
कल दिल्ली के लाल किला में घूमने का अवसर लगा। गए तो कई बार दिल्ली लेकिन इस बार लाल किला देखा। इतिहास में सल्तनत के वैभवशाली होते उत्कर्ष को और फिर उसके वीभत्स पतन को भी… फिर वर्तमान के लोकतंत्र के इतिहास को महसूस करते हुए सामने बाजार में पत्रकारिता की पूंजीवादी स्वरूप को देखा जिसमें लोकतंत्र मेंभीड़ तंत्र में कैसे बदल जाता है या फिर भेड़-तंत्र में कैसे बदल जाता है यह भी लाल किला के सामने पत्रकारिता के बाजार में देखा…। यह बाजार सड़क में रेहडी, ठेला, बोरा-पट्टी में लगाने वाले आम दुकानदारों से ज्यादा कुछ नहीं था.. वह दुकानदार अपना प्रोडक्ट बेचता है लेकिन पत्रकारिता के इस नए युग के माइक लेकर पत्रकारिता करने वाले लोग बाजार में मुर्ग लड़ाई का आयोजन से ज्यादा कुछ नहीं कर रहे थे। जो अरबपति पूंजी पति माफिया नुमा टीवीचैनल चलाने वाले गुलाम मीडिया के जमीनी अवतारथे। वह भी वहां इसी स्तर की तथाकथित पत्रकारिता करते हैं। पत्रकारिता की गुणवत्ता उसके गौरव और उसकी मंथन से निकलने वाला विशुद्ध लोकतांत्रिक निष्कर्ष यहां बेमानी हो जाता है।
यह कुछ इस प्रकार का होता है जैसे कल 1 अक्टूबर को दो खबरें एक साथ आई एक तो सत्ता का पसंदीदा महान बलात्कारी बाबा गुरमीत सिंह उर्फ राम रहीम का पैरोल से बाहर आ जाना, जो अक्सर जब वह चाहता है आ जाता है…
चुनाव के वक्त में हमारी न्यायपालिका राजनेताओं से कम व्यवहार करती नहीं दिखती…? इस बलात्कारि के लिए.. तो यह बलात्कारी को बाहर भेज देती है और अपने लोकतांत्रिक हाथों की लड़ाई लड़ने वाले हजारों किलोमीटर दूर लद्दाख से पदयात्रा कर आए आए सोनम वांगचुक जो अपने अधिकारों के लिए भारत सरकार को अपनी बात सुनाना चाहते हैं जेल के अंदर भेज दिया गया।
तो बलात्कारी बाबा जेल से बाहर और सोनम वांगचुक और उनके सहयोगी जेल के अंदर… यही वर्तमान सल्तनत का विभत्स काल है…
जब कभी इतिहास लिखा जाएगा इस लाल किले की तरह तब यह भी लिखा जाएगा कि लोकतंत्र में लाल किला अपने को दोहराता रहा है। इसलिए लाल किला अब भी बेमानी नहीं है… वह हमारे कड़वी सच्चाई का इतिहास और वर्तमान का भी साक्षी है.. तो इसलिए बाजार में नाचने वाली पत्रकारिता को हमने अपने नजर से देखा। हम आदिवासी क्षेत्र के पत्रकारों के लिए यह एक नया अनुभव है क्या हमें भी बाजार बड़ी हो चुकी सोशल मीडिया में इस प्रकार का बाजार विकसित स्थानीय मुद्दों के लिए क्यों नहीं करना चाहिए… शायद गुलामी के मीठे जहर में घुलते जा रहे आदिवासी क्षेत्र शहडोल में कोई निष्कर्ष निकल आए…?
आज महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन भी है इन दोनों लाल ने नैतिकता ईमानदारी और उसकी सुंदरता की जो सीमाएं तय की हैं क्या हम उसका सौंदर्य बोध अपना सकते हैं..? जरूर सोचना चाहिए…. हमारे महान नेताओं को विनम्र श्रद्धांजलि.. —–(त्रिलोकी नाथ)—-

