अमरकंटक विनाश को सड़क माफिया से कौन बचाएगा..? ( त्रिलोकीनाथ )

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अमरकंटक विनाश को सड़क माफिया से कौन बचाएगा.. ( त्रिलोकीनाथ )

   भारतीय जनता पार्टी की तीन प्रकार के हिंदुओं सरकारें लगातार 21 साल से मध्य प्रदेश में शासन में है.. उमाभारती सरकार अल्पकालिक रही; दीर्घकालिक रही शिवराज सिंह सरकार। वर्तमान में मोहन यादव सरकार काम कर रही है। शिवराज सिंह सरकार में देर से ही सही एक महत्वपूर्ण निर्णय अमरकंटक तीर्थ क्षेत्र के लिए लिया कि यहां पर कोई भी निर्माण कार्य नहीं किए जाएंगे… वहां की पर्यावरण और परिस्थिति की संवेदनशीलता के मद्देनजर यह निर्णय लिया गया था। इसकेपूर्व उमा भारती सरकार ने इसे “तीर्थनगरी” का दर्जा दिया था. शिवराज सरकार ने तो इस मिनीस्मार्ट सिटी का भी दर्जा दे दिया… लेकिन अहम निर्णय था पर्यावरण और पारिस्थितिकी के संवेदनशील केंद्र अमरकंटक क्षेत्र में निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध लगाना ।
निश्चित रूप से कहा जा सकता है यह निर्णय उनका इस शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र के उद्धार के लिए एकमात्र ऐसा निर्णय था जो पर्यावरण की संवेदनशीलता का पक्ष प्रदर्शित करता था। लेकिन मोहन यादव सरकार के आने के बाद शिवराज सरकार का यह निर्णय “विवेकहीन निर्णय” सिद्ध हो रहा है क्योंकि भाजपा की नई सरकार ने अति संवेदनशील अमरकंटक में “फोरलाइन सड़क” के नाम पर करीब 500 वृक्षों को काटने का निर्णय लिया है, ऐसा अखबार वाले लिखते हैं। पेड़ों की कटाई भी चालू हो गई है और जब तक आम जनता वहां पर चिपको आंदोलन की तरह वृक्षों के साथ चिपक करके पेड़ों की रक्षा नहीं करेंगे माफिया नुमा सड़क-माफिया अपने छोटे से लाभ के लिए इस क्षेत्र की वृक्षों की हत्या कर देगा… जो लगातार कर रहा है।
ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र में पहले भी विकास नहीं हुआ दिग्विजय सिंह सरकार को भी इस प्रकार की सड़क निर्माण में सड़क माफिया के साथ मिलकर के रीवा-अमरकंटक सड़क मार्ग का निर्माण का निर्णय किया गया था.. तब सड़क 110 करोड रुपए में रीवा से लेकर अमरकंटक तक 25 वर्षों तक बनी रहने वाली सड़क का निर्माण किया था ,कहते हैं एग्रीमेंट में उल्लेख था की 15 वर्ष टोल टैक्स के जरिए सड़क माफिया अपना पैसा सड़क ठेकेदार के रूप में वसूलेगा और 10 वर्ष इस सड़क का प्रबंधन मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम करेगा लेकिन जैसे ही कांग्रेस की सरकार गई और भाजपा की सरकार आई तो समय खत्म नहीं हुआ और तथाकथित नया सड़क माफिया, सड़क विकास के नाम पर सड़क ठेकेदार बनकर रीवा से तथाकथित 4 लाइंस सड़क के नाम पर रीवा अमरकंटक सड़क मार्ग का एक बड़ा हिस्सा रीवा से शहडोल तक का सड़क माफिया ने नया ठेका ले लिया। यह माफिया गिरी की बड़ी रफ्तार को प्रदर्शित करता है। हालांकि रीवा-अमरकंटक सड़क मार्ग की निर्माण की इतनी घटिया क्वालिटी थी कि वह टोल टैक्स वसूलने के 15 वर्ष की अवधि के दौरान ही चिथड़े-चिथड़े हो गई थी उसे रफू करके किसी तरह सड़क ठेकेदार ने अपना 15 वर्ष इस क्षेत्र में लूटपाट का उद्योग चलाया.. तब