शहडोल क्षेत्र के गौरव, जनजाति समाज को गौरवान्वित  कब करेंगें……?-( त्रिलोकी नाथ )-

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                      सन 2000 के दशक में रमेश चंद्रजी, राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली के प्रमुख शहडोल आए और माइनिंग पॉलिटेक्निक में अपना लेक्चर दे रहे थे। कलेक्टर सूर्य प्रताप सिंह परिहार भी वहां पर उपस्थित थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से इस सेमिनार में कहा की शहडोल में कोई पुरातात्विक संपदा नहीं है। तब मैंने शहडोल नगर से लगे टांकी नाला के पास खेत में मिले मंदिर के शिखर के अंश भाग को गैर कानूनी तरीके से अपने घर में रखने और उसकी सूचना तत्कालीन वन मंत्री ज्ञान सिंह को देते हुए प्रशासन को अवगत कराया था की पुरातात्विक संपदा का भंडार शहडोल क्षेत्र में भरपूर है इसकी खुदाई कर करके उसे इस जनजाति क्षेत्र में सबके सामने संग्रहालय के रूप में रखना चाहिए। पहले तो रमेश चंद्र जी ने विश्वास नहीं किया, जब कलेक्टर परिहार ने उन्हें आस्वस्त किया तब वह माने और इस पर मध्य प्रदेश के पुरातात्विक अनुसंधान विभाग को पत्र भी लिखा तब से अब तक तीन दशक बीत गए शहडोल में संभाग भी बन गया किंतु पुरातात्विक महत्व का बड़ा संग्रहालय शहडोल में नहीं बनाया गया। एक संग्रहालय जो स्टेडियम के पास बना है उसमें भी जनजाति क्षेत्र में पाई जाने वाली पुरातात्विक संपदा रखी तो अवश्य हैं किंतु उसकी देखरेख एक चौकीदार नुमा व्यक्ति ही करता है। जो वह संग्रहालय के महत्व को हमारी नई पीढ़ी को बता पानी में लगभग अक्षम है।

