आखिर दिनदहाड़े दबंगों ने कैसे तोड़ दिया, न्यायालय- संरक्षित कभी “समय” की पत्रकारिता के कार्यालय को…?( त्रिलोकी नाथ)

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(फोटो साभार हाल-ए-हलचल)शहडोल के स्थानीय दैनिक समाचार पत्र और पत्रकारिता को पहचान देने वाले स्व पद्नाभपति त्रिपाठी द्वारा दैनिक अखबार समय जहां छपता था अलंकार मुद्रणालय जहां कार्यालय में लगता था उसे दिन दहाड़े दबंगों ने ढहा दिया कहते हैं।

  जैसे कई साल मुख्यमंत्री गुजरात में रहने के बाद 10 साल प्रधानमंत्री होने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिल में जो मलाल था उसका भड़ास उन्होंने लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त में निकाल दिया, यह कहकर कि उनका एक सांप्रदायिक नजरिया भी है और एक धर्मनिरपेक्ष नजरिया भी। बातें हालांकि अन्य तथ्यों पर कही गई थी किंतु जो उन्होंने कहा वह मायने रखता है। कि आम आदमी भी उतना ही सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्ष है जितना प्रधानमंत्री होते हैं। उन्होंने कहा समय की जरूरत है कि हम “कम्युनल सिविल कोड” से हटकर एक “सेकुलर सिविल कोड” की तरफ बढ़े; उन्होंने भारतीय संविधान को यह कहकर उसकी बनावट मेंचुनौती दी। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह बोल रहे थे तब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया श्री धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ उनकी समझ पर मुस्कुरा रहे थे…। बहरहाल हम बात धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक विचार का आम आदमी से जो नाता है उसकी और इंगित कर रहे थे, कि व्यक्ति कहीं भी पहुंच जाए यह गुण उसका जन्मजात गुण होता है। ऐसा ही एक जन्मजात गुण एक भारतीय होने के नाते और एक सनातनी हिंदू होने के नाते मेरे अंदर भी कम से कम उच्च न्यायालय के आदेश के बाद से ज्यादा प्रखर तरीके से करवटें ले रहा है।

————————-( त्रिलोकी नाथ)—————————
शहडोल का मोहन राम मंदिर में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जो आदेश 2012 में पारित किया है। हालांकि उसके पहले से पाकिस्तान से आए सिंधी शरणार्थी को जो बैठने की जगह सिंधी पाठशाला के नाम पर तालाब की मे में दी गई थी अब वह वहां पर भयानक अतिक्रमण कार्य होकर तालाब को सिंधी धर्मशाला के नाम पर लगातार तालाब को भाठकर कब्जा कर रहे हैं। नागरिक के नाम पर भी सिंधियों ने तालाब को नष्ट करने का काम किया। जिस जगह उन्हें जीवन के लिए शरण मिली। हालांकि सिंधी लोग 1947 के प्रताड़ित होकर हमारे हिंदुत्व भावना के तहत भारत के नागरिक बने, लेकिन उसके पहले से अगर 1000 साल कहें तो बुरा नहीं होगा मुसलमान समाज भारत आया। समाज का कुछ हिस्सा शहडोल के इसी तालाब में सिंधी धर्मशाला के बगल में पहले से धार्मिक मजहबी परंपरा के नाम पर ईदगाह के स्थान पर इस तालाब की मेढ़ पर अपना स्थान पाया।
