
आज एकादशी है पिछली एकादशी को हमारी मां श्रीमती बैजन्तीदेवी का 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया;, जनवरी 2005 तब भी एकादशी थी जब मेरे पिता ने जबलपुर जाते वक्त पिपरिया एक मंदिर के सामने अपना शरीर छोड़ दिया था। माता राम की अग्नि संस्कार संबंधित सभी कार्यक्रम होने के बाद भी मन मानसिक तौर पर मां के न रहने को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। जीवन के अभ्यास क्रम में साथ-साथ ममता की छांव में जीवन यात्रा से मुक्त होना स्वाभाविक रूप से असहज होता है ।
धरातल कैमोर के पास ग्राम मोहनटोला में 1931 के आसपास जन्मी मेरी माता को अपने पिता का ज्यादा सानिध्य नहीं मिल पाया । वे तीन बहन थी, हमारी नानी भी तब एक महामारी की शिकार हो गई थी। वे वे अपने बड़ी पुत्री यानी मेरी मां का विवाह कर पाई थी। पूरा भार अपनी दोनों छोटी बहनों का लिए माताजी पर जिम्मेदारी बढ़ गई थी। तत्कालीन आर्थिक स्थिति बेहतरीन जैसे सब ब्राह्मण परिवारों की होती है उनकी भी थी। पर वह अपने खेत की चर्चा मुझसे करती थी। उस खेत में ही पहली बार मेरे पिता भोलाराम जी गर्ग उनसे मिले थे । पास गांव धनेड़ी मे विवाह संदर्भ में उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से देखने आए थे मेरी माता अपने मुख से उन्होंने इसका वृतांत 2 वर्ष पहले मुझे सुनाया था और स्मृतियों में वे शर्मा भी रही थी…मैंने अपनी माता के सिर पर बेहोशी हालत में भी पल्लू को रखते हुए अभ्यास क्रम में देखा है वे मूल्य ,शर्म और हया पसंद महिला थी और हंसते हुए बात भी रही थी।
मेरे पिताजी का देहांत 2005 में हो गया था 3 वर्ष पहले करीब मेरी माता जी हाई ब्लड प्रेशर के कारण पक्षाघात से प्रभावित हो गई थी पिताजी को इससे ठीक न करपाने का एहसास कहीं कचोट गया था। और वह कमजोर हो गए थे और अंततः इसी दर्द ने उनके प्राण ले लिया ।ऐसा मुझे आभास होता है।
मेरी मां की तरह मेरे पिता भी अपने माता पिता का ज्यादा संरक्षण नहीं पाए इस तरह मेरी माता और पिता दोनों का बचपन लगभग पिताविहीन संघर्षपूर्ण जीवन की सहयात्रा से प्रारंभ हुआ । 1947 में देश आजाद हुआ स्वाभाविक है गुलाम भारत में उन्होंने जन्म लिया, संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा प्रारंभ की और देश की आजादी के बाद अपना गांव घर छोड़कर अजीबका पालन के उद्देश्य से वे शहडोल चले आए। तब उनका विवाह हुआ था। छोटी सी दुकान में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मेरे पिता स्वर्गीय भोलाराम जी जिन्हें लोग प्यार से ब्राह्मण होने के कारण भी “भोला महाराज” कह कर बुलाते थे।
हम उन्हें प्यार से दद्दा कहते थे, शहडोल क्षेत्र में अपनी सिद्धांतों की ईमानदारी की और नैतिकता की बुनियाद पर अपनी साख स्थापित की और उन ऊंचाइयों को भी पाया जिन्हें शहडोल के किसी व्यक्ति ने या नेता ने आज तक रिकॉर्ड नहीं तोड़ा है… उन्होंने प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की आम सभा की अध्यक्षता की थी। तब वह संयुक्त शहडोल के जिला लोकदल अध्यक्ष थे। उनके निकटतम विश्वसनीय मित्रों में तब जिला कांग्रेस के अध्यक्ष बनने वाले विद्वान नेता प्रेम जी निगम “बाबाजी” का विश्वास भी मिला वे रूहानी किस्म के नेता थे. भूरा महाराज, दुर्गा मंदिर वाले उनके सखा थे.. ऐसा भूरा महाराज जी मुझे बताते थे।
