डॉक्टरेट की उपाधि को छोटा क्यों बताया बाबा प्रेमानंद ने… ( त्रिलोकी नाथ )

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 छत्रपति साहू जी विश्वविद्यालय कानपुर के अनिल यादव अपने प्रबंधन और प्रशासन की ओर से एक प्रस्ताव लेकर के इस युग के प्रेम प्रवर्तक ब्रह्मचारी ऋषि प्रेमानंद जी महाराजके पास वृंदावन धाम पहुंचे। उनके समक्ष एकांतिक सभा में ब्रह्मचारी ऋषि को प्रस्तावित किया कि उनकी समाज को उल्लेखनीय सेवा तथा तमाम पुराणों वेदों और आधुनिक ज्ञान विज्ञान की पुस्तकों के अध्ययन पश्चात जो भी प्रवचन होते हैं उससे आम आदमी लवांवित हो रहा है इस कार्य के लिए उन्हें मानद उपाधि (पीएचडी) यानी डॉक्टरेट की उपाधि देकर वह अपने विश्वविद्यालय को गौरवान्वित करना चाहते हैं। उनके अनुसार करीब 5 लाख विद्यार्थी उनकी विश्वविद्यालय में अध्यनरत है। उससे बड़ा प्रस्ताव ब्रह्मचारी ऋषि प्रेमानंद जी ने यह कहकर विनम्रता के साथ इस प्रस्ताव को स्वीकार कर दिया कि वह अलौकिक दुनिया में “दासत्व-भाव” की उपाधि से गौरवान्वित हो रहे हैं जो सर्वोच्च उपाधि है मानव मात्र में ईश्वर अंश जीव अविनाशी का दृष्टिकोण उनके लिए महत्वपूर्ण है; बाबा जी ने कहा लौकिक भाव में आपका प्रस्ताव उच्च कोटि का है किंतु हमारे अलौकिक दुनिया में इसका कोई महत्व नहीं है। उन्होंने कहा कि वह मन की गतिविधि पर पीएचडी किये जिसकी कोई पुस्तककिए ज्ञान नहीं है। और यह कहकर उन्होंने पूर्ण विनम्रता के साथ  अनिल यादव की प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया कि ऐसा करने से उपहास होगा।