भारत के प्रधानमंत्री बिहार से वर्चुअल उद्घाटन करके मध्य प्रदेश में दो जनजाति संग्रहालय का लोकार्पण करने वाले हैं आज बिरसा मुंडा की जयंती के अवसर पर राज्य स्तरीय कार्यक्रम शहडोल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की उपस्थिति में इन संग्रहालय का लोकार्पण होना है। किंतु शहडोल के विलुप्तप्राय: संग्रहालय को पर्यटन योग्य उच्च स्तरीय व जनजाति समाज के गौरव गाथा का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जाता..? इसे आदिवासी शोषण के संग्रहालय के रूप में संग्रहित करके एक शासकीय औपचारिकता जैसे खानापूर्ति कर दी गई है।
पत्रिका समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार के अनुसार आज करीब 230 करोड रुपए के विकास कार्यों का शहडोल में भूमि पूजन और लोकार्पण होना है। इसमें शहडोल के संग्रहालय का कोई जिक्र नहीं है और ना ही शहडोल जनजाति क्षेत्र में विलुप्त होती औषधीय पौधों के संरक्षण अथवा उपलब्ध औषधीय पौधों के लिए कोई बड़ा संरक्षण पूर्ण योजना का कार्यक्रम प्रदर्शित किया गया है। शहडोल क्षेत्र में इसकी प्राचीनता और विरासत के हिसाब से प्राथमिक तौर पर उसका जनजाति समाज तब गौरव महसूस करता है जब उसकी जमीन से जुड़ी आजीविका पूर्ण कार्यों को उसकी गौरव गाथा का अंग मनाया जाए तमाम प्रकार के प्रकृति दत्त उपहार वन अनुसंधान के जरिए उन्हें चिन्हित करके आदिवासी जनजाति समाज कि उसकी कनेक्टिविटी और उससे जुड़ी अजीबका का संरक्षण कैसे हो इस पर भी कोई कार्यक्रम प्रदर्शित नहीं किया गया है।
इस तरह जनजाति समाज अपने कि इतिहास पर गौरव करेगा कम से कम शहडोल क्षेत्र के जनजाति समाज के लिए यह बड़ा प्रश्न है..! जिस पर फिलहाल तो मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश डॉक्टर मोहन यादव आज कुछ नहीं देने वाले हैं ऐसा अखबारों की भाषा बोलती है।
    तब मैं पुष्पराजगढ़ में पूर्व केंद्रीय मंत्री दलवीर सिंह के साथ उनके घर में था और उस समय अमरकंटक क्षेत्र में बालकों के बॉक्साइट माइन्स को सुप्रीम कोर्ट ने बंद करने का आदेश दिया था ताकि पर्यावरण और परिस्थिति की के साथ हो रही विनाश लीला को रोका जा सके आदेश के पालन पर हम चर्चा कर रहे थे; तब दलवीर सिंह ने      हमसे कहे कि मेरी हार्दिक इच्छा है और पूरा प्रयास भी है कि इतने दिनों तक अमरकंटक क्षेत्र में बॉक्साइट माइन्स के उत्पादन के लिए जो “रोपवे” उद्योगपति द्वारा खड़े किए गए हैं और उनसे अमरकंटक के जंगल से बॉक्साइट निकालकर पेंड्रा रोड रेलवे स्टेशन तक जिस बॉक्साइट का परिवहन किया जाता है अब उस रोपवे को क्यों ना उद्योगपति आदिवासी क्षेत्र अमरकंटक की व्यवस्था और उसकी सुरक्षा के लिए वह इन स्थापित रोपवे के इंफ्रास्ट्रक्चर को आदिवासी क्षेत्र के कल्याण और मध्य प्रदेश के पर्यटन के लिए उन्हें छोड़ दें ताकि जब पेंड्रा रोड से यात्री रेलवे स्टेशन में उतरकर रोपवे के जरिए अमरकंटक क्षेत्र की कई किलोमीटर यात्रा को रोपवे से करके अमरकंटक पहुंचेंगे तो उन्हें अमरकंटक क्षेत्र का तमाम जंगल और अन्य दर्शनीय स्थलों का दर्शन होगा और यह मध्य प्रदेश का संभवतः सर्वाधिक बड़ा रोपवे का कार्यक्रम पर्यटन की दृष्टिकोण से घोषित होता । उनके इस सपना को हम भी नजदीक से देखने लगे थे उन्होंने कहा मेरा बहुत प्रयास है कि ऐसा हो जाए ताकि अमरकंटक भारत के नक्शे में एक बड़ा पर्यटन क्षेत्र घोषित हो सके।
बिना किसी भी प्रकार की पर्यावरण और पारिस्थितिकी को विनाश किये। निश्चित तौर पर यह आदिवासी नेता दलवीर सिंह की दूरदर्शी सोच का एक मील का पत्थर साबित होता किंतु जैसे आदिवासी नेताओं को हमारी राजनीति उपयोग करती है और फेंक देती है इस अंदाज में दलबीर सिंह के इस महत्वपूर्ण दूरदर्शी निर्णायक सपने को कचरे में फेंक दिया गया।
   अब देखने को आ रहा है कि कभी रीवा-अमरकंटक सड़क मार्ग बनाकर, तो कभी जबलपुर अमरकंटक सड़क मार्ग बनाकर, तो कभी बिलासपुर-अमरकंटक सड़क मार्ग बनाकर तमाम जंगल को बुरी तरह से नष्ट किया जा रहा है…. आसपास खदानों के जरिए जंगल को तबाह किया जा रहा है पुरातात्विक महत्व की अनुसंधान पूर्ण कार्यवाहियां लगभग कचरे के डिब्बे में डाल दिए गए हैं, आदिवासी समाज का उनका पूरा रहन-सहन का आधुनिकीकरण भ्रष्टाचार की महान परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए उनके विकास के नाम पर गढ़ा जा रहा है।
हालांकि दो दशक तक मध्य प्रदेश में राज करने वाले भारतीय जनता पार्टी की सत्ता में स्थापित शिवराज सिंह जो इस समय कृषि मंत्री हैं उन्हें भी समझ में आया कि इस क्षेत्र में कंस्ट्रक्शन से बहुत नुकसान होता है लेकिन बहुत देर में समझ में आया तब तक अमरकंटक पक्के कंस्ट्रक्शन वालों का कब्जा हो चुका था.. उन्होंने प्रतिबंधित जरूर किया कि यहां पर पक्के कंस्ट्रक्शन न किए जाएं किंतु यह “दिखावे का दांत” था जिस तरह जबलपुर अमरकंटक सड़क मार्ग के नाम पर सैकड़ों पेड़ अमरकंटक क्षेत्र में काटे जा रहे हैं वह सिद्ध करता है कि कारपोरेट जगत के लाभ के बंटवारे के लिए अमरकंटक क्षेत्र को अगर नष्ट किया जाता है तो कोई बात नहीं.. आखिर राजनेता भी इस भ्रष्टाचार के बंदरबांट की अहम कड़ी होता है… इसलिए सब मुख बधिर रहते हैं। अमरकंटक बर्बाद होता रहे तो होता रहे किसे परवाह है…?
आज ही पत्रिका समाचार पत्र में समाचार है की जनजाति समाज का कांग्रेस नेता फुंदेलाल सिंह जो पुष्पराजगढ़ से विधायक हैं उन्हें आज शहडोल में होने वाली राज्य स्तरीय जनजाति गौरव कार्यक्रम में भागीदारी के लिए आमंत्रण नहीं दिया गया है और वह कार्यक्रमस्थल पर धरना देकर यह सिद्ध करेंगे कि वह भी जनजाति समाज शहडोल के एक प्रतिनिधि हैं.. तो इस प्रकार से हमारी राजनीति ने शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में ही दो प्रकार की जनजाति जातियों को जन्म दे दिया है एक भाजपा जाति के आदिवासी और दूसरे कांग्रेसी जाति के आदिवासी… अगर यही पर इन्हें बांटा जाएगा तो निश्चित रूप से यह जनजातीय कट जाएंगे। “बटेंगे तो कटेंगे”के स्थापित किया जा रहे मुख्यमंत्री योगी उत्तर प्रदेश के इस बहुचर्चित राजनीतिक नारे को शहडोल में आखिर क्यों स्थापित किया जा रहा है..?हो सकता है फुंदेलालजी के जनजाति गौरव समाज में भागीदारी से कुछ नया सीखने को मिलता इस पर भी अवश्य विचार किया जाना चाहिए।