जमीन से उठकर चरम स्थिति में पहुंचने की यात्रा के दौरान हमारे घर में अक्सर सामूहिक समाजवादी विचारधारा का भरमार रहता था जिस कारण से परिवार, परिवार से ज्यादा आम आदमियों का भी परिवार था। अनायास लोग हमारे परिवार के सदस्य हो जाते थे यह मायने नहीं रखता था कि कौन किस जाति या धर्म का है। पिताजी का ऐसा ही स्वभाव था। स्वाभाविक है घर की प्रमुख महिला होने के कारण मेरी माता जी पर इस यात्रा का सहज स्वीकृति होनी थी, सबकी आव भगत सबका स्वागत अपने हाथ से भोजन बनाकर सबको खिलाने में वह बेहद खुश हुआ करती थी। मायने नहीं रखता था की टाइम क्या है, उस समय शहडोल में जो अंतिम ट्रेन आती थी उसमें भी किसी भी रिश्तेदार परिवार के लोगों के अथवा राजनीतिक के लोगों के आने का संभावना के आधार पर वह जागती रहती थी। हमारे वह घर में भोजन करना होगा और वह उसके लिए मानसिक रूप से चूल्हा जलाकर रसोई बनाने को तत्पर रहती थी।
समाजवादी नेता लाडली मोहन निगम अक्सर घर आते थे, जॉर्ज फर्नांडीज भी दो बार हमारे घर आए उन्हें खाना खिलाकर मेरी माता नाम से पहचान का शौक रखती थी. इसलिए जॉर्ज साहब को वह स्पष्ट नाम न लेने के कारण “जारेफुन्नारे” कहकर उन्हें संबोधित करती थी.. रसोई के सामने आंगन था जहां खाट में नेता बैठा करतेथे। मेरी माता जी को अवसर मिला कि वह प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को अपने घर से रोटी बनाकर के उन्हें बाणगंगा आम सभा स्थल आने पर घरेलू रोटी दी गई थी। इस तरह ईमानदारी, नैतिकता और सिद्धांत की बुनियाद पर मेरे माता-पिता ने विकास क्रम की यात्रा को स्वीकार किया था। जिसे एक बड़ा तबका आज भी महसूस करता है।
परिवार के सदस्य होने के नाते हमें विरासत में ईमानदारी, नैतिकता और सिद्धांत में जीने की स्वाभाविक आदत मिली थी। किंतु परिस्थितियों के कारण जो समय काल का परिवर्तन आया उसमें एक सिद्धांत वादी व्यक्ति होने के कारण मेरी माता-पिता दोनों परिस्थितियों से समझौता नहीं किया और स्वाभिमान पूर्ण जीवन जीने के और हमें यह सीखाने के लिए वे संघर्ष करते रहे.. शायद इसी संघर्ष में एक सहज स्वस्थ मन को पक्षाघात का शिकार बना दिया… करीब 22 साल मेरी माता पक्षाघात का शिकार रहीं।
अगर इस दुर्घटना को छोड़ दें तो वह पूर्ण स्वस्थ, पूर्ण चेतना वाली और संपूर्ण याददाश्त के साथ हंसकर हमसे अपनी स्मृतियों को साझा करती रही। जैसे जीवन की कमियां उनके लिए तुच्क्ष हो…उनका यह संबल मुझे और मेरे परिवार को ताकत देता था किसी जीवन मुक्त व्यक्ति की तरह वह हंस कर और हंसाते हुए वह पूर्ण स्वस्थ स्वरूप में मेरे परिवार को सानिध्य देती रही… उनके छांव में हमारा आर्थिक संकट भी हमारी ताकत बन कर रहा.. हम उनके मजबूत और बुलंद सिद्धांतों में कायल थे।