                          ——————–( त्रिलोकी नाथ )——————–
शैक्षणिक धंधे में मध्य प्रदेश में विश्वविद्यालय के कुलपति पद का पद नाम कुल-गुरु के नाम से वर्णित किया गया है. इस भाषा में कानपुर के इस विश्वविद्यालय के कुलगुरु के प्रस्ताव को ब्रह्मचारी ऋषि ने जिस विनम्रता के साथ और दैन्यता के साथ अस्वीकार किया है वह अपने आप में एक पीएचडी है।
मनोविज्ञान और परा मनोविज्ञान के दुनिया भर के छात्रों के लिए इस घटना का अध्ययन और अध्यापन उनकी आध्यात्मिक स्थिति को उच्चतर स्थान पर ले जाता है। भारत में कक्षा नवमी पास करने के बाद अपने जीवन भर एक शिक्षार्थी के रूप में वृंदावन के इस ब्रह्मचारी बाबा ने जो प्रशिक्षण प्राप्त किया वह अतुलनीय है। इसका विस्तार से प्रचार और प्रसार भारत सरकार को दुनिया में शांति और अमन का संदेश देने में उपयोग करना चाहिए था। किंतु ऐसे पदों पर और आध्यात्मिक शब्दों के आड़ में राजनीति और वोट बैंक का धंधा चलाने वाले विचारों ने इस मूलभूत वास्तविक “सत्य, न्याय और धर्म” की बड़ी घटना को दबाने का काम किया है, जो बहुत ही दुर्भाग्य जनक है।
हो सकता है राज्य सत्ता अपने धंधा में इसे बाधक मानती हो किंतु भारतीय पत्रकारिता जो समाज में घट रही इन बड़ी घटनाओं का वर्णन विस्तार से करना चाहिए था वह भी इस घटना को प्रकाशित करने में पूरी तरह से असफल रही है। कुछ अखबारों ने इसे प्रकाशित करके पत्रकारिता को जिंदा रखने का प्रदर्शन किया है जो बेहद सराहनीय है। मैं भी इस घटना के वर्णन को पत्रकारिता के नजरों में भारतीय पत्रकारिता की स्थिति को अध्ययन करना चाहता था। दुर्भाग्य से “विश्वगुरु” का दम भरने वाला भारत का शासन के इस कार्यकाल में हमने पाया कि दुनिया के इस बड़े लोकतंत्र को वृंदावन की इस घटित बड़ी घटना से जो संदेश अशांत, देश तथा विभिन्न सत्ता में जल रही दुनिया को देना चाहिए था भारत सरकार पूरी तरह से असफल रही है. पत्रकारिता उससे भी ज्यादा असफल रही है.. यह अपने आप में एक बड़ा प्रमाण पत्र है।
हम सब जानते हैं जी प्रेम के संदेश यानी मोहब्बत की दुकान के लिए हजारों किलोमीटर एक युवा नेता राहुल गांधी ने पैदल चला वह काम अकेले वृंदावन के एक 20× 20 के कमरे में बैठकर के बाबा प्रेमानंद ने सोशल मीडिया के थ्रू दुनिया को देने का काम सफलता के साथ किया और शायद इस घटना को देखने वाले छत्रपति शाहू जी विश्वविद्यालय कानपुर के प्रबंधन वह प्रशासन ने इस पर मोहर लगाने के लिए बाबा प्रेमानंद के समक्ष अपनी याचना पेश की थी किंतु स्वयं कुलपति या कुलगुरु के उसे प्रस्ताव को उन्होंने जिस अंदाज में लौकिक और परालौकिक व्यवहार की तराजू में तौलकर प्रेम को परिभाषित करने का काम किया वह बेहद आश्चर्यजनक रहा।
प्रेम की ताकत दुनिया के किसी भी हथियारबंद देश चीन, अमेरिका ,फ्रांस आदि और हथियार बेचने का धंधा करने वाले इन देशों के द्वारा मानवता के साथ की जा रही क्रूर व्यवहार के लिए बड़ा सबक है। किंतु राजनेता और हथियारों के दलालों पर जिंदा रहने वाले भारत ही नहीं दुनिया के लोगों के लिए यह प्रेम का संदेश घाटे का सौदा है।
किंतु मानवता के लिए यह एक महान घटना है और यह युद्ध एक सनातन युद्ध है जो चलता ही रहता है। यही प्रकृति का स्वरूप भी है किंतु देश में अगर “स्व” की “तंत्र” विकसित है हमारे संविधान विशेषज्ञों ने इस स्वतंत्रता की संज्ञा भी दी है किंतु यह स्व- तंत्र अघोषित तौर पर आज भी गुलाम है… शायद इसीलिए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में भी वृंदावन में कुलगुरु/ कुलपति अनिल यादव और ब्रह्मचारी ऋषि बाबा प्रेमानंद के संवाद को मन से नहीं स्वीकारा है… जबकि कम समय में ही भगवान कृष्ण के वक्ष स्थल में रहने वाली राधा रानी के युगल स्वरूप की मूर्ति मान अभिव्यक्ति बाबा प्रेमानंद के दरबार में कौन सी ऐसी हस्ती नहीं आयी है ।
हम सब ने लगभग यह देखा है भारत के लोकतंत्र को नियंत्रित तरीके से चलने वाली भारतीय जनता पार्टी को निर्देशित करने वाली संस्था आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी जब प्रेमानंद जी के समक्ष पहुंचे तो उन्हें “पहाड़ के नीचे ऊट” होने का आभास हुआ शायद वहीं से प्रेरित होकर चुनाव के बाद ही सही मणिपुर की गृह युद्ध के हालात पर उनकी अभिव्यक्ति आई थी की “1 साल बाद भी मणिपुर को शांति का इंतजार है…”तब जबकि प्रधानमंत्री और पूरी बीजेपी मणिपुर को खारिज करती रही है.
ऐसी कई घटनाएं वृंदावन के इस कुंज गली में आम हो चुकी हैं वर्तमान का यह दौर हम जैसे लोगों के लिए जीने मात्र का गौरवशाली दौर है जहां प्रत्यक्ष में और प्रकट में अलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति को हम बाबा प्रेमानंद में महसूस करते हैं इसके बावजूद कि उनकी दोनों किडनी फेल हैं तथा वह आए दिन डायलिसिस पर हैं बावजूद उन्होंने अपनी मन की शक्ति से इस शरीर तंत्र में अपने स्व को अपने तंत्र से यानी शरीर से पृथक करके प्रदर्शित किया है। उन्हें देखकर उनके पीड़ा दायक शरीर में उनके चेहरे से कोई भी पहचान नहीं सकता। तो कह सकते हैं भारत की स्वतंत्रता में सिर्फ प्रगति रूप से दिखने वाले यही एक ऐसे नागरिक हैं जो पूर्ण स्व-तंत्र हैं शायद हमारे स्वतंत्रता के मनीषियों ने, महात्मा गांधी जी स्वतंत्रता की खोज में अपने राम को ढूंढते रहे “वैष्णव जन तेने कहिए…”कहकर भारतीय में ईश्वर होने की अभिव्यक्ति को खोजते रहे हैं। वह अभिव्यक्ति बाबा प्रेमानंद में हम सबको सहज ही देखने को मिल रही है। ऐसे बाबा प्रेमानंद को बारंबार प्रणाम है जो दुनिया के संपूर्ण मानवता के लिए जीते जागते प्रमाण है की जिंदगी इसी स्वतंत्रता की खोज में भटक रही है और सहज रूप से आप कैसे स्वतंत्रता पा सकते हैं जहां प्रत्येक नागरिक ही नहीं जीव, जंतु, जड़, पदार्थ में प्रेम की स्पंदन महसूस की जा सकती है पुन: उन्हें हार्दिक प्रणाम।

–                                  छत्रपति साहू जी विश्वविद्यालय कानपुर


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