
140 करोड़ आबादी के साथ “विश्वगुरु” का प्रोपेगेंडा का दावा करने का दंभ भरने वाला वर्तमान भारत की सरकार एक विदेशी हिडेनबर्ग नामक संस्था से आर्थिक महायुद्ध की नाकेबंदी में लगी है, और उनके तथाकथित अमृतकाल यानी 75 साल आजादी के बीतने के बाद ओलंपियाड पेरिस में वह अंतिम पायदान पर पदक तालिका में प्रदर्शित हो रहा है। 2 दिन बाद भारत में स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाया जाएगा । मणिपुर में 1 साल से लगातार गृहयुद्ध के हालात में हिंसा हो रही है। वहां से अगर अच्छी तैयारी होती तो बड़ी बात नहीं है की ओलंपियाड के कुछ पदक हमारे खिलाड़ी नहीं झटक लेते…….?
————————–(त्रिलोकी नाथ)—————————-
खेल की दुनिया मेंवातावरण का प्रभाव राजधानी दिल्ली में इतना गंदा है की बलात्कार और यौन प्रताड़ना में 1 साल से पदक विजेता महिला पहलवानों का न्याय हेतु धरना प्रदर्शन की कार्यवाही चल रही है। सरकार के कान में जूं नहीं रेंग रही थी…। पेरिस ओलंपियाड में समापन हो गया, लॉस एंजेलिस में ओलंपियाड की तैयारी के लिए मसाल सौंप दीगई है।
ओलंपियाड में यदि “विवाद के लिए, भ्रष्टाचार के लिए” यदि कोई खेल होता तो शायद उसके सभी पदक भारत ने हासिल कर लिए होते हैं देख समझकर तो यही लगता है क्योंकि आर्थिक महायुद्ध में यानी आर्थिक साम्राज्य के खेल में जब भारत की शेयर बाजार को नियंत्रित करने वाली सबसे बड़ी संस्था “सेवी प्रमुख” पर हमला होता है तो उसकी सुरक्षा भारत सरकार और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के संगठन युद्ध के हालात में तैयारी करती दिखती है। इसीलिए जब विदेशी पत्रकारिता संस्था हिंडनवर्ग हमला सेबी प्रमुख माधवी बुच और उसके पति धवल बुच पर करता है तो सत्ताधारी भाजपा का संगठन और उसकी सरकार दोनों ही उसे राष्ट्र पर हुआ हमला की तरह देखते हैं, और प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं।
जंतर-मंतर नई दिल्ली में ओलंपियाड में षड्यंत्र से हारकर स्वर्ण पदक से चूकी हमारी महिला पहलवान विनेश फोगाट अपने अन्य पहलवानों के साथ यौन प्रताड़ना के आरोपी पर सत्ताधारी पार्टी के एक बाहुबली नेता पर जब आरोप लगाया तो उन्हें न्याय नहीं मिला…
इस अन्याय से प्रताड़ित होकर खिलाड़ियों ने अपने पदक गंगा में बहने का भी निर्णय लिया और अंततः जीते हुए पदक प्रधानमंत्री की सड़क पर छोड़ आए …..।एक महिला खिलाड़ी साक्षी मलिक ने इस वातावरण में प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही संन्यास ले लिया, विनेश फोगाट ने विदेश की धरती पेरिस में संन्यास की घोषणा की।
इन हालातो में भी यदि पदक जीते जाते हैं तो निश्चय ही कांस्य पदक को भी स्वर्ण पदक से ज्यादा महत्वपूर्ण दृष्टि से देखे जाने चाहिए। पेरिस ओलंपियाड में यही अनुभव मिला है।
और इसीलिए भारत ही नहीं पूरी दुनिया की जनता ने कमोबेश महिला खिलाड़ी विनेश फोगाट को सिर्फ 100 ग्राम वजन ज्यादा होने की शर्त पर न सिर्फ रजत पदक से हाथ धोने बल्कि स्वर्ण पदक के युद्ध से वंचित कर देने के बावजूद भी उसे जीते हुआ खिलाड़ी के रूप में देखते हैं । यह जंतर-मंतर के अन्याय में हुए न्याय का संदेश भी है….. किंतु हमारी सरकारों को या मदहोश सत्ताधीसों को इससे मतलब नहीं..। वह एक विदेशी संस्था की शो हो रहे ताश के पत्तों से परेशान है।
भारत की आजादी राष्ट्रीय मुख्य धारा की पत्रकारिता तो लगभग मरने करने के कगार पर है या फिर मरी हुई समझना चाहिए। उसके पास सरकारी सहायता होने के बाद भी वह ऐसे खोजी पत्रकारिता के लिए नपुंसक होती चली जा रही है.. क्योंकि उसे जो कठपुतली की भाषा में नई 2014 के बाद नई आजादी का जो वैक्सीन लग रहा है वह उसे नपुंसक बना रहा है।
यही आने वाली आजादी का विभीषिका दिवस होगा, यही विभीषिका की स्वतंत्रता का उत्सव भी होगा खेल की दुनिया के लिए कहना चाहिए इसमें कोई शक नहीं; क्योंकि कोई रामदेव बाबा व्यायाम को योग बताता कॉरपोरेट में अपने सफलता के झंडा गाड़ देता है और उसे संत और बाबा से ज्यादा कॉर्पोरेट होने का सुख का अनुभव होता है, तो कोई एक बाबा भारत से निकलकर के बलात्कार के आरोपों से भाग कर दुनिया के किसी कोने में “कैलाशा” राष्ट्र ही बना लेता है… और संयुक्त राष्ट्र संघ में गौरव के साथ अपने सदस्य भी भेजता है… ऐसे में इस देश में स्वतंत्रता के मायने बदल रहे हैं और कोई बात नहीं है…….
अलविदा ओलंपियाड पेरिस 24 लॉस एंजेलिस में 2028 में हम फिर सुनहरे सपनों के साथ किसी नए षड्यंत्र की सफलता के साथ झंडा गाड़ने जरूर आएंगे.. अलविदा विनेश फोगाट बहन, रक्षाबंधन में हम आपकी रक्षा नहीं कर पाए… इसका हमें भावना की दुनिया में हमेशा दुख रहेगा… आपको रजत पदक कृपा में मिल जाए यही आशा कर सकते हैं.. इसके बावजूद भी हम अंतिम पायदान से ऊपर नहीं उठने वाले….। यही भारत की कड़वी सच्चाई है……. यही खेल की दुनिया का “प्रत्यक्षण किम प्रमाणम” है…..