भी हजारों की संख्या में पेड़ काटे थे …उसे सड़क निर्माण ने तो सैकड़ो की संख्या में सड़क के आसपास के तालाबों का इनपुट बंद कर दिया था औरतालाब नष्ट हो गए थे। रीवा अमरकंटक सड़क मार्ग का अभिशाप हमने देखा है कि इस सड़क के कारण 56 लोग बाणसागर में पानी में डूब कर बस गिर जाने से मर गए थे आम जनता थी क्या बूढ़े क्या जवान क्या महिलाएं क्या 9 विविधता सब की हत्या सड़क निर्माण की घटिया क्वालिटी के कारण हुआ था जिस पर कोई भी मुकदमा आज तक दर्ज नहीं हुआ बड़ेराहत के नाम पर वह परिवार भाजपा सरकार से कुछ नहीं पाई है। यह तब की सड़क माफिया विधि का और कार्यपालिका की मिली भगत से हुई सबसे बड़ी हत्या का प्रमाण था। जिसका कभी भी समीक्षा तब के रीवा संभाग में नहीं किया था।
अबके संभाग मुख्यालय शहडोल के पास छतवई के पास रेशम उद्योग से सटा हुआ तालाब इसका जीता जागता प्रमाण है जो अपने आप में सरकारों की भ्रष्टाचार का मॉडल है। बहरहाल जिस आदिवासी विशेष क्षेत्र में जमीनों की बिक्री के लिए पांचवी अनुसूची का सहारा लेकर प्रतिबंध लगा दिया गया है कि बिना कलेक्टर की अनुमति के जमीन न खरीदी जाए उस क्षेत्र में उद्योगपतियों नामक उद्योग माफिया को खुली छूट होती है कि वह तमाम तरीके से सड़क के निर्माण पर लीज लेकर के हजारों एकड़ जमीन पर अपना उद्योग चलता रहे और हजारों करोड़ों रुपए की कमाई करता रहे । जिसका हिसाब आदिवासी विशेष क्षेत्र के लोगों को जानने की जरूरत भी नहीं है इसके लिए जिला पंचायतें आदिवासी पंचायत की तरह मूकबधिर रहती हैं।
सब जानते हैं की शहडोल का रिलायंस इंडस्ट्रीज आज भी खनिज अनुबंध के बिना अवैध रूप से ईवीएम गैस का उद्योग का काम कर रहा है और हजारों करोड रुपए की कमाई भी करता है वैध अवैध ईश्वर जाने…? ओरिएंट पेपर मिल का हमने सर्च किया कि जब 1965 में उद्योग लगा था तब यह विकास का सपना लेकर आया था लेकिन पर्यावरण प्रदूषण का सबसे बड़ा मॉडल बन गया.. जिस सोन नदी से आम किसानों की कृषि उत्पादकता को लाभ मिलना था उसका पूरा पानी यह उद्योग के लिए ले रहा और बदले में प्रदूषण उसे देता था… जलकर का पैसा भी नहीं दिया जब 199२ में मामले का पर्दाफाश किया गया तब दिग्विजय सरकार ने कानून बनाकर करीब 300 करोड रुपए अकेले इस उद्योग पर बकाया निकला था.. कहते हैं अब बिरला जी के ऊपर कृपा हो गई है और वह राशि घटकर के सरकार की तरफ से 70-75 लाख कर दी गई है.. बहरहाल यह पुरानी बातें हैं.. नए-नए उद्योगपति आते हैं नए-नए तरीके से लूट का कारोबार नेताओं के साथ उनके संरक्षण में मिलकर इस क्षेत्र में अंजाम देते रहते हैं…मध्य प्रदेश अमरकंटक के लिए एक त्वरित मार्गदर्शिका
किंतु 20 साल के रामराज में अगर शिवराज सिंह की सरकार ने एक अच्छा निर्णय अमरकंटक में निर्माण कार्य प्रतिबंधित करने का लिया तो कुछ तो विवेक रहा ही होगा.. शिवराज सिंह का। अन्यथा इतना बड़ा निर्णय कि तथाकथित विकास के पूरे रास्ते बंद कर दिए जाएं, नहीं लिया जाता।