    आखिर शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में अपने दो बड़े नेता इस क्षेत्र का गौरव रहे हैं स्वर्गीय दलवीर सिंह और स्व. दलपत सिंह परस्ते के नाम पर एक भी गौरवपूर्ण स्मारक जनजाति समाज को गौरवान्वित करता क्यों नहीं दिखता…? यह सब ऐसे प्रश्न है जो राज्य स्तरीय जनजातीय गौरव कार्यक्रम बाणगंगा 2024 में समाधान होनी चाहिए।
चले मान भी ले कि भाजपा अपने हित के हिसाब से जनजातीय समाज में गौरव का दर्शन करती है तो आज दूसरी बार शहडोल क्षेत्र की सांसद श्रीमती हिमाद्री सिंह प्रतिनिधित्व कर रही हैं और उनके पिता स्व. दलबीर सिंहऔर माता स्वर्गीय श्रीमती राजेश नंदिनी सिंह दोनों ही सांसद रह चुके हैं यानी पुरुष का प्रतिनिधित्व और महिला का गौरवशाली प्रतिनिधित्व शहडोल में हो चुका है उनके सपनों को ही लेकर यदि अमरकंटक में रोपवे के जरिए अमरकंटक के पर्यावरण और परिस्थिति की रक्षा को देखते हुए कोई वृहद कार्यक्रम की घोषणा हो जाए तो भी इस क्षेत्र का जनजाति समाज गौरव पूर्ण दृष्टिकोण से अपने प्रतिनिधित्व पर गौरव कर सकेगा जो मध्य प्रदेश और देश के आदिवासी क्षेत्र के लिए परिवहन का नया मॉडल भी होगा किंतु क्या हमारी वर्तमान नेता शहडोल क्षेत्र की जनजाति गौरव को आगे बढ़ाने के लिए कोई गौरवपूर्ण संग्रहालय अथवा अमरकंटक में रोपवे जैसे का पर्यटन पूर्ण कार्यों को साकार रूप देंगे यह भी बड़ा प्रश्न है हम भी इन सपनों में अपने सपनों को देखने का प्रयास करते हैं देखते हैं क्या होता है….?
———————( त्रिलोकी नाथ )————————–

 


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