निश्चित तौर पर वह भी 1947 के कुछ समय पहले वहां पर अपनी इस संस्था को स्थापित किया रहा होगा, तो पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आए सिंधी समाज ने और मुसलमान ने दोनों ने ही पंडित मोहन राम पांडे के द्वारा निर्मित मोहन राम तालाब के स्रोत तालाब के पूर्वी क्षेत्र में थोड़ा सा स्थान में रहने लगे थे। अब स्पष्ट तौर पर यह दिख रहा है कि वह मोहन राम पांडे की मेढ़ की आराजी के साथ नजूल आरजी की तालाब में घुसकर उसे नष्ट कर रहे हैं। यह अलग बात है यह आदत नागरिकों में शहडोल के पूरे तालाब को नष्ट करने में प्रशासन के साथ एक परंपरा बना रखी है इस आदत के तहत यह तालाब भी प्रभावित हो गया।
तब जब की हाई कोर्ट का आदेश भी मोहन राम मंदिर के संरक्षण के संबंध में मंदिर के साथ खड़ा है, यह मेरे प्रधानमंत्री मोदी की तरह मेरी सांप्रदायिक भावना की उभार को कचोटता है या तो हम हिंदू कायर हैं या फिर हम अपनी धार्मिक संस्थाओं को डाका डलवाने में माहिर हैं…    क्योंकि हम सांप्रदायिक होने के साथ-साथ डकैत भी हो चले हैं.. यह तब है जबकि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का आदेश 2012 में स्पष्ट तौर पर संविधान के तहत मंदिर ट्रस्ट को सुरक्षित और संरक्षित होने की गारंटी देता है… यह सोच मेरी फितरत में नहीं है इसके बावजूद भी जब प्रधानमंत्री ने अपनी सांप्रदायिक सोच को प्रदर्शित किया संविधान पर आक्रमण करते हुए मेरा दबा हुआ संप्रदायिकता उबाल करने लगा था। लेकिन इसे नियंत्रित करके मैं लिखने का प्रयास कर रहा हूं की हां धर्मनिरपेक्ष का संविधान जिसकी मांग प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीन से कर रहे हैं वह शहडोल के मोहन राम मंदिर ट्रस्ट में जूती की नोक में क्यों चुभाया जा रहा है। जबकि 20 साल से हिंदू होने का दंभ भरने वाली पार्टी का शासन है…?
भारतीय संविधान के तहत आजादी के बाद न्यायालय के आदेशों का पालन कराना कार्यपालिका का पहला कर्तव्य होना चाहिए किंतु अगर मुख्यमंत्री यह कहना चालू कर दे कि हम आदेश का पालन नहीं करेंगे आपको तकलीफ है तो अवमानना के लिए न्यायालय में फिर जाइए, कुछ ऐसा ही न्यायालय के आदेश की धज्जियां कार्यपालिका की कार्यप्रणाली के चलते प्रमाणित तौर पर दिखती चली जा रही है। शहडोल के मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में तो एसडीएम सुहागपुर भी अपने आदेशों में भी बार-बार चाहते है कि आदेश का पालन हो.. किंतु गंदी राजनीति, सांप्रदायिक राजनीति, और स्वार्थी राजनीति सरकारी जमीन में ही नहीं प्राइवेट प्रॉपर्टी ट्रस्ट में भी अपनी गिद्ध दृष्टि से न्यायालय के संरक्षण में होने के बावजूद भी उसे लूटने का काम करती है…तो क्या राजनेताओं ने शहडोल को बर्बाद कर दिया है..? यह कहा जाए तो गलत नहीं है, चाहे वह “उच्च-नेता” हो या “नीच्च-नेता”… और इस लोकतंत्र के जिम्मेदार मीडिया ने भी इसे संरक्षित किया है; जाने या अनजाने इसे भी महसूस करना चाहिए।
यह अलग बात है की मीडिया अब स्वयं नष्ट हो रहा है यही उसकी परिणिति होती दिख रही है। अपवाद के रूप में पत्रकारिता को छोड़ दें तो पत्रकारिता धर्म को परिष्कृत करने के लिए बहुत अच्छा परिणाम आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल में लगभग शून्य सा दिख रहा है।
