संवैधानिक रूप से अब तक भारतीय इतिहास के अन्य कई प्रकार कर्म से पिछड़ चुके मानवीय समाज को राष्ट्रीय मुख्य धारा में लाने की दृष्टिकोण से आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। साथ ही बहुत गहन और मनन चिंतन के साथ इस पर भी संकल्प पारित हुआ था की हर 10 वर्ष में इसकी समीक्षा की जाएगी किंतु आरक्षण प्रणाली में समीक्षा करने की बजाए इसमें सत्ता में बने रहने के लिए मर्यादा हीन तरीके से अभिशप्त और पतित हो रहे संवैधानिक आरक्षण प्रणाली को अपने-अपने तरीके से नेताओं ने मात्र एक हथियार बना कर रख दिया था । आरक्षण के अंदर छुपी मानवीय हित की पवित्रराष्ट्रीय मुख्य धारा की मंसा को जहरीला और घिनौना बनाकर नष्ट करने का काम भी किया गया। किंतु “जो किसी की कमजोर कड़ी होती है वही दर असल सबसे ताकतवर कड़ी होती है” मूलरूप से इस प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत इन दिनों भारतीय संसद में सर चढ़कर बोल ही रहा है किंतु न्यायपालिका ने इसमें महान फैसला कर दिया है जिसकी अति आवश्यकता आज से 50 साल पहले होनी चाहिए थी। ताकि आरक्षण को शराब की नशे की तरह है सत्ता में मदहोशी के लिए उपयोग न किया जाता।
बहरहाल पुरानी कहावत है “देर आये.. दुरुस्त आए..”के तर्ज पर आजादी के 75 साल बाद ही सही न्यायपालिका ने अपनी उपयोगिता को सिद्ध किया है। उन्होंने गुरुवार को आरक्षण प्रणाली के अंदर उपवर्गीय है व्यवस्था को मान्यता दी है साथ में यह भी कहा है कि जिन्हें आरक्षण प्राप्त हो चुका है उन्हें अब आरक्षण नहीं मिलना चाहिए एक तरह से जिस तरह पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर का सिद्धांत इसी तरह आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के मामले में भी एक प्रकार का क्रीमी लेयर यानी मलाईदार वर्ग को आरक्षण के लाभ नहीं मिलने पर सहमति दी गई है।
इस आदेश से देश में 1947 की स्थिति में दबे कुचले और पीछे चुके लोगों के लिए नई आजादी की क्रांति आएगी, इसमें कोई शक नहीं है।. हालांकि स्वतंत्रता दिवस को अभी 14 दिन बाकी हैं किंतु 2024 में आरक्षण के क्षेत्र में 1 अगस्त नया स्वतंत्रता दिवस के रूप में उनके उत्थान का प्रकाशवान दिन कहलाएगा। इस दिन को आरक्षण की दुनिया में अलग-अलग उपजातियां यानी उपवर्गीय व्यवस्था के लोगों को राष्ट्रीय मुख्य धारा में आने के और उनकी गुणवत्ता को भारत में लाभ मिलने की तमाम संभावनाएं आसमान पर तैरने लगेंगे। यह आने वाले दिनों में हमें हमारी पीड़ियों को देखने को मिलेगा की किस प्रकार से शहरी क्षेत्र में दलित के रूप में और ग्रामीण क्षेत्रों में जनजाति के रूप में उपवर्गीय जिनकी संख्या कम है उन्हें राष्ट्रीय मुख्य धारा में पहुंचने का काम हमारे संविधान की न्यायपालिका ने किस प्रकार दिया । यह चिन्हित हो सकेगा।
दैनिक जनसत्ता के अनुसार इसके पहले जब आरक्षण के मामले में यह मामला पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में 2010 के फैसले को चुनौती दी गई है प्रधान न्यायाधीश ने अपने और न्यायमूर्ति मिश्रा की ओर से फैसला लिखा चार्ज होने सहमति में फैसला लिखा जबकि न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने अस्ति वाला फैसला लिखा है। इवी चिन्नईया मामले में पांच सदस्य पीठ के 2004फैसले को पलटते हुए शीर्ष अदालत ने कहा एससी एसटी समुदाय के सदस्य व्यवस्थागत भेदभाव के कारण अक्सर आगे नहीं बढ़ पाते हैं न्यायमूर्ति गवई ने एक अलग फैसले में कहा राज्यों को एससी और एसटी में मलाईदार तबके (क्रीमी लेयर) की पहचान करनी चाहिए तथा उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर करना चाहिए
असहमति वाला आदेश देते हुए न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने कहा राज्य संविधान की अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित अधिसूचित जाति सूची के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते। राज्यों की सकारात्मक कार्यवाही संविधान के दायरे के भीतर होनी चाहिए। आरक्षण प्रदान करने के राज्य के नेक इरादों से उठाए गए कदम को भी अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट द्वारा उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने 8 फरवरी को
ऊनी आज गांव पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसमें एव चिन्नईया
फैसले की समीक्षा करने का अनुरोध किया गया था शीर्ष अदालत ने 2004 में फैसला सुनाया था कि सदियों से बहिष्कार भेदभाव और अपमान झेलना वाले एसी समुदाय के सजाती वर्ग का प्रतिशत करते हैं जिनका उपवर्गीकरण नहीं किया जा सकता अब सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसलों को पलट दिया हैशीर्ष अदालत टीवी चेन्नई मामले बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में 2004 के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ की फैसले को फिर से विचार करने के संदर्भ में सुनवाई कर रही है जिसमें यह कहा गया था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सजातीय समूह है फैसले के मुताबिक इसलिए राज्य इन समूह को अधिक वंचित और अधिक कमजोर जातियों को कोटा के अंदर कोटा देने के लिए एससी और एसटी के अंदर वर्गीकरण पर आगे नहीं बढ़ सकते।
बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के इस महान फैसले से उन करोड़ों लोगों को राष्ट्रीय मुख्य धारा में आने का अवसर मिलेगा जो भारत के संविधान में आरक्षण की व्यवस्था होने के बावजूद संवैधानिक समीक्षा हर 10 वर्ष में न किए जाने के कारण अपने ही लिए बनाई गई संवैधानिक आरक्षण प्रणाली का लाभ नहीं पा रहे थे और आरक्षित वर्ग में बहुमत वाले समाज का दमन और शोषण का कारण बनते जा रहे थे और इस कारण की उपस्थिति के लिए भारत के इतिहास के हजारों साल के पन्नों की जरूरत नहीं थी सिर्फ आजादी के 75 साल में ही यह व्यवस्था दमन और शोषण की पहचान बनती जा रही थी आरक्षण के क्षेत्र में आजादी की इस नई क्रांति पूर्ण फैसले के लिए न्यायपालिका को बहुत बधाई।