यह अलग बात है की जो चिंता इन रामराजी सरकारों ने किया उसे पर बहुत पहले देश की उच्चतम न्यायालय ने अमरकंटक क्षेत्र में बॉक्साइट खनन पर प्रतिबंध लगाकर खनन को रोकने का काम किया। ताकि पर्यावरण और परिस्थिति पर प्रभाव विपरीत न पड़ सके इसी को थोड़ा सा शिवराज सिंह ने आगे बढ़ने का काम किया अब वह देश के कृषि मंत्री हैं और उन्हें केंद्र से प्रायोजित इस तथा कथित जबलपुर अमरकंटक सड़क मार्ग के नाम पर अमरकंटक क्षेत्र की सैकड़ो साल पुराने वृक्षों की हत्या करने के मामले में थोड़ा संवेदनशील होना चाहिए या फिर यह घोषित करना चाहिए कि उसे समय लिया गया निर्णय विवेक हीन निर्णय था। अथवा मोहन यादव सरकार का निर्णय बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णय है इस समय जो सड़क निर्माण हो रहे हैं उसमें निश्चित तौर पर केंद्र की गडकरी सरकार का अहम रोल होता है और वे ही इस प्रकार की सड़कों का जाल विकास के नाम पर देश में फैला रहे हैं। जो काफी कुछ हद तक बेहतर है उसमें देश की तरक्की है किंतु संवेदनशील अमरकंटक जैसे क्षेत्रों में यह निर्णय थोपना बेहद विवेकहीन निर्णय है। हो सकता है अमरकंटक क्षेत्र के अथवा शहडोल क्षेत्र के लोगों में इतनी जागरुकता ना हो कि वह इसके कुप्रभावों पर बहुत चर्चा ना करें या फिर जो चर्चा कर रहे हैं अखबारों के माध्यम से उनकी आवाज नक्कार खाने में तूती साबित हो। क्योंकि जनता अगर शक्तिशाली नहीं है तो अनुभव में आया है कि 7 सौ से ज्यादाकिसान किसानों ने आंदोलन के दौरान दिल्ली में धरना देते वक्त दम तोड़ दिया, वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लद्दाख को छठी अनुसूची क्षेत्र घोषित करने केवादा-आश्वासन के बाद लद्दाख की जनता जलवायु विशेषज्ञ सोनम वांगचुक के नेतृत्व में दिल्ली के लद्दाख भवन में आत्महत्या पर आमादा है.. क्योंकि सरकार इस प्रकार की आत्महत्या को बहुत तबज्जो नहीं देती।
अमरकंटक में भी अगर कुछ लोग इस प्रकार से कोई आंदोलन चलाएंगे तो वह भी सिर्फ आत्महत्या साबित होगा क्योंकि निर्णय सड़क माफिया को लेना है इसलिए वृक्ष काटते ही चले जा रहे हैं।क्षेत्र के सांसद अमरकंटक से ही सटे पुष्पराजगढ़ निवासी श्रीमती हिमाद्री सिंह को स्वयं पहल करके अपनी- युवा जागरुकता का परिचय देना चाहिए और इस काम पर तत्काल रोक लगवाने चाहिए।मुझे याद है जब उनके पिता स्व. दलबीर सिंह ने चर्चा के दौरान हमसे कहा था की सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद बॉक्साइट खदान बंद होने से वहां पर संचालित बॉक्साइट परिवहन वाले रोपवे इंफ्रास्ट्रक्चर को वह चाहते थे कि जिस प्रकार से अमरकंटक से बॉक्साइट निकाल करके पेंड्रा रेलवे स्टेशन में ले जाया जाता था अब प्रतिबंध लगने के बाद हम उद्योगपति से चर्चा करना चाहेंगे कि वह इस क्षेत्र की सेवा के लिए अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को पर्यटन के दृष्टिकोण से लोकहित में दान करदे ताकि अमरकंटक आने वाले पर्यटकों के लिए पेंड्रा रेलवे स्टेशन से संचालित परिवहन के लिए रोपवे द्वारा अमरकंटक में “अमरकंटक दर्शन” के लिए लोगों की सुलभता हो सके.. Himadri Singh - ये वादा है जब तक जी रही हु आपके संस्कारों पर चलना मेरा काम रहेगा हाँ मानती हूँ जिंदगी में आपका साथ नही मगर मरते दम तक मेरे नामकांग्रेस पार्टी के केंद्रीय मंत्री रहे स्वर्गीय दलवीर सिं ह का यह सपना सपना रह गया क्योंकि उनकी अचानक तथाकथित