तो अब आते हैं असली मुद्दे पर शहडोल के स्थानीय दैनिक समाचार पत्र और पत्रकारिता को पहचान देने वाले स्व पद्नाभपति त्रिपाठी द्वारा दैनिक अखबार समय जहां छपता था अलंकार मुद्रणालय जहां कार्यालय में लगता था उसे दिन दहाड़े दबंगों ने ढहा दिया कहते हैं। मुख्य सब्जी मंडी मार्ग में13 अगस्त को यानी स्वतंत्रता दिवस के दो दिन पहले यह सब कारगुजारी हुई। जिसके लिए अखबार से संबंधित पत्रकार भी प्रशासन के पास बार-बार गए यह तो अत्याचार की अती है… हालांकि अब इसमें दोषी मकानमलिक वर्ग के खिलाफ पुलिस प्रकरण दर्ज किया गया है। जो कार्यवाही होगी वह अपनी जगह है, कुंज बिहारी तिवारी वगैरा जो मकान मालिक हैं वह इसके लिए दंडित भी होंगे।, यदि अपराध बनता है तो, जो दिख तो रहा है। क्योंकि अपुष्ट खबरों के अनुसार कहा यह भी जाता है कि न्यायालय ने किराएदार समय प्रेस मालिकों को राहत दे रखी थी की मकान मालिक उसे पर छेड़खानी ना करें।
इसके बावजूद भी मकान मालिक तिवारी बंधु किन्ही पर्दे के पीछे छुपे भू माफिया के चक्कर में न्यायालय के आदेश की अवमानना कर बैठे। जो एक प्रकार की नासमझी कहीं जा सकती है। यह सही है कि जब से हमने देखा है समय प्रेस साप्ताहिक, दैनिक होकर भी यहां छपता रहा और उनका किराएदारी भी यहां सुरक्षित रही किंतु न्यायालय के आदेश का सम्मान रखना दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है। किसी भ्रम में यह दुर्भाग्य जनक घटना के रूप में तब्दील हो गई। कानून अपना काम इसलिए करेगा क्योंकि मामला एक दैनिक अखबार से जुड़ा है, किंतु यह हमेशा नहीं होता।
कहीं-कहीं कानून यहां दबंग के साथ खड़ा होता दिखता है हमारे एक साथी पत्रकार अन्नपूर्णा तिवारी जी के मामले में हमने ऐसा नहीं पाया जो स्टेडियम रोड में दुर्भाग्य जनक तरीके से घट गया। पुलिस ने अपना काम नहीं किया था। क्योंकि दूसरा पक्ष तब मजबूत हो गया था; तो क्या जिसकी लाठी, उसकी भैंस के तर्ज पर शहडोल का पुलिस और प्रशासन अपना काम कर रहा है यह प्रश्न भी खड़ा होता है…?
इसे हम सरकारी जमीन के मामले में जब देखते हैं तो शहडोल का गांधी चौक अत्यंत कीमती नजूल भूमि पर चंद्रलोक वस्त्रालय के नाम पर नेमचंद जैन की गुंडागर्दी के बिना वैध अनुमति के अवैध दो मंजिला मकान बनाकर स्थापित होता है जैन के सामने पूरा प्रशासन जैसे नतमस्तक हो जाता है और वह तब संभव तक होता है जब तहसीलदार सोहागपुर 90000 रुपए का आर्थिक दंड के साथ चंद्रलोक वस्त्रालय के रेमंड शोरूम को तोड़ने का आदेश देता है. किंतु कानून को न मानने वाले जैन, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिला प्रमुख के संरक्षण में या कहना चाहिए चौकीदारी में तत्कालीन कलेक्टर चंद्रकांत दायमा चंद्रलोक वस्त्रालय में आकर खरीदारी करते हैं और सुबह टूटने वाला अतिक्रमण को पारदर्शी भ्रष्टाचार में रोक दिया जाता है यह अलग बात है की दायमा जी यह महान कार्य शहडोल की चर्चा में इतिहास बन जाती है। यही शहडोल की कानून व्यवस्था है…..? आज भी कमिश्नर न्यायालय में अतिक्रमण का यह मामला दम तोड़ने को और सौदेबाजी के लिए लंबित है। क्योंकि अब उस स्थान के बगल में करीब आधी जमीन पर