
सामान्य तौर पर अगर कर्फ्यू नहीं लगा है, 144 धारा का उपयोग नहीं हो रहा है तो यह मान के चला जाता है की सब कुछ नियंत्रण में है कानून व्यवस्था शांतिपूर्ण कायम है… इसमें एक और जोड़ लें कि अगर अराजकता कायम हो और नेता इस्तीफा नहीं देता है तो भी मान कर चलना चाहिए की कानून व्यवस्था शांतिपूर्ण कायम है… जैसे भारत के मणिपुर में कोई फर्क नहीं पड़ता की कारगिल युद्ध के जवान की पत्नी को निर्वस्त्र करके जुलूस के रूप में अपमानित किया गया . ,मंत्री के घर में हथगोला फेंकें जाते हैं, आग लगाई जाती है और मुख्यमंत्री के प्रति लोगों की भीड़ अपना असंतोष व्यक्त करती है इसके बावजूद भी मुख्यमंत्री या अन्य इस्तीफा नहीं देते हैं इसका मतलब वहां कानून व्यवस्था शांतिपूर्ण तरीके से कायम है। वह भारत की छठी अनुसूची में शामिल आदिवासी विशेष क्षेत्र है जो गृह युद्ध की हालत में जल रहा है, फिर भी कानून व्यवस्था शांतिपूर्ण तरीके से कायम है, ऐसा मानकर क्यों नहीं चलना चाहिए।
……………….( त्रिलोकीनाथ )………………..
इसी प्रकार मध्य प्रदेश के आदिवासी विशेष क्षेत्र में भी यदि कानून का पालन नहीं हो रहा है बलात्कार, मारपीट सैन्य अधिकारियों के समक्ष हो रही है, शहडोल नगर के वीआइपी पब्लिक प्लेस गांधी चौक में सरेआम कालेज छात्रा को पीटा जाता है किंतु वह रिपोर्ट नहीं करती तो भी कानून व्यवस्था शांतिपूर्ण तरीके से कायम है…; मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले इंडस्ट्री रिलायंस सीबीएम जिसका विस्तार क्षेत्र शहडोल से उत्तर प्रदेश के फूलपुर तक है यानी पूरे शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में जो संविधान की पांचवी अनुसूची में शामिल है वहां तक है, वह मध्य प्रदेश के खनन कानून को पिछले 15 साल से नहीं मान रही है और “अंग्रेजी बोल-बोल करके बात को घुमाती रहती है” जिसमें करोड़ों रुपए का राजस्व क्षति के साथ-साथ आम नागरिकों की दुर्घटना की स्थिति में वह समान रूप से सुरक्षा की सुनिश्चितता छुपी है फिर भी रिलायंस परवाह नहीं करती; सब शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा है यानी कानून व्यवस्था कायम है……
पिछले 12 वर्ष से मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का अंतिरिम आदेश शहडोल के मोहन राम मंदिर ट्रस्ट को जिसका विस्तार शहडोल के हृदय स्थल स्थित दो तालाबों की स्वच्छता और सुरक्षा के साथ-साथ कीमती जमीन की सुरक्षा तथा कटनी नगर के 10 मकान में और ग्रामीण क्षेत्र की करीब 170 एकड़ जमीन की सुरक्षा निहित है हाई कोर्ट का आदेश दम तोड़ देता है स्वच्छता पखवाड़ा में भी इसकी परवाह नहीं गंदगी से भरपूर मंदिर क्षेत्र बरकरार रहता है जो एक निजी संपत्ति की शुदा लोकहित का मंदिर है जहां पिछले 12 वर्ष से बार-बार अनुविभागीय अधिकारी आदेश का पालन करने की कोशिश करते हैं किंतु वह बुरी तरह से असफल हो जाते हैं क्योंकि माफिया नुमा सिस्टम उन्हें घुटनों मे ला देता है इसके बावजूद