तौर पर हृदय घात से मौत हो गई। इसके बाद उनकी धर्मपत्नी श्रीमती राजेश नंदिनी के पश्चात वर्तमान में उनकी पुत्री भारतीय जनता पार्टी से दूसरी बार सांसद हैं अगर वह मुखर होकर अमरकंटक के संरक्षण के लिए अपने पिता स्वर्गीय दलवीर सिंह के सपनों के हिसाब से पर्यावरण और अपरिस्थितिकी के साथ अमरकंटक को बेहतरीन पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित भी करेंगे तो यह उनकी पुत्री के द्वारा अपने पिता को ही बड़ी विनम्र श्रद्धांजलि होगी । किंतु यह बात दूर की है वर्तमान की दुखदाई पीड़ा से निराकरण का एकमात्र तरीका है की सड़क मार्ग विकास के नाम पर जो अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हैं उन पर वह तुरंत रोक लगाने का काम करें और अमरकंटक कॉरिडोर क्षेत्र में जो अभ्यारण क्षेत्र भी है इस प्रकार की फोर लाइन की मूर्खतापूर्ण-सड़क-निर्माण पर साहस के साथ निर्णय लेने का काम करेंगे। तो यह जनता के हित के साथ इस आध्यात्मिक परिक्षेत्र अमरकंटक के भविष्य की सुरक्षा का भी हित जुड़ा हुई सेवा होगी. जो एक यादगार कदम कहलाएगा। किंतु सवाल यह है की कुंभकरणी नींद में सोई हुई हमारी विधायिका चाहे

Shahdol Chunav final Result: हिमाद्री सिंह का शहडोल सीट पर कब्‍जा, कांग्रेस के फंदेलाल को 4 लाख वोटों से चटाई धूल से - News18 हिंदी वह कांग्रेस के विधायक हो या भाजपा के सांसद क्या अपने अधिकारों का उपयोग करके अब तक बचा कर रखी गई अमरकंटक की दिन प्रतिदिन बर्बाद हो रही पर्यावरण परस्थितकी को बचाने का साहस जुटा पाएंगे…? यह बड़ा यक्ष प्रश्न है…
क्योंकि विधायिका जो निर्णय लेती है वर्तमान में कार्यपालिका इसका पूर्ण गुलामी के साथ पालन करती है कार्यपालिका कहने के लिए तो लोकतंत्र की अहम स्तंभ है किंतु वास्तव में अपनी पारिस्थितिकी के कारण उसकी प्रतिस्पर्धा सिर्फ बेहतरीन गुलाम बनाने की देखी जा रही है। जबकि अमरकंटक के मामले में कार्यपालिका स्वयं सक्षम है कि वह निर्णय ले और माननीय उच्चतम न्यायालय के खनन प्रबंध किए जाने के तथा शिवराज सिंह सरकार द्वारा निर्माण कार्य पर प्रतिबंध लिए जाने के निर्णय के परिपेक्ष में तत्काल वृक्षों की कटाई पर प्रतिबंध घोषित करें ।अन्यथा जिस प्रकार से हाल में उमरिया कलेक्टर ने सोन नदी के सूख जाने की समस्या से किसानो द्वारा पानी लिए जाने पर चिंता प्रकट की थी इस तरह भविष्य में नर्मदा नदी, जोहिला नदी और अन्य अमरकंटक से निकल निकालने वाले जल स्रोतों के खत्म हो जाने के दोषी कार्यपालिका के सभी तत्कालीन अधिकारी भी कहलायेंगे। उनकी आत्मा उन्हें कितना माफ करेगी हमें नहीं मालूम किंतु यह क्षेत्र बर्बाद हो चुका होगा। जिस गति में समग्र सर्वांगीण तरीके से विनाशकारी कार्यप्रणाली दिख रही है। सड़क विकास के नाम पर वृक्षों की कटाई सिर्फ एक नाम मात्र का एंगल है ऐसा समझना चाहिए। इसलिए भी चुंकि लोकतंत्र में कार्यपालिका का अहम रोल होता है उनसे भी हमें आशा क्यों नहीं करनी चाहिए… यहभी बड़ा प्रश्न है अन्यथा “होइहैं वही जो राम रचि राखा…” और रामराज तो चल ही रहा है हिंदुओं की सरकार को हम देख ही रहे हैं…


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