मुख्यमंत्री की धारणाधिकार के तहत पट्टा भी दे दिया गया है। ऐसा पता चला है और आधी नजूल जमीन भ्रष्टाचार के चलते अतिक्रमणकारियों के कब्जे में रहकर उसे दबंगई को अहंकार को पल्लवित कर रही है। तो ठीक इसके बगल में अपनी रोजी-रोटी कमा रहे तीन पकोड़े वाले (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजर में) अपनी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष रत हैं क्योंकि आए दिन उन्हें धमकी दी जाती है कि उनका दुकान तोड़ दिया जाएगा, प्रमाण के तौर पर कोविड कार्यकाल में जो प्राचीन दीवार तोड़ी गई थी उसका बड़ा हिस्सा इन तीनों पकोड़े वालों (ठेले वालों) दुकानदारों के ऊपर आज भी रखा हुआ है.. दीवार का टुकड़ा बड़ा है।
पुलिस या प्रशासन ने आज तक एक भी दोषी व्यक्तियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज नहीं किया है। ऐसी हालत में भ्रष्टाचार पक्षपात प्रमाणित होकर अट्टहास करता है।
सवाल यह है की सुख कहां है एक स्थापित दैनिक समाचार पत्र की पत्रकारिता को चोट पहुंचती हुई गंज की घटना ने हमें एक बार फिर दुखी किया है, हालांकि न्यायपालिका का आदेश इस तरह यहां कुछ लाया गया है। जैसे गत 12 साल से मोहन राम मंदिर ट्रस्ट को लगातार हाईकोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाई जा रही है तो जब भ्रष्टाचार की परंपरा एक प्रथा बन जाती है इसकी चपेट में फिर कोई भी आ जाता है क्योंकि कानून शांतिव्यवस्था, अराजकता में परणित हो जाती है यही कानून लगने लगता है।
तो सवाल यह है कि हमारे पर्यावरण में जब न्यायालय का सम्मान करने की इच्छा खत्म हो रही है उसका सम्मान बचाए रखने की जिम्मेदारी किस कानून व्यवस्था की है वह अराजक हो रहा है या अक्षम हो रहा है..?
जैसा की मंदिर ट्रस्ट के मामले में, गांधी चौक के मामले में या फिर अब अलंकार मुद्रणालय यानी गौरव इंटरप्राइजेज के मामले में दबंगों ने अपने तरीके से गलत किया है ऐसी घटनाओं से विश्वास टूटता ही है उसे ठीक करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है और यह कब किसके लिए कहां प्रताड़ना का विषय बन जाए यह आम क्यों होता जा रहा है…? आम नागरिक कानून व्यवस्था की गारंटी में अपने को आश्वासन होकर संरक्षित क्यों नहीं पा रहा है यह बड़ा प्रश्न है….
किंतु इससे भी ज्यादा जहां संभावना है वहां न्यायालय के फैसले न्याय जरूर करते होंगे किंतु समाधान करते दिखाई नहीं देते हैं और समाधान में ही सुख है इसलिए समाधान का रास्ता मिल बैठकर जहां संभावना है वहां अवश्य करना चाहिए।
क्योंकि कानून व्यवस्था बुरी तरह से असफल साबित हो रही है…, क्योंकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लाल किले से 15 अगस्त में इसको लेकर चिल्ला चिल्ला कर बोल रहे हैं… हम आदिवासी क्षेत्र के लोगों को भी थोड़ी सी अकल लगानी चाहिए और आपसी समझ से अपने सुखों को स्थापित करने के लिए समाधानपूर्वक निर्णय करने चाहिए। अन्यथा यही कानून जो हमें रक्षा की गारंटी देता है यही डकैतों को सुरक्षित करता हुआ दिखाई देता है और कोई बात नहीं है….


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