भी अराजकता पूर्ण स्थिति में तालाब नष्ट हो रहे हैं अतिक्रमणकारियों ट्रस्ट को लूट रहे हैं माफिया नुमा धार्मिक नकाब में प्रशासन के लिए चुनौती है इसके बावजूद भी निरपट नागरिकों में कोई हिंसा नहीं है उपद्रव नहीं है इसलिए कानून व्यवस्था शांतिपूर्ण तरीके से कायम है… लेकिन इसी मंदिर ट्रस्ट की जमीन पर अवैध कब्जा करने वाले जैन मंदिर ट्रस्ट में जो सरकारी जमीन पर बना है उसके तथाकथित किराएदार जिन्हें नजूल भूमि का अतिक्रमणकारियों माना गया है और आर्थिक रूप से दंडित किया गया है उनसे मकान में कब्जा पाने के लिए अगर मुट्ठी भर जैन समाज इकट्ठा होकर हंगामा खड़ा करता है तब कानून व्यवस्था चिंतित हो जाती है… तो क्या कानून व्यवस्था की परिभाषा नए ढंग से लिखी जा रही है….. या समझी जा रही है जो आदिवासी विशेष क्षेत्र के निवासियों के समझ से परे हैं …? और वह फालतू परेशान है की कानून व्यवस्था अराजकता पूर्ण हो चुकी है…
यह अलग बात है कि शहडोल जिले में दो हत्याएं एक पुलिस अधिकारी की हत्या और एक राजस्व अधिकारी की हत्या रेत माफिया कर देता है…3 महीने में कलेक्टर को अज्ञात तरीके से बदल दिया जाता है बावजूद बिहार के विधायक शरद कोल के निकट लोगों की हत्या का प्रयास शांतिपूर्ण तरीके से काम करने वाला माफिया भी करता है इसके बाद भी मध्य प्रदेश के एक मंत्री का इस्तीफा नहीं होता ..? क्योंकि सब कुछ शांतिपूर्ण तरीके से हो रहा है इसलिए कानून व्यवस्था कायम है… बस आम नागरिक इस कानून व्यवस्था को समझने में असफल हो रहा है… यह उसकी ना समझी है इसीलिए ना प्रशासन को फर्क पड़ता है; ना पुलिस को फर्क पड़ता है… और शासन तो इन सबसे ऊपर अपनी इच्छा के अनुसार कानून व्यवस्था को देखते ही रही है…. आदिवासी विशेष क्षेत्र की यही एक स्थाई हो रही दुर्दशा है क्योंकि जिस प्रकार किया मीठा जहर कानून व्यवस्था के नाम पर शहडोल में या आदिवासी विशेष क्षेत्र में मणिपुर में फैलाया गया है क्या देश में इसी माफिया तंत्र के लिए हमारे शहीदों ने अपनी आहुति दी थी….? यह बड़ा प्रश्न चिन्ह है?
देश की राजधानी मुख्यालय दिल्ली के राज्य के उपमुख्यमंत्री के बाद, मुख्यमंत्री करीब डेढ़ साल बाद जेल से बाहर निकले और आज इस्तीफा दे रहे हैं….कि उन्हें बदनाम किया गया है कि वह कट्टर बेईमान है, उनकी शर्त है कि जब जनता उन्हें घोषित करेगी कि वह ईमानदार हैं और वोट करेगी तभी वह मुख्यमंत्री की कुर्सी में बैठेंगे…. अच्छा है नैतिकता और मर्यादा के क्षेत्र में इस अकाल ग्रस्त हो रही राजनीति में आए भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रह चुके अरविंद केजरीवाल जैसे लोग इस प्रकार की राजनीति में अभी भी विश्वास करते हैं, कि जनता जनार्दन है… लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं क्योंकि कानून व्यवस्था शांतिपूर्ण से कायम है इसकी परिभाषा बदल चुकी है…यही वर्तमान का “प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्” है….

