सरकारों का है। इस तरह रिलायंस इंडस्ट्रीज सीबीएम गैस की वह दादागिरी भी हवा हवाई दिखती है, जिसमें उसने खनिज विभाग से बिना किसी अनुबंध के गैस निकालने के लिए केंद्र सरकार का भबका दिखा करके आज तक 16 वर्ष बाद भी वैधानिक अनुबंध नहीं किया है। उसके इस दबाव से यह तो स्पष्ट है की खनिज विभाग का प्रशासनिक अमला रिलायंस इंडस्ट्रीज के तमाम अवैध कार्यों को पूर्ण गुलामी के साथ इस तरह पालन करता है, जैसे वह मध्य प्रदेश शासन और केंद्र शासन का समानांतर प्रशासनिक हिस्सा है ।
और उसके तथा उसके कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने का भी काम करता है। जिसका प्रभाव यह होता है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के द्वारा तमाम ग्रामीण स्तर पर जो मनमानी अवैधानिक तरीके से कार्य होते हैं उसको भी स्वीकार किया जाने का दबाव बनाया जाता है। जो सफलता से चल भी रहा है जिसके लिए आए दिन प्रभावित आदिवासी क्षेत्र के ग्रामीण जन आंदोलित होते रहते हैं और उनके आंदोलन को पुलिस और प्रशासन के साथ मिलकर स्थानीय छोटे भैया नेताओं के सहयोग से दबा दिया जाता है। ऐसा ग्रामीण जन मानते हैं और कई मामलों में देखा भी गया है।
अब सवाल यह है कि जब उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि खनिज पर पहला अधिकार राज्य शासन का है तो क्या रिलायंस इंडस्ट्रीज और उसके मुखिया मुकेश अंबानी भारत की संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित और सुरक्षित पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी के लिए बेहद संवेदनशील शहडोल क्षेत्र में खनिज विभाग से वैधानिक अनुबंध करेगा…? अथवा आज भी वह अपने नेताओं की याराना संबंधों का हवाला देकर के पुलिस और प्रशासन तथा स्थानीय छुटेभैया और बड़-भैया किस्म के नेताओं पर दबदबा बनाए रखेगा..? यह देखना होगा।
किंतु जिला पंचायत शहडोल जिस की आदिवासी वर्ग की महिला नहीं बल्कि समान्य वर्ग की एक महिला जिला पंचायत अध्यक्ष है वह भी अपने अधिकारों का जिला परिषद के अधिकारों का उपयोग करके क्या खनिज विभाग से अनुबंध कर पाने में कोई इच्छा शक्ति प्रकट करेगी अथवा वह भी सामान्य आदिवासियों की तरह शोषण और दमन की रिलायंस इंडस्ट्रीज की कर प्रणाली को एक सफल गुलाम की तरह अंजाम देगी…?
हो सकता है जिला पंचायत अध्यक्ष जो सामान्य घरेलू महिला है, उनकी समझ से यह प्रक्रिया बाहर की हो किंतु जिला पंचायत परिषद और उसमे बैठे तमाम जिला पंचायत सदस्य तथा पढ़ा लिखा कार्यपालक अधिकारी भी क्या अपने क्षेत्र में रिलायंस इंडस्ट्रीज की वैधानिक कार्य प्रणाली को गुलामी की तरह स्वीकार करता रहेगा..? यह भी देखने लायक होगा… बहरहाल यह पाखंड भी खत्म हो गया की कानून उन्हें ताकत नहीं देता सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह भी साबित होगा….


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