शहडोल का मोहन नाम तालाब जब पहली बार साफ हुआ तो उसका पूरा पानी निकाल दिया गया किंतु मुख्य कुंड छोड़ दिया गया था। किंतु जब दूसरी बार दोनों तालाब पुनः साफ करने की बारी आई तब कुंड भी साफ कर दिया गया था, इसके बाद मोहन नाम तालाब में पानी नहीं आ रहा था… मैंने अपने मा जिन्हें हम प्यार से दिद्दी कहते थे इस घटना का जिक्र किया.., उन्होंने अपने अनुभव के विज्ञान से मुझे बताया की तालाब की “लाज” यानी “कुंड” साफ नहीं करना चाहिए था उसकी “लाज” खत्म कर दी गई तो पानी कहां से आएगा…अभी जो तालाब का पानी दिख रहा है वास्तव में वह मोहन नाम तालाब का पानी नहीं बल्कि नगर पालिका शहडोल के पीने का पानी है जो शहडोल कलेक्टर दबाव में नगर पालिका ने अपना पिंड छुड़ाने के लिए तालाब में डालना चालू किया है.. जिस तालाब भरा रहता है… किंतु इसे स्वस्थ तालाब की स्थापना अभी भी नहीं हुई है बहुत काम शेष है जिस पर फिर कभी चर्चा करेंगे।
इस तरह हमारी “दिद्दी” , जिन्हें मैं माताराम भी कह कर भी बुलाता था उनका सारांश का ज्ञान था। वे पढ़ी-लिखी तो नहीं थी किंतु जीवन के संघर्ष यात्रा में “लढ़ी-पढ़ी” बहुत ज्यादा थी। क्योंकि पिताजी का विकास क्रम उनकी बुनियादी सहयोग से विकसित हुआ था समाज के हर पक्ष को जो प्रभावित करता था।
सरल शब्दों में कहें तो माताराम भारत की जमीनी हकीकत की पूर्ण तस्वीर थी। जिन्होंने सहज जीवन सिद्धांत को जीवन यात्रा का माध्यम माना था। माताराम में एक खुली किताब की तरह उन्हें पढ़ने का मुझे हमेशा शौक रहा.. मेरी किताब अब जैसे गुम हो गई है ..उनकी दया दृष्टि और कृपा सागर का निश्चल प्रवाह से मैं अब नहीं नहा पाउंगा।
क्योंकि अग्नि संस्कार अपने जीवित चार भाइयों में मुझे ही करने का अवसर मिला इसलिए मेरे पास खाली समय था मन में बदलने के लिए कई बार कुछ आलेख और चिंतन पर मैं विचार करता किंतु जल्द ही थक जाता था शायद अपनी किताब गुम हो जाने का गम किसी कोने में मुझे उसकी उपस्थिति का एहसास कराता था.. इसलिए मैं कुछ नहीं कर पता था।
पिछली एकादशी को वह हमारे पास साक्षात थी, आज देवउठनी एकादशी को सिर्फ स्मृतियां शेष हैं। शायद ही किसी महिला को इस जमीनी धरातल से उठकर अपने सिद्धांतों ईमानदारी और नैतिकता की बुनियाद पर इस तरह की खुली किताब शहडोल में मैं नहीं देखा। इसलिए अपनी मां का जाना जो सुनिश्चित था, अस्वीकार्य था।
किंतु जीवन का यही सत्य है इसीलिए “ब्रह्म सत्य – जगत मिथ्या”का महा वाक्य हमें गूंजायमान किये रहता है। और हम अपना शेष जीवन उन्हीं के पद चिन्हों चलते हुए सहजता से जीवन यात्रा पूर्ण कर लेगें इसमें अब कोई संसय है बाकी नहीं है। अगर हम ऐसा कर सके तो यह हमारी अपनी देवतुल्य माता-पिता को श्रद्धांजलि होगी। हम इस श्रद्धांजलि को सतत बनाए रखेंगे यह उनकी कृपा होगी, और इसे इसे अनवरत बने रहने के लिए राधा-श्याम की कृपा से एकादशी का व्रत मैंने शेष जीवन के लिए आज से स्वीकार कर लिया है। अपने अनुभव से कह सकता हूं हर पुत्र को अपनी स्मृतियों को बनाए रखने के लिए एक अवसर हमेशा ढूंढना चाहिए ताकि हम अपने जड़ों से बंधे रह सके।
————————–( त्रिलोकी नाथ)————————————-

